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MP का ‘वसूली सिंडिकेट’: चेकपोस्ट की मौत और चेकपॉइंट्स का जन्म

भोपाल/मध्य प्रदेश. मध्य प्रदेश की सीमाओं पर भ्रष्टाचार खत्म करने के नाम पर बंद किए गए परिवहन चेकपोस्ट अब नए रूप में लौट आए हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि पहले इन्हें चेकपोस्ट कहा जाता था, अब इन्हें चेकपॉइंट कहा जा रहा है। दावा था कि 1 जुलाई 2024 से 47 परिवहन चेकपोस्ट बंद कर दिए गए हैं ताकि ट्रांसपोर्ट कारोबारियों को राहत मिले, भ्रष्टाचार पर रोक लगे और व्यापार आसान बने। लेकिन ज़मीनी तस्वीर इस दावे से बिल्कुल उलट दिखाई दे रही है। हालिया पड़ताल में सामने आया है कि पुराने ढांचे हटे जरूर, मगर कथित वसूली तंत्र पहले से अधिक संगठित रूप में खड़ा हो गया।

मध्य प्रदेश की सीमाओं पर कई स्थानों पर ऐसे अस्थायी नाके सक्रिय बताए जा रहे हैं, जहां ट्रकों को रोककर पूछताछ, दस्तावेज़ जांच और फिर कथित “सेटिंग” के जरिए रास्ता साफ करने का खेल चलता है। जिन बिंदुओं को नियमों के तहत सिर्फ संदिग्ध वाहनों की जांच के लिए मोबाइल चेकिंग यूनिट होना चाहिए था, वे कई जगह स्थायी वसूली केंद्रों में बदलते नजर आ रहे हैं। यही वजह है कि अब सवाल सिर्फ भ्रष्टाचार का नहीं, बल्कि शासन व्यवस्था की विश्वसनीयता का भी है।

इस पूरे मामले की सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि यह कोई इक्का-दुक्का घटना नहीं लगती। अलग-अलग सीमावर्ती जिलों से एक जैसे आरोप सामने आना इस बात की तरफ इशारा करता है कि मामला स्थानीय स्तर की मनमानी से कहीं बड़ा हो सकता है। यदि एक जिले का कर्मचारी दूसरे जिले के अधिकारियों का नाम लेकर “गारंटी” दे रहा है, यदि कोडवर्ड से वाहन निकल रहे हैं, यदि हर क्षेत्र में एक जैसा पैटर्न दिख रहा है, तो यह सिर्फ रिश्वत नहीं, बल्कि संगठित नेटवर्क का संकेत है।

बताया जा रहा है कि कई चेकपॉइंट्स पर ट्रांसपोर्टरों से मंथली बंदी के नाम पर रकम तय की जाती है। यानी एकमुश्त भुगतान करो और वाहन बिना रोकटोक गुजरते रहेंगे। यह मॉडल इसलिए खतरनाक है क्योंकि इसमें कानून का डर खत्म हो जाता है और रिश्वत व्यवस्था का हिस्सा बन जाती है। जो भुगतान करेगा, उसका रास्ता साफ। जो नहीं करेगा, उसकी गाड़ी घंटों खड़ी रहेगी, चालान होगा या अनावश्यक जांच झेलनी पड़ेगी।

अब इस खेल का आर्थिक गणित समझिए। यदि रोजाना हजारों ट्रक मध्य प्रदेश की सीमाओं से गुजरते हैं और प्रत्येक वाहन से औसतन कुछ सौ रुपये की अवैध वसूली होती है, तो यह रकम करोड़ों में पहुंचना तय है। यही कारण है कि अनुमानित वार्षिक राशि ₹1700 करोड़ से अधिक बताई जा रही है। यदि यह आंकड़ा वास्तविकता के करीब भी है, तो यह सिर्फ भ्रष्टाचार नहीं, बल्कि समानांतर टैक्स सिस्टम है—जो कानून से नहीं, दबाव और डर से वसूला जा रहा है।

इसका सीधा असर आम आदमी पर पड़ता है। ट्रक ऑपरेटर कोई सामाजिक संस्था नहीं चलाते। जो रकम वे रास्ते में देते हैं, वह आखिरकार माल भाड़े में जोड़ दी जाती है। फिर वही बढ़ा हुआ खर्च किराना, सब्ज़ी, सीमेंट, लोहे, दवा, कपड़े और रोजमर्रा की हर चीज़ की कीमत में जुड़ जाता है। यानी सड़क किनारे ली गई रिश्वत अंततः घर-घर से वसूली जाती है। जनता को पता भी नहीं चलता कि महंगाई के पीछे सिर्फ बाजार नहीं, भ्रष्ट सिस्टम भी जिम्मेदार है।

जीएसटी लागू होने के बाद देशभर में पुराने चेकपोस्ट मॉडल की उपयोगिता काफी कम हो गई थी। टैक्सेशन डिजिटल हुआ, ई-वे बिल आया, ऑनलाइन दस्तावेज़ व्यवस्था बनी। ऐसे में उम्मीद थी कि सड़क पर खड़े होकर नकद वसूली का दौर खत्म होगा। लेकिन यदि चेकपोस्ट हटाकर चेकपॉइंट बना दिया गया और मानसिकता वही रही, तो सुधार सिर्फ नाम बदलने तक सीमित रह जाएगा।

सरकार की तरफ से अक्सर कहा जाता है कि पारदर्शिता के लिए बॉडी वॉर्न कैमरे दिए गए हैं, डिजिटल भुगतान मशीनें उपलब्ध कराई गई हैं, निगरानी तंत्र मजबूत है। लेकिन यदि ज़मीन पर “मंथली बंदी” और “कोडवर्ड सिस्टम” चल रहा है, तो फिर यह तकनीक किस काम की? क्या उपकरण सिर्फ दिखावे के लिए हैं? क्या निरीक्षण सिर्फ कागजों में हो रहा है? क्या जवाबदेही तय करने की कोई वास्तविक व्यवस्था है?

यह मामला राजनीतिक रूप से भी संवेदनशील है। विपक्ष इसे सरकार की साख से जोड़ रहा है, जबकि व्यापारी और ट्रांसपोर्ट संगठन लंबे समय से राहत की मांग कर रहे हैं। यदि व्यापार आसान बनाने के बजाय सीमाओं पर अनौपचारिक टैक्स लग जाए, तो निवेश और उद्योग दोनों प्रभावित होते हैं। कोई भी कारोबारी उस राज्य में सहज महसूस नहीं करेगा जहां नियम पुस्तिका से ज्यादा ताकत “सेटिंग” की हो।

सबसे बड़ा सवाल यह है कि इतने बड़े पैमाने पर कथित अवैध वसूली बिना प्रशासनिक जानकारी के कैसे संभव है? यदि उच्च स्तर को जानकारी नहीं है, तो यह प्रशासनिक विफलता है। यदि जानकारी है और कार्रवाई नहीं हो रही, तो मामला और गंभीर है। दोनों ही स्थितियों में जवाबदेही तय होना जरूरी है।

अब जरूरत केवल बयानबाज़ी की नहीं, बल्कि ठोस कार्रवाई की है। सीमाओं पर सक्रिय सभी चेकपॉइंट्स का स्वतंत्र ऑडिट हो, सीसीटीवी और जीपीएस आधारित लाइव मॉनिटरिंग लागू हो, नकद लेनदेन पर पूर्ण प्रतिबंध लगे, शिकायत करने वाले ट्रांसपोर्टरों को संरक्षण मिले और दोषी पाए जाने वालों पर विभागीय कार्रवाई के साथ आपराधिक केस दर्ज हों। वरना चेकपोस्ट बंद करने का दावा सिर्फ प्रशासनिक विज्ञापन बनकर रह जाएगा।

मध्य प्रदेश की जनता यह जानना चाहती है कि सड़कों पर कानून चलेगा या कोडवर्ड? व्यापार चलेगा या बंदी सिस्टम? शासन चलेगा या सिंडिकेट? क्योंकि जब सड़कें भ्रष्टाचार की चौकी बन जाती हैं, तो नुकसान सिर्फ खजाने का नहीं, लोकतंत्र के भरोसे का भी होता है।

Akhileaks की पड़ताल जारी है…

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