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Akhileaks Exclusive: सीएम मोहन यादव का ‘ऑपरेशन चेकमेट’, कैसे अपने ही बुने जाल में फंसी कांग्रेस और गंवा बैठी राज्यसभा की पक्की सीट

राजनीति की बिसात पर मोहरे तो सभी चलते हैं, लेकिन असली बाजी वह मारता है जो सामने वाले के दिमाग को पढ़ ले और उसे अपनी ही गलती का शिकार बना दे। मध्य प्रदेश के हालिया राज्यसभा चुनाव में ठीक ऐसा ही हुआ। आज Akhileaks पर बात उस सियासी थ्रिलर की, जहां मुख्यमंत्री मोहन यादव ने एक शांत लेकिन बेहद आक्रामक रणनीतिकार की भूमिका निभाई और कांग्रेस को एक ऐसे चक्रव्यूह में उलझा दिया कि वह अपनी इकलौती पक्की सीट भी गंवा बैठी। इस पूरी कहानी में कांग्रेस सिर्फ रिएक्ट कर रही थी, जबकि टाइमिंग, खौफ और चालों का पूरा रिमोट कंट्रोल सीधे मोहन यादव के हाथों में था।

वर्चस्व की जंग और ‘वॉर रूम’ की निगरानी
पर्दे के पीछे की असली कहानी कांग्रेस की उस अंदरूनी कलह से शुरू होती है, जहां जीतू पटवारी, कमलनाथ और दिग्विजय सिंह के बीच राज्यसभा के एक टिकट के लिए वर्चस्व की खामोश जंग छिड़ी थी। मुख्यमंत्री मोहन यादव इस तमाशे को सिर्फ दूर से देख नहीं रहे थे, बल्कि एक चतुर शिकारी की तरह इसका पूरा कच्चा चिट्ठा अपने ‘वॉर रूम’ में तैयार करवा रहे थे। यादव का सियासी आकलन बिल्कुल सटीक था; उन्हें पता था कि अगर इन तीनों दिग्गजों को दरकिनार कर किसी ‘आउटसाइडर’ को टिकट थमाया गया, तो कांग्रेस के भीतर बगावत का ज्वालामुखी फटना तय है। यहीं से मोहन यादव ने कांग्रेस को घेरने की वह पटकथा लिखनी शुरू की, जिसका अंत एक ऐतिहासिक क्लीन-स्वीप पर होना था।

‘साइकोलॉजिकल प्रहार’ और खौफ का दांव
जैसे ही कांग्रेस आलाकमान ने अपने क्षत्रपों को नजरअंदाज करते हुए मीनाक्षी नटराजन को उम्मीदवार घोषित किया, मोहन यादव ने अपनी मास्टर स्ट्रैटजी का पहला ट्रिगर दबा दिया। तरुण चुघ और रजनीश अग्रवाल के रूप में अपने दो तय उम्मीदवारों के साथ बीजेपी ने अचानक एक तीसरा उम्मीदवार मैदान में उतार दिया, जिसने कांग्रेस खेमे में रातों-रात खलबली मचा दी। मोहन यादव का यह कदम महज़ संख्या बल का प्रदर्शन नहीं था, बल्कि यह एक सधा हुआ मनोवैज्ञानिक प्रहार था। इसका इकलौता मकसद कांग्रेस के मन में हॉर्स-ट्रेडिंग और क्रॉस वोटिंग का खौफ पैदा करना था। उन्होंने कांग्रेस के दिमाग में यह बात सफलतापूर्वक प्लांट कर दी कि बीजेपी उनके असंतुष्ट विधायकों को कभी भी तोड़ सकती है।

पैनिक मोड और ‘रिजॉर्ट पॉलिटिक्स’ का ट्रैप
यह खौफ का दांव इतना अचूक साबित हुआ कि कांग्रेस आलाकमान पूरी तरह से पैनिक मोड में आ गया। अपने ही विधायकों की वफादारी पर शक करते हुए, कांग्रेस ने आनन-फानन में उन्हें मध्य प्रदेश से निकालकर कर्नाटक के एक सुरक्षित रिजॉर्ट में शिफ्ट करने की तैयारी कर ली। सच कहें तो, मुख्यमंत्री मोहन यादव ठीक यही चाहते थे। उन्होंने बिना कोई बल प्रयोग किए कांग्रेस के संकटमोचकों और विधायकों का पूरा ध्यान भोपाल के सियासी मैदान से दूर कर दिया। अब खेल पूरी तरह से उनके नियंत्रण में आ चुका था और कांग्रेस का सबसे कमजोर हिस्सा पूरी तरह एक्सपोज हो गया था।

‘प्लान बी’ और अचूक लीगल चेकमेट
जब कांग्रेस के रणनीतिकार यह सोचकर चैन की सांस ले रहे थे कि उन्होंने अपना किला बचा लिया है, ठीक उसी वक्त मोहन यादव ने अपने खुफिया ‘प्लान बी’ को सबसे घातक हथियार की तरह इस्तेमाल किया। उनकी लीगल टीम ने पहले ही मीनाक्षी नटराजन के बैकग्राउंड की माइक्रो-स्कैनिंग कर ली थी और यह अहम सुराग निकाल लिया था कि नटराजन के चुनावी हलफनामे (Affidavit) में तेलंगाना कोर्ट में लंबित एक क्रिमिनल केस की जानकारी छुपाई गई है।

मोहन यादव ने बिल्कुल सही टाइमिंग का इंतजार किया। जैसे ही कांग्रेस का तंत्र मध्य प्रदेश में शिथिल पड़ा, बीजेपी ने चुनाव आयोग में आपत्ति दर्ज करा दी, जो नियमों के तहत उम्मीदवारी रद्द करने के लिए एक अचूक ‘लीगल चेकमेट’ था। चुनाव आयोग द्वारा मीनाक्षी नटराजन का नामांकन रद्द होते ही कांग्रेस के पैरों तले जमीन खिसक गई।

मध्य प्रदेश की सियासत के नए ‘चाणक्य’
हालांकि सियासी गलियारों में यह थ्योरी आज भी तैर रही है कि कांग्रेस के ही बड़े दिग्गजों ने अपने रसूख को बचाने के लिए जानबूझकर यह कमजोर हलफनामा तैयार करवाया था। लेकिन, इस अंदरूनी साजिश को भांपकर उसका शत-प्रतिशत राजनीतिक फायदा उठाना मोहन यादव के भारी सियासी वजन और कुशाग्र बुद्धि को ही दर्शाता है। अंततः नतीजा यह रहा कि कांग्रेस अपनी इकलौती सीट भी गंवा बैठी और मोहन यादव की इस अचूक रणनीति ने बीजेपी को बिना एक भी वोट डाले तीनों राज्यसभा सीटें निर्विरोध (Unopposed) जिता दीं। इस एक चाल ने मध्य प्रदेश की राजनीति में मोहन यादव को एक नए ‘चाणक्य’ के रूप में स्थापित कर दिया है।

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