राज्यसभा का रण: डॉ. मोहन यादव का ‘मास्टरस्ट्रोक’, जादुई गणित और कांग्रेस में ‘ऑपरेशन सेंधमारी’
मध्य प्रदेश की सियासत में राज्यसभा चुनाव की तीसरी सीट अब महज़ एक चुनावी औपचारिकता नहीं रह गई है। वल्लभ भवन से लेकर दिल्ली तक बुनी गई यह एक बेहद गहरी और बहुआयामी रणनीतिक बिसात है, जिसने राज्य के सियासी पारे को चरम पर पहुंचा दिया है। भारतीय जनता पार्टी ने महेश केवट को अपना ‘सरप्राइज उम्मीदवार’ बनाकर कांग्रेस के खेमे में जो खलबली मचाई है, उसके तार सिर्फ मध्य प्रदेश तक सीमित नहीं हैं। सत्ता के गलियारों से छनकर आ रही अंदरूनी जानकारी के मुताबिक, यह फैसला अचानक नहीं लिया गया। देर रात सीएम हाउस में हुई एक अहम मंत्रणा के बाद मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने अपने इस बेहद करीबी और विश्वासपात्र चेहरे पर मुहर लगाई। केवट का नामांकन दरअसल भाजपा के शीर्ष नेतृत्व द्वारा बिछाई गई वह सियासी बिसात है, जिसका सीधा असर प्रदेश के आंतरिक सत्ता समीकरणों और आगामी उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों पर पड़ना तय है।
महेश केवट: ‘सोशल इंजीनियरिंग’ का अचूक दांव और यूपी फतह की तैयारी
महेश केवट की इस अप्रत्याशित ताजपोशी के पीछे उनकी गहरी सांगठनिक जड़ें और भाजपा का एक बड़ा सामाजिक दांव छिपा है। 1984 से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) से जुड़े और ओरछा शाखा के मुख्य शिक्षक रहे केवट को संगठन के प्रति उनकी अटूट निष्ठा का इनाम मिला है। उन्हें न केवल मुख्यमंत्री, बल्कि केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान और विधानसभा अध्यक्ष नरेंद्र सिंह तोमर का भी पूर्ण समर्थन हासिल है। इस फैसले के जरिए भाजपा ने एक तीर से दो निशाने साधे हैं।
मध्य प्रदेश में नर्मदा, चंबल, सोन और बेतवा नदियों के किनारे बसे 25 से अधिक जिलों में केवट, निषाद, रैकवार और मल्लाह समाज की 50 लाख से अधिक आबादी है, जिनका विधानसभा में अब तक कोई बड़ा प्रतिनिधित्व नहीं था। मछुआ कल्याण बोर्ड के अध्यक्ष महेश केवट को राज्यसभा भेजकर भाजपा ने न सिर्फ मध्य प्रदेश की इस सामाजिक शून्यता को भरा है, बल्कि यूपी की सीमा से लगे बुंदेलखंड और विंध्य के जरिए पूरे उत्तर प्रदेश के विशाल निषाद वोट बैंक को एक कड़ा संदेश दिया है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह एक ऐसा अचूक सामाजिक दांव है, जो यूपी फतह के लिए भाजपा के लिए एक बड़ी संजीवनी का काम करेगा।
चुनावी गणित: 10 जादुई वोटों का पेच और दरकता कांग्रेस का किला
इस पूरे सियासी चक्रव्यूह की गंभीरता को समझने के लिए राज्यसभा की तीसरी सीट के उस जादुई गणित को समझना बेहद जरूरी है, जिसने कांग्रेस की धड़कनें तेज कर दी हैं। मुकेश मल्होत्रा के वोटिंग पर रोक और श्योपुर के विजयपुर विधायक के मतदान न करने की स्थिति में, मध्य प्रदेश की 230 सदस्यीय विधानसभा में इस समय प्रभावी वोटों की संख्या 228 है। राज्यसभा की तीन सीटों के लिए प्रत्येक उम्मीदवार को जीत के लिए 58 वोटों के जादुई आंकड़े की दरकार है।
इस गणित के हिसाब से, भाजपा के पास अपने 164 विधायक हैं। पहली दो सीटें पक्की करने के लिए 116 वोट इस्तेमाल करने के बाद पार्टी के पास 48 वोट बचते हैं। यानी, भाजपा को अपनी यह तीसरी ‘सरप्राइज’ सीट निकालने के लिए महज़ 10 अतिरिक्त वोटों की जरूरत है।
दूसरी तरफ, कांग्रेस के पास कागजों पर 63 प्रभावी वोट हैं, लेकिन यहीं कांग्रेस का किला सबसे ज्यादा दरकता हुआ नजर आ रहा है। बीना से कांग्रेस विधायक निर्मला सप्रे का भाजपा के पक्ष में वोट करना पूरी तरह तय माना जा रहा है, जिससे कांग्रेस का अपना गणित और भी कमजोर हो गया है। इसके अलावा बीएपी (BAP) के इकलौते विधायक कमलेश डोडियार का झुकाव भी साफ तौर पर भाजपा की तरफ है। असली खेल भाजपा के इन्हीं ‘अतिरिक्त वोटों’ की जुगत में छिपा है, जिसने कांग्रेस के भीतर बड़े पैमाने पर सेंधमारी के दरवाजे खोल दिए हैं।
अभयदान का तकनीकी पेच: क्रॉस वोटिंग पर क्यों बेअसर होते हैं व्हिप?
इस सेंधमारी को अंजाम देने के लिए भाजपा राज्यसभा चुनाव के उस तकनीकी और संवैधानिक पेच का पूरा फायदा उठा रही है, जो इस वक्त कांग्रेस के लिए सबसे बड़ा खतरा बन चुका है। दरअसल, राज्यसभा चुनावों को सदन की सामान्य विधायी प्रक्रिया का हिस्सा नहीं माना जाता। यही वजह है कि इन चुनावों में राजनीतिक दलों द्वारा जारी किया जाने वाला ‘व्हिप’ पूरी तरह से बेअसर और दंतविहीन हो जाता है।
सबसे बड़ा संवैधानिक संरक्षण यह है कि राज्यसभा चुनावों में पार्टी लाइन के खिलाफ जाकर मतदान करने (क्रॉस वोटिंग) पर ‘दलबदल कानून’ (दसवीं अनुसूची) लागू ही नहीं होता है। यही कारण है कि पाला बदलने वाले विधायकों को अपनी विधानसभा सदस्यता खोने का कोई डर नहीं होता। पार्टी ज्यादा से ज्यादा बागी विधायकों को ‘कारण बताओ नोटिस’ जारी कर सकती है या उन्हें दल से निलंबित कर सकती है, लेकिन उनकी विधानसभा सदस्यता पर कोई आंच नहीं आती। इसी कानूनी सुरक्षा कवच के भरोसे अब मध्य प्रदेश में ‘अंतरात्मा की आवाज’ वाला इतिहास दोहराए जाने की पूरी पटकथा तैयार है।
अखिलीक्स एक्सक्लूसिव: ‘ऑपरेशन क्रॉस वोटिंग’ और मंत्री इंदल सिंह कंसाना का बंगला
Akhileaks.com के बेहद पुख्ता और एक्सक्लूसिव इनपुट्स के मुताबिक, इस ‘ऑपरेशन क्रॉस वोटिंग’ का पहला बड़ा और रणनीतिक केंद्र ग्वालियर-चंबल अंचल बन चुका है। सत्ता के गलियारों में यह खबर पूरी तरह पुख्ता हो चुकी है कि कृषि मंत्री इंदल सिंह कंसाना के शासकीय आवास पर हाल ही में कुछ असंतुष्ट कांग्रेस विधायकों की एक बेहद गोपनीय और अहम बैठक संपन्न हुई है। इस गुप्त मंत्रणा के बाद यह लगभग तय माना जा रहा है कि ग्वालियर-चंबल संभाग से कम से कम 4 से 5 कांग्रेसी विधायक ऐन वक्त पर पाला बदलते हुए महेश केवट के पक्ष में ‘ट्रांसपोर्ट’ होने जा रहे हैं।
कांग्रेस प्रत्याशी मीनाक्षी नटराजन (जो राहुल गांधी खेमे की मानी जाती हैं) के नाम की घोषणा के बाद से ही कमलनाथ और दिग्विजय सिंह गुट के विधायकों में जो घुटन थी, वह अब कृषि मंत्री के बंगले पर हुई बैठकों के जरिए खुले विद्रोह का रूप ले चुकी है। बगावत की यह लहर सिर्फ ग्वालियर-चंबल तक नहीं रुक रही है। बुंदेलखंड के कई जमीनी कांग्रेसी विधायक पहले से ही ओबीसी समाज की उपेक्षा से नाराज हैं।
भाजपा का रणनीतिक लक्ष्य सिर्फ जीत के लिए जरूरी 10 वोटों का जुगाड़ करना नहीं है, बल्कि वह 10 से कहीं ज्यादा कांग्रेसी विधायकों की सेंधमारी करने की तैयारी में है। इस बागी खेमे में अब महाकौशल और मालवा-निमाड़ के वे कांग्रेसी विधायक भी जुड़ने जा रहे हैं, जो लंबे समय से भाजपा के रणनीतिकारों के संपर्क में थे। कुल मिलाकर, तीसरी सीट का यह चुनाव कांग्रेस के लिए एक आत्मघाती चक्रव्यूह बन चुका है और भाजपा का यह संगठित ऑपरेशन पूरी राजनीतिक तस्वीर को बदलने के लिए तैयार खड़ा है।



