अखिलीक्स एक्सक्लूसिव: FBI के राडार से एमपी बीजेपी के वॉर रूम तक! शिवराज सिंह डाबी की वापसी और दिग्विजय सिंह से सीधे टकराव की पूरी इनसाइड स्टोरी
सत्ता, सियासत और साइबर स्पेस की यह एक ऐसी इनसाइड स्टोरी है, जिसके तार अमेरिका की फेडरल ब्यूरो ऑफ इन्वेस्टिगेशन (FBI) से लेकर मध्य प्रदेश बीजेपी के वॉर रूम और दिग्गज कांग्रेसी नेता दिग्विजय सिंह से सीधे कानूनी टकराव तक जुड़े हैं। 21 सितंबर 2026 को मध्य प्रदेश बीजेपी ने एक बड़ा संगठनात्मक फैसला लेते हुए अपने सोशल मीडिया विभाग की कमान एक बार फिर शिवराज सिंह डाबी को सौंप दी है। राजनीतिक गलियारों में इसे महज एक सामान्य नियुक्ति का आदेश नहीं माना जा रहा है, बल्कि यह प्रदेश की सियासत में एक पुराने, रहस्यमयी और बेहद आक्रामक अध्याय की वापसी है।
इस पूरी टाइमलाइन और डाबी की पृष्ठभूमि को समझने के लिए थोड़ा पीछे जाना जरूरी है, जब उनका नाम सियासत की मुख्यधारा में आने से पहले अंतरराष्ट्रीय स्तर पर साइबर सुरक्षा की सुर्ख़ियों में दर्ज हुआ था। अमेरिका की FBI के राडार पर डाबी का नाम साल 2007-2008 के दौरान आया था। आरोप था कि कैलिफोर्निया के सैक्रामेंटो में अपने पूर्व नियोक्ता की कंपनी छोड़ने के बाद, उन्होंने अनधिकृत रूप से कंपनी के सर्वर का एक्सेस लिया और महत्वपूर्ण डेटा डिलीट कर दिया। इसके बाद 2008 में अमेरिकी कोर्ट ने उनके खिलाफ गिरफ्तारी वारंट जारी किया और उनका नाम FBI की साइबर भगोड़ों की मोस्ट वांटेड सूची में शामिल हो गया। इस कहानी में सबसे बड़ा भूचाल साल 2015 में आया, जब यह चौंकाने वाला खुलासा हुआ कि FBI की वांटेड सूची में शामिल यह व्यक्ति मध्य प्रदेश सरकार के ई-गवर्नेंस मिशन में बतौर सीनियर आईटी कंसल्टेंट काम कर रहा है। विपक्ष के भारी हंगामे के बाद डाबी को अपने सरकारी पद से हटना पड़ा। हालांकि, बाद में उन्होंने खुद भारत में मौजूद FBI अधिकारियों से संपर्क साधा और कानूनी पेचीदगियों को सुलझाया, जिसके बाद उनका अरेस्ट वारंट वापस ले लिया गया और उनका नाम वांटेड लिस्ट से आधिकारिक तौर पर हटा दिया गया।
सरकारी सिस्टम से बाहर होने के बाद डाबी ने मध्य प्रदेश बीजेपी के आईटी सेल में अपनी जगह बनाई, लेकिन उनका विवादित अतीत सियासत में भी उनके साथ-साथ चलता रहा। मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने सोशल मीडिया पर सीधे डाबी को लेकर कई तीखे ट्वीट किए और उनकी पृष्ठभूमि पर गंभीर सवाल उठाए। इन ट्वीट्स ने उस वक्त मध्य प्रदेश की सियासत में खासी गर्माहट ला दी थी, जिस पर बीजेपी ने भी कड़ी आपत्ति जताते हुए दिग्विजय सिंह के खिलाफ पुलिस में शिकायत दर्ज कराई थी। बीजेपी आईटी सेल और दिग्विजय सिंह के बीच की यह तल्खी अक्टूबर 2020 में तब एक बड़े कानूनी टकराव में बदल गई, जब डाबी ने पलटवार करते हुए सीधे इस दिग्गज रणनीतिकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया। हाथरस कांड को लेकर देश भर में मचे बवाल के बीच, डाबी ने ग्वालियर पुलिस में दिग्विजय सिंह के खिलाफ एक औपचारिक शिकायत दर्ज कराई। आरोप था कि दिग्विजय सिंह ने अपने ट्विटर हैंडल से हाथरस की पीड़ित दलित युवती की तस्वीर साझा करके उसकी पहचान उजागर की है, जो कि IPC की धारा 228A का सीधा उल्लंघन है। इस एफआईआर ने दिल्ली से लेकर भोपाल तक सियासी तूफान खड़ा कर दिया था। हालांकि, शुरुआती बयानों और पुलिस की प्राथमिक कार्रवाई के बाद यह जांच कानूनी फाइलों में ऐसी उलझी कि आज तक इस मामले के नतीजे, चार्जशीट या अदालत के किसी अंतिम फैसले की कोई ठोस सार्वजनिक रिपोर्ट सामने नहीं आई है।
इस पूरी डिजिटल और कानूनी लड़ाई के बीच एक बेहद अहम सियासी पेंच भी है, जो मध्य प्रदेश की मौजूदा राजनीति में सबसे ज्यादा प्रासंगिक है। शिवराज सिंह डाबी को पूर्व मुख्यमंत्री और मौजूदा केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान का बेहद करीबी और विश्वस्त रणनीतिकार माना जाता है। अब सवाल यह है कि मौजूदा राजनीतिक परिदृश्य में, जब मध्य प्रदेश में सत्ता का चेहरा बदल चुका है, तब संगठन के भीतर शिवराज सिंह चौहान के इतने करीबी चेहरे की इस दमदार वापसी के आखिर क्या मायने हैं? यह महज एक अनुभवी आईटी रणनीतिकार की संगठन में वापसी है, या फिर इसके पीछे पार्टी के भीतर शक्ति संतुलन साधने की कोई बड़ी पटकथा लिखी गई है? सवाल यह भी है कि आखिर वो कौन से बड़े नेता हैं, जिन्होंने संगठन में डाबी की इस ‘वापसी’ की राह को इतना आसान बना दिया।
अमेरिका के सर्वर रूम से शुरू होकर, मध्य प्रदेश के सरकारी ई-गवर्नेंस विभाग, दिग्विजय सिंह से कानूनी टकराव और अब सत्ताधारी पार्टी के सोशल मीडिया प्रभारी तक का यह सफर डेटा, डिजिटल फुटप्रिंट और सियासी दांव-पेंच की एक अनोखी केस स्टडी है। ऐसे में यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या आज के दौर की राजनीति में आईटी सेल केवल जनमत तैयार करने और नैरेटिव सेट करने का टूल भर रह गए हैं, या फिर यह विरोधियों पर डिजिटल और कानूनी सर्जिकल स्ट्राइक का सबसे मारक हथियार बन चुके हैं। इस नई नियुक्ति के जरिए मध्य प्रदेश बीजेपी के भीतर आखिर कौन सा नया सियासी समीकरण आकार ले रहा है, यह आने वाले कुछ महीनों में पूरी तरह साफ हो जाएगा।



