मध्य प्रदेश के नक्शे पर उकेरा गया खामोश बदलाव, डॉ. मोहन यादव सरकार के कार्यकाल का अनफिल्टर्ड रिपोर्ट कार्ड
मध्य प्रदेश अपने स्थापना दिवस के जश्न में डूबा है, लेकिन पारंपरिक राजनीतिक बयानबाजी से इतर आज ‘अखिलीक्स’ उस खामोश लेकिन असरदार बदलाव का डीप डाइव कर रहा है, जो पिछले तीन सालों में राज्य के नक्शे पर उकेरा गया है। डॉक्टर मोहन यादव को जब सत्ता की कमान मिली थी, तब उनके सामने कई चुनौतियां और सवाल थे। लेकिन आज ग्राउंड जीरो पर उतरकर डाटा और तथ्यों के साथ इस कार्यकाल को डिकोड करने पर कहानी पूरी तरह बदली हुई नजर आती है। कभी सिर्फ कृषि प्रधान होने का तमगा पहनने वाला मध्य प्रदेश आज औद्योगिक विकेंद्रीकरण, ऐतिहासिक जल क्रांति और हाई-स्पीड इंफ्रास्ट्रक्चर के रनवे पर एक नई उड़ान भर रहा है।
इस सरकार ने सबसे पहले उस बड़े मिथक को पूरी तरह ध्वस्त कर दिया कि मध्य प्रदेश में उद्योग और निवेश का मतलब सिर्फ इंदौर या भोपाल है। सरकार ने इन्वेस्टर्स समिट को महानगरों के फाइव स्टार कमरों से निकालकर ‘रीजनल इंडस्ट्री कॉन्क्लेव’ के जरिए प्रदेश के हर अंचल तक पहुंचा दिया। उज्जैन, जबलपुर, ग्वालियर, रीवा और सागर जैसे शहरों में हुए इन कॉन्क्लेव के नतीजे बेहद चौंकाने वाले रहे, जहां करीब तीन लाख करोड़ रुपये के निवेश प्रस्तावों ने एक ठोस क्षेत्रीय औद्योगिक ढांचा तैयार कर दिया। मुंबई, बेंगलुरु से लेकर सीधे ब्रिटेन और जर्मनी तक हुए एग्रेसिव रोड-शो के जरिए मध्य प्रदेश एक नए ग्लोबल हब के रूप में उभरा है। मालवा में टेक्सटाइल, महाकौशल में डिफेंस और विंध्य में रिन्यूएबल एनर्जी के क्लस्टर्स इस बात की गारंटी बन रहे हैं कि अब युवाओं को रोजगार के लिए पलायन नहीं करना पड़ेगा, क्योंकि तीन लाख से ज्यादा नई नौकरियों का ब्लूप्रिंट उनके अपने जिलों में तैयार हो चुका है।
उद्योगों के साथ-साथ इस सरकार का सबसे बड़ा और ऐतिहासिक मास्टरस्ट्रोक नदी जोड़ो परियोजनाओं के रूप में सामने आया है, जिसने दशकों पुराने उन विवादों को सुलझा दिया जिन्हें कभी नामुमकिन माना जाता था। लगभग बीस साल से मध्य प्रदेश और राजस्थान के बीच अटकी पार्वती-कालीसिंध-चंबल लिंक परियोजना की फाइलों को जनवरी 2024 के ऐतिहासिक त्रिपक्षीय समझौते ने हकीकत में बदल दिया। 72 हजार करोड़ रुपये की इस महा-योजना ने मालवा और चंबल के 13 जिलों के खेतों के लिए अगले पचास सालों तक पानी सुनिश्चित कर दिया है। इसी तरह, देश की पहली नदी जोड़ो परियोजना ‘केन-बेतवा लिंक प्रोजेक्ट’ को जिस रफ्तार से जमीन पर उतारा जा रहा है, उसने सूखे बुंदेलखंड के दस जिलों की 41 लाख आबादी में जीवन की नई उम्मीद जगा दी है। 44 हजार करोड़ की इस परियोजना और 2025-26 तक 65 लाख हेक्टेयर सिंचाई रकबे के टारगेट के दम पर मध्य प्रदेश देश की कृषि अर्थव्यवस्था का निर्विवाद सरताज बनने की राह पर है।
विकास की इस पूरी तस्वीर को इंफ्रास्ट्रक्चर और कनेक्टिविटी ने सबसे मजबूत धुरी प्रदान की है। विंध्य क्षेत्र को रीवा एयरपोर्ट की नई सौगात देकर पूरे इलाके को देश के एविएशन मैप पर ला खड़ा किया गया है, वहीं ग्वालियर से अयोध्या और बेंगलुरु की सीधी उड़ानें शुरू की गई हैं। शहरों का ट्रैफिक सुधारने के लिए भोपाल, इंदौर, जबलपुर और सतना में एलिवेटेड कॉरिडोर का जाल बिछाया जा रहा है। 1692 करोड़ का उज्जैन-इंदौर सिक्स-लेन मार्ग, भोपाल-कानपुर इकोनॉमिक कॉरिडोर और 18 हजार करोड़ रुपये की भारी-भरकम लागत वाली इंदौर-मनमाड रेलवे लाइन महज ईंट-पत्थर के ढांचे नहीं, बल्कि मध्य प्रदेश की नई इकोनॉमी की सबसे मजबूत लाइफलाइन बन चुके हैं।
सड़कों और हाईवे के साथ-साथ विकास का यह मॉडल शिक्षा, स्वास्थ्य और समाज के सबसे निचले पायदान तक भी पहुंचा है। शिक्षा ढांचे को रीस्ट्रक्चर करते हुए सभी 55 जिलों में ‘पीएम कॉलेज ऑफ एक्सीलेंस’ की स्थापना की गई है, ताकि छोटे शहरों के छात्रों को भी वर्ल्ड क्लास एजुकेशन मिल सके। स्वास्थ्य के मोर्चे पर ‘पीएम एयर एंबुलेंस’ जैसी पहल ने दूरदराज के इलाकों में इमरजेंसी मेडिकल केयर की परिभाषा बदली है, तो उज्जैन की पहली मेडिसिटी ने मेडिकल टूरिज्म के दरवाजे खोले हैं। इसके साथ ही, 2400 गौ-शालाओं में गायों का आहार भत्ता दोगुना करना और शहडोल में तेंदूपत्ता संग्राहकों को करोड़ों रुपये का सीधा बोनस ट्रांसफर करना साबित करता है कि सरकार पॉलिसी बनाने और उसे जमीन पर उतारने के बीच के गैप को पाटने में सफल रही है। बीस साल पुराने जल विवाद को सुलझाने से लेकर विदेशी निवेशकों को रीवा-जबलपुर तक लाने वाले ये फैसले एक एग्रेसिव और भविष्य के लिए तैयार मध्य प्रदेश की कहानी बयां कर रहे हैं।



