राहुल का ‘संविधान’ और दिग्विजय का ‘सनातन’: डिकोड कीजिए कांग्रेस की सीक्रेट ‘गुड कॉप, बैड कॉप’ रणनीति!
राजनीति के अखाड़े में जब दिग्विजय सिंह जैसा धुरंधर नेता उज्जैन के महाकाल से अयोध्या के रामलला तक 930 किलोमीटर लंबी ‘सत्य सनातन स्वाभिमान यात्रा’ पर निकलता है, तो निशाने पर सिर्फ मध्य प्रदेश नहीं, बल्कि सीधे तौर पर उत्तर प्रदेश का आगामी चुनावी रण होता है। यूपीए सरकार के दौरान ‘हिंदू आतंकवाद’ और ‘भगवा आतंकवाद’ का नैरेटिव गढ़ने में सबसे मुखर चेहरा रहे दिग्विजय सिंह के माथे पर चस्पा ‘हिंदू विरोधी’ टैग इतनी आसानी से मिटने वाला नहीं है। ऐसे में माथे पर तिलक, गले में रुद्राक्ष और 70 दिन की यह सनातन यात्रा यूपी की सियासत में एक ऐसी एंट्री है, जिसके नफे-नुकसान का गणित बेहद उलझा हुआ है। सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या सनातनी वोटर्स इसे महज एक चुनावी ‘इमेज मेकओवर’ मानकर खारिज कर देंगे, या फिर यह कांग्रेस के लिए एक संजीवनी साबित होगी।
इस यात्रा का भूगोल और रूट-मैप अपने आप में एक अचूक सियासी मास्टरस्ट्रोक है, जो सीधे तौर पर मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश के राजनीतिक समीकरणों को मथने का काम कर रहा है। 20 अक्टूबर को उज्जैन से शुरू होकर यह पदयात्रा मध्य प्रदेश के मालवा अंचल (उज्जैन, शाजापुर, राजगढ़, गुना) से गुजरते हुए ओरछा के रामराजा सरकार के दरबार तक पहुंचेगी। इसके बाद यह दोनों राज्यों के साझा बुंदेलखंड और अंततः उत्तर प्रदेश के अवध (अयोध्या) तक का सफर तय करेगी। वर्तमान परिदृश्य में मालवा और यूपी का बुंदेलखंड दोनों ही भारतीय जनता पार्टी के अभेद्य किले माने जाते हैं, जबकि अवध का इलाका समाजवादी पार्टी के प्रभाव और बीजेपी के हिंदुत्व के नैरेटिव वाला क्षेत्र है। दिग्विजय सिंह सीधे तौर पर उन इलाकों से गुजर रहे हैं जहां कांग्रेस का सांगठनिक ढांचा फिलहाल काफी कमजोर है, और पार्टी को शून्य से उठकर अपनी जमीन फिर से तैयार करनी है।
उत्तर प्रदेश की राजनीति के लिहाज से यह यात्रा कांग्रेस के लिए एक दोधारी तलवार की तरह है। एक तरफ यह सपा के गढ़ अवध और बीजेपी के मजबूत किले बुंदेलखंड में कांग्रेस के लिए जमीन तैयार करने का प्रयास है, तो दूसरी तरफ दिग्विजय सिंह का अपना विवादित ट्रैक रिकॉर्ड एक बड़ा खतरा है। यूपी चुनाव से ठीक पहले अगर इस यात्रा के दौरान उनके मुंह से बहुसंख्यक भावनाओं को ठेस पहुंचाने वाला कोई भी बयान निकलता है, तो वह बीजेपी के लिए बैठे-बिठाए ध्रुवीकरण का सबसे बड़ा हथियार बन जाएगा। इसके साथ ही एक बड़ा जोखिम यूपी के मुस्लिम वोट बैंक से जुड़ा है, जिसे कांग्रेस दोबारा अपने पाले में लाने की जद्दोजहद कर रही है। जब दिग्विजय सिंह शिव-पार्वती की झांकी के साथ राम मंदिर ट्रस्ट की कमान संतों को सौंपने की मुखर वकालत करेंगे, तो अल्पसंख्यक समुदाय को लग सकता है कि कांग्रेस भी सॉफ्ट हिंदुत्व की राह पकड़ रही है, जिससे उनके पूरी तरह सपा या अन्य क्षेत्रीय दलों की तरफ गोलबंद होने का खतरा बढ़ जाएगा।
इस पूरी बिसात का सबसे रहस्यमयी पहलू राहुल गांधी और कांग्रेस आलाकमान के साथ दिग्विजय सिंह की ट्यूनिंग है। सतह पर देखने से भले ही पार्टी ने खुद को इस यात्रा से अलग कर लिया हो, लेकिन असल में यह कांग्रेस की ‘गुड कॉप, बैड कॉप’ वाली सोची-समझी ‘डार्क रणनीति’ हो सकती है। राहुल गांधी जहां संविधान, जातिगत जनगणना और बेरोजगारी जैसे सेकुलर मुद्दों पर बैटिंग कर रहे हैं, वहीं दिग्विजय सिंह को वह जिम्मेदारी सौंपी गई है जिसके जरिए वे सीधे आरएसएस के ‘हिंदुत्व’ से टकरा सकें। आलाकमान की खामोशी इस बात का स्पष्ट संकेत है कि अगर यह यात्रा सफल रही और सनातनी वोटर्स में सेंधमारी हुई तो पार्टी इसका पूरा क्रेडिट लेगी, लेकिन अगर किसी बयान से डैमेज हुआ तो इसे दिग्विजय सिंह की ‘निजी धार्मिक यात्रा’ बताकर पल्ला झाड़ लिया जाएगा।
सबसे बड़ा सवाल इस यात्रा की टाइमिंग और कांग्रेस के मुख्य एजेंडे को लेकर उठ रहा है। एक तरफ कांग्रेस चुनाव आयोग की विश्वसनीयता, ईवीएम और युवाओं के मुद्दों पर देश भर में एक बड़ा नैरेटिव सेट करने की कोशिश कर रही है, ऐसे में राम मंदिर और ‘चंदा चोरी’ का मुद्दा उठाना मुख्य एजेंडे से ध्यान भटकाने वाला कदम भी साबित हो सकता है। हालांकि, दिग्विजय सिंह ने बड़ी चतुराई से “वोट चोरी” (लोकतंत्र) को “चंदा चोरी” (आस्था) से जोड़कर यह संदेश देने की कोशिश की है कि मौजूदा सत्ता न तो जनता का वोट सुरक्षित रख सकती है और न ही भगवान का चंदा। यूपी जैसे संवेदनशील राज्य में, जहां राम मंदिर एक बेहद मजबूत सच्चाई बन चुका है, वहां ट्रस्ट पर सवाल उठाना कांग्रेस के लिए एक मास्टरस्ट्रोक साबित होगा या एक रणनीतिक भूल, इसका फैसला आने वाले चुनावी नतीजे ही करेंगे।



