अखिलीक्स एक्सक्लूसिव: दतिया विधानसभा उपचुनाव – जातियों के चक्रव्यूह और बगावत के बीच नरोत्तम का ‘महा-डैमेज कंट्रोल’
नमस्कार! बहुत स्वागत है आपका, मैं हूं अखिलेश सोलंकी और आप देख रहे हैं ‘अखिलीक्स’। बात हो रही है मध्य प्रदेश के हाई-प्रोफाइल दतिया विधानसभा उपचुनाव की। दतिया का यह चुनाव अब विकास या खोखले वादों पर नहीं, बल्कि ‘बसई के तिलिस्म’, ‘जातियों के चक्रव्यूह’, ‘डॉ. नरोत्तम मिश्रा के डैमेज कंट्रोल’ और ‘कांग्रेस की अंदरूनी बगावत’ के इर्द-गिर्द लड़ा जा रहा है। आइए, विस्तार से समझते हैं कि सियासत के इस भारी पर्दे के पीछे आखिर कौन सा ‘गेम’ चल रहा है।
बसई का तिलिस्म और डॉ. मिश्रा का डैमेज कंट्रोल
दतिया के मौजूदा हालात की नब्ज टटोलने के लिए सबसे पहले उस ‘बसई’ को समझना होगा, जिसने 2023 के विधानसभा चुनाव में डॉ. नरोत्तम मिश्रा की राजनीतिक जमीन खिसका दी थी। याद रहे, 2018 में जिस बसई ने नरोत्तम मिश्रा को जादुई जीत दिलाई थी, 2023 में उसी बसई के शहरी इलाके ने उनके खिलाफ भारी बगावत कर दी। मतगणना के 13 में से 10 राउंड तक डॉ. मिश्रा लगातार पिछड़ते रहे और अंततः 7,742 वोटों से चुनाव हार गए।
इस हार की सबसे बड़ी वजह थी—संगठन का अति-आत्मविश्वास और जमीन पर कार्यकर्ताओं की घोर निष्क्रियता। लेकिन, राजनीति का असली खिलाड़ी वही कहलाता है जो अपनी हार के कारणों को ही अपना सबसे बड़ा हथियार बना ले। डॉ. नरोत्तम मिश्रा अब पूरी तरह से ‘महा-डैमेज कंट्रोल’ मोड में आ चुके हैं। वे इस बात को भली-भांति जानते हैं कि पिछली बार अति-आत्मविश्वास ने ही लुटिया डुबोई थी। इसलिए इस बार उन्होंने चुनाव की तारीखों का इंतज़ार किए बिना ही सीधे फील्ड पर मोर्चा संभाल लिया है। पिछले दो महीनों में उन्होंने दर्जन भर से ज्यादा सामाजिक सम्मेलन किए हैं, जहां वे एक-एक नाराज कार्यकर्ता और रूठे हुए समाज के बीच खुद पहुँच रहे हैं। डॉ. मिश्रा इस बार ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ के मूड में नजर आ रहे हैं।
‘गेम-चेंजर’ साबित होगी मुख्यमंत्री की घोषणा?
इस पूरी सियासी कवायद के बीच 1 जून का दिन बेहद अहम रहा, जब डॉ. नरोत्तम मिश्रा ने मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव से एक हाई-लेवल मुलाकात की। अखिलीक्स के पास अंदरखाने की पुख्ता खबर यह है कि इस मुलाकात में दतिया की जनता के लिए एक बहुत बड़ी और ‘गेम-चेंजिंग’ सरकारी घोषणा की स्क्रिप्ट फाइनल हो चुकी है। यह घोषणा चुनाव से ठीक पहले नरोत्तम मिश्रा का वह ‘मास्टरस्ट्रोक’ साबित होगी, जो पूरे दतिया का माहौल रातों-रात पलटने का माद्दा रखती है।
जातियों का चक्रव्यूह और वोटबैंक में सेंधमारी
दतिया के इस उपचुनाव में ‘जातीय समीकरण’ सीधे तौर पर ड्राइविंग सीट पर बैठे हैं। डॉ. नरोत्तम मिश्रा का ‘माइक्रो-कास्ट मैनेजमेंट’ इस बार बेहद आक्रामक है। दतिया के करीब 35 हजार ब्राह्मण वोटों पर नरोत्तम की पकड़ इतनी मजबूत है कि कांग्रेस भले ही किसी ब्राह्मण को टिकट दे दे, तब भी इस वोटबैंक का एक बहुत बड़ा हिस्सा बीजेपी के ही खाते में जाएगा।
लेकिन असली चुनावी खेल **18 हजार यादव** और **37 हजार कुशवाहा** वोटों का है, जो पिछली बार बीजेपी से छिटक गए थे। यहीं से एंट्री होती है इस चुनाव के ‘एक्स-फैक्टर’ दामोदर यादव (आजाद समाज पार्टी) की। दामोदर यादव ने इस चुनावी मुकाबले को त्रिकोणीय बना दिया है। उनकी आक्रामक सक्रियता कांग्रेस के यादव वोटबैंक में करीब 60% तक की भारी सेंधमारी करने जा रही है। 2023 में जो यादव वोटबैंक कांग्रेस की जीत का मुख्य कारण बना था, दामोदर उसे अब अपने पाले में खींच रहे हैं।
दूसरी तरफ, 37 हजार कुशवाहा वोट भी निर्णायक भूमिका में हैं, जो फिलहाल दो धड़ों में बंटे हुए हैं। अगर कोई सजातीय उम्मीदवार खड़ा होता है, तो कांग्रेस का खेल पूरी तरह बिगड़ना तय है। इसी डैमेज को और बढ़ाने के लिए नरोत्तम मिश्रा ने मई के पूरे महीने में यादव, पाल और क्षत्रिय समाजों के लोगों को थोक के भाव में बीजेपी की सदस्यता दिलाई है, ताकि कांग्रेस का वोटबैंक पूरी तरह से खोखला हो जाए।
कांग्रेस में ‘एक अनार, तीन बीमार’ वाली बगावत
एक तरफ बीजेपी जहां तेजी से डैमेज कंट्रोल में जुटी है, वहीं कांग्रेस एक सुलगते हुए ज्वालामुखी पर बैठी है। कांग्रेस के भीतर ‘एक अनार, तीन बीमार’ वाली स्थिति ने अब खुली बगावत का रूप ले लिया है।
पूर्व विधायक भारती हर हाल में अपने बेटे ‘अनुज भारती’ की राजनीतिक लॉन्चिंग कराना चाहते हैं। राहुल गांधी और अखिलेश यादव से उनकी हालिया मुलाकातों ने कांग्रेस हाईकमान की नींद उड़ा रखी है। चर्चा इस बात की तेज है कि अगर बेटे को टिकट नहीं मिला, तो भारती कांग्रेस से बगावत कर सकते हैं। वहीं, 2023 में टिकट का त्याग करने वाले अवधेश नायक इस बार किसी भी तरह का समझौता करने के मूड में नहीं हैं। वे टिकट पर अपना स्वाभाविक हक जता रहे हैं और एक कदम भी पीछे हटने को तैयार नहीं हैं।
अखिलीक्स के एक्सक्लूसिव इनपुट के मुताबिक, इन दोनों की वर्चस्व की लड़ाई के बीच बेदाग छवि वाले पूर्व विधायक **घनश्याम सिंह** टिकट की रेस में सबसे आगे निकल चुके हैं और दिल्ली दरबार में उन्हीं के नाम पर मुहर लगने की सबसे ज्यादा संभावना है। अब कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी मुसीबत यह खड़ी है कि अगर घनश्याम सिंह को टिकट मिलता है, तो भारती और नायक के गुटों में जो असंतोष का ज्वालामुखी फटेगा, उसका लावा कांग्रेस की पूरी चुनावी रणनीति को जलाकर राख कर देगा।
निष्कर्ष: आर-पार की है यह जंग
कुल मिलाकर, दतिया का यह उपचुनाव अब पूरी तरह से नरोत्तम मिश्रा के ‘जातीय मैनेजमेंट’ और कांग्रेस के ‘टिकट मैनेजमेंट’ के बीच की आर-पार की जंग बन चुका है। एक तरफ बीजेपी अपनी पुरानी गलतियों को सुधार कर मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की आगामी बड़ी घोषणा के सहारे मैदान मारने की पूरी तैयारी में है, तो दूसरी तरफ कांग्रेस अपनी ही अंदरूनी कलह और दामोदर यादव के वोटकटवा डैमेज से जूझ रही है।
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