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अखिलीक्स एक्सक्लूसिव: गुना का ‘पावर कट’ और भाजपा में ‘मूल’ बनाम ‘महाराज’ का महासंग्राम

मध्य प्रदेश की सियासत में इन दिनों आसमान से बरसती आग से कहीं ज्यादा गर्मी भारतीय जनता पार्टी के भीतर सुलग रही गुटबाजी की आंच में महसूस की जा रही है। यह महज किसी एक जिले में बिजली कटौती का प्रशासनिक मसला नहीं है, बल्कि यह उस ज्वालामुखी का मुहाना है जो 2020 के सत्ता परिवर्तन के बाद से ‘मूल भाजपा’ के भीतर लगातार खदबदा रहा है।

गुना से भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ और बेबाक विधायक पन्नालाल शाक्य ने बिजली दफ्तर के बाहर जो मोर्चा खोला, उसने भोपाल के सत्ता प्रतिष्ठान से लेकर ग्वालियर के जयविलास पैलेस तक सियासी झटके दे दिए हैं। ‘अखिलीक्स’ की इस इनसाइड रिपोर्ट में आइए डिकोड करते हैं इस सियासी बगावत के असली मायने और सत्ता के गलियारों में चल रहे ‘परसेप्शन वॉर’ को।

‘एक्टिंग’ बनाम ‘डिलीवरी’: ऊर्जा मंत्री पर सीधा प्रहार
विधायक पन्नालाल शाक्य का अपनी ही सरकार के ऊर्जा मंत्री प्रद्युम्न सिंह तोमर को सरेआम ‘नाकारा’ और ‘दिखावटी’ कह देना कोई अचानक फूटा गुस्सा नहीं है। यह उन पुराने और निष्ठावान भाजपा नेताओं की सामूहिक कुंठा का प्रकटीकरण है, जिन्हें लगता है कि सत्ता की मलाई और रुतबा उन चेहरों ने हथिया लिया है जो कल तक उनके राजनीतिक दुश्मन हुआ करते थे।
ऊर्जा मंत्री प्रद्युम्न सिंह तोमर अक्सर बिजली के खंभों पर चढ़ने, ट्रांसफार्मर की धूल झाड़ने और नालियों में उतरकर सफाई करने के अपने ‘कैमरा-फ्रेंडली’ अंदाज के लिए जाने जाते हैं। शाक्य ने इस कार्यशैली को एक झटके में ‘नौटंकी’ साबित कर दिया।
> “हमें नालियां साफ करने वाला जनसेवक नहीं, जनता के साथ खड़ा होने वाला जनसेवक चाहिए।” — पन्नालाल शाक्य

यह बयान सीधे तौर पर गवर्नेंस के मॉडल पर सवाल है। यह लड़ाई अब सिर्फ काम बनाम नाकाम की नहीं रही, बल्कि यह ‘एक्टिंग’ बनाम ‘डिलीवरी’ की जंग बन चुकी है। निशाना भले ही तोमर हों, लेकिन संदेश पूरी कैबिनेट के उन चेहरों के लिए है जो जमीन से कट चुके हैं।

सम्मान की लड़ाई: निशाने पर ‘महाराज’ के सिपहसालार
इस पूरे एपिसोड का सबसे दिलचस्प और गहरा राजनीतिक पहलू वह है जब शाक्य अपनी तोप का मुंह जिले के प्रभारी मंत्री गोविंद सिंह राजपूत की तरफ मोड़ते हैं। यहाँ बात बिजली से हटकर सीधे तौर पर ‘सम्मान’ और ‘वर्चस्व’ पर आ जाती है।
अपमान का दर्द: पन्नालाल शाक्य का यह दर्द कि सिंधिया के ही एक कार्यक्रम में प्रभारी मंत्री ने उन्हें “चलो हटो” कहकर धक्का देकर किनारे कर दिया था, उस मनोवैज्ञानिक दरार को दिखाता है जो सिंधिया गुट और पुराने भाजपाइयों के बीच आज भी मौजूद है।
निरंकुशता पर तंज: शाक्य का यह तंज कि *”वे तो महाराजा से भी बड़े हो रहे हैं,”* उस साइलेंट नैरेटिव को आवाज दे रहा है कि महाराज (ज्योतिरादित्य सिंधिया) के सिपहसालार सत्ता के नशे में इतने चूर हैं कि वे निरंकुश होते जा रहे हैं।
मूल भाजपा का कैडर इस बात को पचा नहीं पा रहा है कि जिन नेताओं के खिलाफ उन्होंने दशकों तक नारे लगाए, आज वे ही उन पर हुक्म चला रहे हैं।

भाजपा संगठन का ‘कैच-22’ और कांग्रेस की चुटकियां
अपने लौह अनुशासन के लिए पहचानी जाने वाली भाजपा के लिए यह स्थिति ‘कैच-22’ जैसी हो गई है। संगठन के सामने सबसे बड़ी दुविधा यह है कि दोनों ही गुटों को साधना अब टेढ़ी खीर साबित हो रहा है:
मूल भाजपा कैडर की नाराजगी का डर: यदि पन्नालाल शाक्य जैसे वरिष्ठ और जमीनी नेता पर कार्रवाई की जाती है, तो पार्टी का पुराना कैडर नाराज हो सकता है। इससे जमीनी कार्यकर्ताओं में असंतोष और बगावत का खतरा बढ़ जाएगा।
सिंधिया खेमे के आहत होने का जोखिम: इसके विपरीत, यदि विधायक के बयानों को नजरअंदाज किया जाता है, तो सिंधिया समर्थक मंत्री इसे अपनी अहमियत कम होने के रूप में देखेंगे और इससे सरकार की कमजोरी का नैरेटिव सेट होगा।
गुना जिलाध्यक्ष धर्मेंद्र सिंह सिकरवार का तत्काल सामने आकर विधायक के बयान को ‘निंदनीय’ करार देना इसी डैमेज कंट्रोल का हिस्सा है। मामले की रिपोर्ट प्रदेश नेतृत्व को सौंप दी गई है और अब गेंद मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के पाले में है। वहीं, कांग्रेस ने जिस फुर्ती से इस वीडियो को सोशल मीडिया पर शेयर कर चुटकियां ली हैं, वह बताता है कि विपक्ष इस गुटबाजी को 2028 के चुनावों के लिए एक संजीवनी के रूप में देख रहा है।

निष्कर्ष: मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की अग्निपरीक्षा
डॉ. मोहन यादव की सरकार के लिए यह घटनाक्रम एक अग्निपरीक्षा से कम नहीं है। मुख्यमंत्री के रूप में वह लगातार यह स्थापित करने की कोशिश कर रहे हैं कि मध्य प्रदेश में सुशासन और प्रशासनिक कसावट ही सर्वोपरि है। ऐसे में अपनी ही पार्टी के विधायक का मंत्रियों को हटाने की धमकी देना, मोहन कैबिनेट के भीतर चल रहे शक्ति संतुलन को उजागर करता है।
पन्नालाल शाक्य का यह ‘विस्फोट’ मध्य प्रदेश की समकालीन राजनीति का एक टर्निंग पॉइंट साबित हो सकता है। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि जब शाक्य अपना ‘डोजियर’ लेकर भोपाल दस्तक देते हैं, तो मुख्यमंत्री मोहन यादव क्या स्टैंड लेते हैं। क्या वे अपने मंत्रियों के बचाव में ढाल बनेंगे, या फिर प्रशासनिक कसावट के नाम पर ‘महाराज’ के मंत्रियों की नकेल कसेंगे? सत्ता के इस शतरंज में मोहरे बिछ चुके हैं, और अखिलीक्स की नजर इस बिसात की हर अगली चाल पर बनी रहेगी।

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