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अखिलीक्स एक्सक्लूसिव: मध्य प्रदेश राज्यसभा चुनाव – भाजपा का ‘चक्रव्यूह’ और कांग्रेस का ‘पावर गेम’

मध्य प्रदेश की सियासत में 18 जून को होने वाले राज्यसभा चुनाव ने एक ऐसा सियासी बवंडर खड़ा कर दिया है, जिसकी गूंज भोपाल की झीलों से लेकर दिल्ली के सत्ता प्रतिष्ठानों तक साफ सुनाई दे रही है। यह चुनाव उच्च सदन में महज कुछ चेहरों को भेजने की कोई सामान्य औपचारिकता नहीं रह गया है; बल्कि यह प्रदेश के राजनीतिक भविष्य, जातीय समीकरणों और दोनों प्रमुख दलों के अंदरूनी शक्ति संतुलन को तय करने का एक निर्णायक मंच बन चुका है। अखिलीक्स की इस इनसाइड रिपोर्ट में आइए डिकोड करते हैं भाजपा की आक्रामक बिसात और कांग्रेस के अंदरूनी संघर्ष को।

भाजपा की बिसात: ‘सोशल इंजीनियरिंग’ और पॉवर-शिफ्ट का मास्टरप्लान
सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी अपनी चिर-परिचित आक्रामक शैली में एक ऐसा फुल-प्रूफ खाका तैयार कर रही है, जो विपक्ष को पूरी तरह बैकफुट पर धकेल दे। भाजपा का केंद्रीय नेतृत्व इस समय सवर्ण, पिछड़ा वर्ग, और दलित-आदिवासी समीकरणों को साधने की बेहद बारीक और सधी हुई रणनीति पर काम कर रहा है।
इसी रणनीति के तहत पार्टी के भीतर सबसे बड़ी हलचल वरिष्ठ नेताओं के पुनर्वास और पावर-शिफ्ट को लेकर है। अखिलीक्स के सूत्रों के अनुसार, इस सियासी ड्रामे में सबसे ज्यादा सुर्खियों में जो नाम है, वह है— कैलाश विजयवर्गीय। पार्टी के अंदरूनी गलियारों में इस बात की जोरदार चर्चा है कि वरिष्ठ मंत्री कैलाश विजयवर्गीय को इस बार राज्यसभा के रास्ते दिल्ली भेजा जा सकता है। यह कदम मध्य प्रदेश की वर्तमान लीडरशिप के समानांतर चल रहे पावर सेंटर्स को कम करने और विजयवर्गीय को एक बार फिर राष्ट्रीय राजनीति में सक्रिय भूमिका देने का सीधा संकेत होगा।
दूसरी ओर, ब्राह्मण चेहरे और अपने राजनीतिक रसूख के लिए पहचाने जाने वाले नरोत्तम मिश्रा को उनके पुराने गढ़ दतिया में होने वाले आगामी उपचुनाव में उतारकर प्रदेश की सक्रिय राजनीति में दमदार वापसी कराई जा सकती है। पार्टी सवर्ण वोट बैंक को साधने के लिए उन्हें तुरुप के इक्के की तरह इस्तेमाल करना चाहती है। इसके अलावा, क्षेत्रीय और जातीय संतुलन के सांचे में फिट बैठने वाले पूर्व मंत्री अरविंद भदौरिया और पूर्व प्रदेश उपाध्यक्ष कांतदेव सिंह के नाम भी संभावितों की सूची में प्रमुखता से शामिल हैं।

‘तीसरी सीट’ का चक्रव्यूह: कांग्रेस की उड़ी नींद
इस पूरी सियासी ड्रामेबाजी का असली ‘क्लाइमैक्स’ भाजपा की उस खामोश लेकिन घातक रणनीति में छिपा है, जो उसने कांग्रेस को मात देने के लिए रची है। पार्टी के रणनीतिकारों का चुनावी गणित अगर सटीक बैठता है, तो भाजपा एक प्रभावशाली चेहरे को मैदान में उतारकर राज्यसभा की ‘तीसरी सीट’ पर भी दांव लगाने से नहीं चूकेगी।
भाजपा के इसी आक्रामक दांव ने मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस की रातों की नींद उड़ा दी है। कांग्रेस खेमे में इस समय सबसे बड़ा खौफ ही इसी बात का है कि सत्ता के दम पर भाजपा ‘क्रॉस-वोटिंग’ का ऐसा जाल बिछाएगी कि कांग्रेस के कोटे की संभावित इकलौती सीट भी उसके हाथ से फिसल जाएगी।

कांग्रेस की दोहरी लड़ाई: खौफ और अंतर्कलह का ‘पावर गेम’
कांग्रेस की असली बीमारी भाजपा का खौफ नहीं, बल्कि उसकी अपनी ही अंतर्कलह और समानांतर सत्ता का वह संघर्ष है, जो अब बंद कमरों से निकलकर सड़कों पर आ गया है। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी और नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार के बीच चल रहा यह ‘पावर गेम’ अब सीधे दिल्ली दरबार तक पहुंच चुका है।
संगठन की कमजोरी और विधायकों की एकजुटता पर मंडराते खतरे को भांपते हुए दोनों ही क्षत्रप अपनी-अपनी राजनीतिक गोटियां सेट करने में लगे हैं। एक तरफ जीतू पटवारी राज्यसभा के प्रत्याशी चयन और विधायकों को साधने की गुहार लेकर दिल्ली में राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे और अन्य वरिष्ठ नेताओं की परिक्रमा कर रहे हैं। वहीं, दूसरी तरफ उमंग सिंघार ने भी खड़गे से करीब एक घंटे तक बंद कमरे में गुप्त मंत्रणा कर अपनी ताकत का अहसास कराया है। इस बैठक में प्रदेश प्रभारी हरीश चौधरी भी मौजूद थे।
अंदरखाने की खबर यह है कि सिंघार ने आलाकमान को साफ चेतावनी दी है कि अगर प्रत्याशी चयन में जरा भी चूक हुई, तो पार्टी अपनी इकलौती सीट भी गंवा बैठेगी। सिंघार ने बाकायदा एक लिखित ‘फॉर्मूला’ भी खड़गे को सौंपा है, जिसमें विधायकों को टूटने से बचाने और भाजपा के सेंधमारी के प्रयासों को नाकाम करने की विस्तृत रणनीति है। इस बीच, जमीनी कार्यकर्ताओं का मानना है कि पार्टी का ढांचा ब्लॉक और जिला स्तर पर बेहद कमजोर हो चुका है। ऐसे नाजुक वक्त में जब प्रदेश नेतृत्व ही दो अलग-अलग धड़ों में बंटकर दिल्ली के चक्कर लगा रहा है, तो कार्यकर्ताओं में भ्रम और निराशा फैलना स्वाभाविक है।

निष्कर्ष: मध्य प्रदेश की राजनीति का नया अध्याय
18 जून का राज्यसभा चुनाव मध्य प्रदेश की राजनीति का एक नया अध्याय लिखने जा रहा है। एक तरफ भाजपा है, जो अरविंद भदौरिया और कैलाश विजयवर्गीय जैसे कद्दावर नेताओं के जरिए जातीय और क्षेत्रीय संतुलन साधते हुए कांग्रेस के घर में सेंधमारी की पूरी तैयारी कर चुकी है। वहीं दूसरी तरफ एक खंडित कांग्रेस है, जो अपने विधायकों को बचाने और अपने ही नेताओं की महत्वाकांक्षाओं को नियंत्रित करने की दोहरी और मुश्किल लड़ाई लड़ रही है।
अगले चंद दिनों में जब दिल्ली से राज्यसभा के उम्मीदवारों के नामों का ऐलान होगा, तो वह सिर्फ एक सूची नहीं होगी, बल्कि मध्य प्रदेश की अगले पांच सालों की राजनीतिक दिशा तय करने वाला एक निर्णायक दस्तावेज होगा। अखिलीक्स की नजर इस सियासी बिसात की हर चाल पर बनी रहेगी।

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