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अखिलीक्स एक्सक्लूसिव: दतिया उपचुनाव – नरोत्तम मिश्रा की ‘राजशाही’ वापसी और कांग्रेस का नया दांव

मध्य प्रदेश की सियासत में एक बार फिर बड़ा भूचाल आने वाला है, और इस बार इस सियासी बवंडर का ‘एपिसेंटर’ है दतिया। 15 जून 2026 के पहले दतिया विधानसभा उपचुनाव का बिगुल बजने जा रहा है। लेकिन यह जान लीजिए, इस बार की लड़ाई महज एक खाली सीट को भरने की औपचारिकता नहीं है। यह लड़ाई एक कद्दावर नेता के ‘सियासी वनवास’ को खत्म करने, उसके रसूख और उसकी ‘राजशाही’ वापसी की है।
‘अखिलीक्स’ के पास इस हाई-प्रोफाइल चुनावी ड्रामे की सबसे एक्सक्लूसिव और इनसाइड स्टोरी है, जो यह बताती है कि दतिया के समीकरणों में इस बार दिल्ली से लेकर भोपाल तक सत्ता की कैसी शतरंजी चालें चली जा रही हैं और आखिर क्यों इस पूरी बिसात पर एक ही नाम सबसे भारी पड़ने वाला है।

कांग्रेस का ‘पुत्र-मोह’ और राहुल गांधी का वीटो
इस पूरे सियासी चक्रव्यूह की शुरुआत होती है कांग्रेस के दिग्गज नेता राजेंद्र भारती के डिस्क्वालिफिकेशन से। भारती की विधायकी क्या गई, दतिया कांग्रेस में टिकट के लिए तलवारें खिंच गईं। राजेंद्र भारती हर हाल में अपनी राजनीतिक विरासत अपने बेटे को सौंपना चाहते थे। दिल्ली के चक्कर लगे, आलाकमान के सामने लॉबिंग का हर पैंतरा आजमाया गया।
‘अखिलीक्स’ के पुख्ता सूत्रों के मुताबिक, राहुल गांधी ने इस ‘पुत्र-मोह’ पर अपना कड़ा वीटो लगा दिया है। उनका संदेश बिल्कुल साफ है—दतिया जैसी चुनौतीपूर्ण सीट पर वंशवाद के नाम पर कोई समझौता नहीं होगा। भारती परिवार के लिए बंद हुए इस दरवाजे ने दतिया की राजनीति में एक बड़ा शून्यावकाश पैदा कर दिया है।

सहानुभूति कार्ड: कांग्रेस का नया मोहरा
अब सवाल यह है कि राहुल गांधी के इस इनकार के बाद कांग्रेस के तरकश में कौन सा तीर बचा है? यहीं पर कांग्रेस एक सोची-समझी चाल चलने जा रही है। अंदरखाने की जानकारी के मुताबिक, कांग्रेस अब **घनश्याम सिंह** को अपना मोहरा बनाने जा रही है।
घनश्याम सिंह राजनीति के कच्चे खिलाड़ी नहीं हैं। ये वही नेता हैं जो दतिया जिले की ही सेवड़ा सीट से अपना पिछला चुनाव महज 2,558 वोटों के बेहद मामूली और दिल तोड़ने वाले अंतर से हारे थे। हार का यह फासला ही इस वक्त कांग्रेस की नजर में उनकी सबसे बड़ी ताकत है। कांग्रेस इसी जमीनी सहानुभूति, क्षेत्र में उनके सघन जनसंपर्क और शांत मिजाज को अपनी ढाल बनाना चाहती है।

घायल शेर की वापसी: नरोत्तम मिश्रा का अभेद्य चक्रव्यूह
कांग्रेस की इस रणनीति और घनश्याम सिंह की सहानुभूति की लहर के सामने जो दीवार खड़ी होने वाली है, वो कोई आम दीवार नहीं है। अखिलीक्स की पक्की रिपोर्ट है कि भारतीय जनता पार्टी इस उपचुनाव में अपने सबसे धाकड़ चेहरे, पूर्व गृहमंत्री **नरोत्तम मिश्रा** पर ही दांव लगाने जा रही है।
पिछले चुनाव में राजेंद्र भारती के हाथों मिली अप्रत्याशित हार नरोत्तम मिश्रा के लिए एक बड़ा झटका जरूर थी, लेकिन राजनीति में घायल शेर हमेशा ज्यादा खतरनाक होता है। दतिया का यह उपचुनाव उनके लिए वो संजीवनी है, जिसे हासिल करके वो सत्ता के शीर्ष गलियारों में अपनी पुरानी धमक वापस पाने जा रहे हैं।

किसका पलड़ा है भारी?
अगर दतिया के सियासी तराजू को तौला जाए, तो ‘अखिलीक्स’ का आकलन बिल्कुल साफ है—इस मुकाबले में नरोत्तम मिश्रा का पलड़ा बहुत भारी है। इसकी वजहें भी एकदम स्पष्ट हैं:
विपक्ष की अंतर्कलह: कांग्रेस राजेंद्र भारती के डिस्क्वालिफिकेशन और टिकट के पारिवारिक झगड़ों से जूझ रही है।
मजबूत नेटवर्क: नरोत्तम मिश्रा के पास पूरी की पूरी सरकारी मशीनरी, उनका अपना अभेद्य चुनाव प्रबंधन और दतिया के चप्पे-चप्पे में फैला उनका पुराना नेटवर्क है।
आक्रामक छवि: घनश्याम सिंह भले ही सेवड़ा की सहानुभूति लेकर आएं, लेकिन नरोत्तम मिश्रा के आक्रामक चुनाव प्रचार, उनके ‘दादा’ वाले रसूख और हिंदुत्व के उनके हार्डलाइनर चेहरे के सामने टिक पाना कांग्रेस के लिए लोहे के चने चबाने जैसा होगा।

सत्ता के गलियारों में ‘नंबर दो’ की ताजपोशी
दतिया का यह चुनाव अब सिर्फ एक विधायक चुनने का चुनाव नहीं रह गया है। यह मध्य प्रदेश की राजनीति में एक बहुत बड़े ‘पावर सेंटर’ की वापसी का शंखनाद है। ‘अखिलीक्स’ दावे के साथ कह सकता है कि अगर नरोत्तम मिश्रा अपनी पुरानी लय में यह किला फतह कर लेते हैं, तो भोपाल लौटकर वो सिर्फ एक विधायक बनकर नहीं बैठेंगे।
दतिया की यह जीत उनकी ताजपोशी का वो वारंट होगी, जो उन्हें सीधे मध्य प्रदेश सरकार की कैबिनेट में ले जाएगी। और यह भी तय मानिए कि वापसी के बाद उन्हें कोई छोटा-मोटा विभाग नहीं, बल्कि सरकार का कोई बहुत बड़ा और ‘मलाईदार’ पोर्टफोलियो सौंपा जाएगा, जो सरकार और संगठन दोनों में उनकी हैसियत को फिर से नंबर दो पर लाकर खड़ा कर देगा।
15 जून के पहले जैसे ही तारीखों का ऐलान होगा, दतिया की सड़कें इस ‘कमबैक’ की गवाह बनेंगी। क्या घनश्याम सिंह इस सियासी तूफान में टिक पाएंगे, या फिर नरोत्तम मिश्रा एक बार फिर अपने पुराने अंदाज में दतिया का किला फतह कर भोपाल में एक बड़े मंत्री की कुर्सी पर काबिज होंगे? दतिया के इस सियासी घमासान और पर्दे के पीछे चल रहे हर खेल पर अखिलीक्स की पैनी नजर बनी रहेगी।

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