अखिलीक्स एक्सक्लूसिव: दतिया उपचुनाव में बिछी सियासी बिसात, नरोत्तम का ‘माइक्रो-मैनेजमेंट’ बनाम कांग्रेस की गुटबाजी
मध्य प्रदेश की हाई-प्रोफाइल दतिया विधानसभा सीट पर उपचुनाव का सियासी तापमान अब अपने चरम पर पहुंच चुका है। कांग्रेस विधायक राजेंद्र भारती की सदस्यता समाप्त होने के बाद खाली हुई इस सीट पर 2 अक्टूबर 2026 की डेडलाइन से पहले चुनाव होने हैं। सत्ता और वर्चस्व की इस दिलचस्प बिसात पर यह चुनाव महज एक सीट का गणित नहीं रह गया है, बल्कि यह दिग्गजों की साख और नए सामाजिक प्रयोगों की एक बड़ी प्रयोगशाला बन चुका है। ‘अखिलीक्स’ की इस एक्सक्लूसिव ‘डीप डाइव’ रिपोर्ट में पढ़िए दतिया के मौजूदा जमीनी हालात और सियासी दांव-पेचों का पूरा कच्चा-चिट्ठा।
बीजेपी: डॉ. नरोत्तम मिश्रा का ‘माइक्रो-कास्ट’ मैनेजमेंट
भारतीय जनता पार्टी की तरफ से चुनावी कमान पूरी तरह से पूर्व गृहमंत्री डॉ. नरोत्तम मिश्रा के हाथों में है और उपचुनाव में उनका प्रत्याशी होना लगभग तय माना जा रहा है। चुनाव की तारीखों के ऐलान का इंतजार किए बिना ही उन्होंने अपनी मजबूत फील्डिंग सजानी शुरू कर दी है। उनकी रणनीति के केंद्र में है अचूक ‘माइक्रो-कास्ट’ मैनेजमेंट। पिछले दो महीनों से डॉ. मिश्रा का पूरा फोकस सोशल इंजीनियरिंग और कांग्रेस के परंपरागत वोटबैंक में सेंधमारी करने पर टिका है।
मई का महीना दतिया बीजेपी के लिए सघन सदस्यता अभियान का गवाह बना। जातियों के प्रभावशाली चेहरों को पार्टी से जोड़ने की यह कवायद ऐन वक्त पर चुनावी नतीजे पलटने की सोची-समझी रणनीति का हिस्सा है:
5 मई: क्षत्रिय समाज का बीजेपी में शामिल होना।
14 मई: जौहरिया और आसपास के यादव मतदाताओं की गोलबंदी।
24 व 29 मई: पाल समाज के युवाओं ने डॉ. मिश्रा के नेतृत्व में बीजेपी का दामन थामा।
कांग्रेस: मंच की एकता और पर्दे के पीछे का घमासान
दूसरी तरफ, कांग्रेस फिलहाल अपने बिखरे हुए संगठन को समेटने और कैडर को लामबंद करने की जद्दोजहद में जुटी है। ब्लॉक, मंडलम और बूथ स्तर की बैठकों के बाद, बीती 2 जून को कांग्रेस का बहुप्रतीक्षित कार्यकर्ता सम्मेलन संपन्न हुआ। इस मंच पर राजेंद्र भारती, अवधेश नायक, पूर्व मंत्री महेंद्र बौद्ध और पूर्व विधायक घनश्याम सिंह जैसे तमाम क्षत्रप एक साथ नजर आए। पार्टी ने इस आयोजन के जरिए शक्ति प्रदर्शन और एकजुटता का मजबूत संदेश देने की भरपूर कोशिश की। लेकिन दतिया की सियासी तासीर को समझने वाले बखूबी जानते हैं कि मंच की यह एकता भीतर मचे घमासान और वर्चस्व की लड़ाई पर डाला गया एक अस्थाई पर्दा मात्र है।
टिकट की रेस में घनश्याम सिंह सबसे आगे
अखिलीक्स के पुख्ता इनपुट्स और अंदरूनी सूत्रों की मानें तो कांग्रेस के भीतर टिकट को लेकर मची खींचतान अब एक निर्णायक मोड़ पर आ गई है। इस रेस में पूर्व विधायक घनश्याम सिंह बाकी सभी दावेदारों को पछाड़कर सबसे आगे निकल चुके हैं। अपनी मजबूत प्रशासनिक पकड़ और बेदाग छवि के चलते हाईकमान के गलियारों में उनके नाम पर सबसे गंभीरता से विचार हो रहा है।
घनश्याम सिंह की इस बढ़त ने पार्टी के बाकी खेमों में खासी बेचैनी पैदा कर दी है:
पूर्व विधायक राजेंद्र भारती अपने सियासी रसूख का इस्तेमाल कर हर हाल में अपने बेटे की राजनीतिक लॉन्चिंग कराना चाहते हैं।
पाठ्यपुस्तक निगम के पूर्व उपाध्यक्ष अवधेश नायक 2023 के चुनाव में किए गए अपने ‘त्याग’ का सिला मांग रहे हैं।
इनके अलावा करीब आधा दर्जन नेता टिकट की आस में भोपाल से लेकर दिल्ली दरबार तक की परिक्रमा कर रहे हैं।
टिकट बंटवारे के बाद इस अंदरूनी असंतोष और बगावत को साधना कांग्रेस के लिए सबसे बड़ी अग्निपरीक्षा साबित होने वाली है।
एएसपी (ASP) की एंट्री: त्रिकोणीय मुकाबले का ‘स्पॉइलर’ अलर्ट
इन दोनों प्रमुख दलों के सीधे मुकाबले के बीच ‘आजाद समाज पार्टी’ (ASP) ने दामोदर यादव को अपना चेहरा बनाकर चुनावी दंगल को त्रिकोणीय और बेहद रोचक बना दिया है। दामोदर यादव की जमीनी सक्रियता दोनों बड़े दलों का खेल बिगाड़ने का माद्दा रखती है। उदगवां में किसान सम्मेलन से लेकर सेवढ़ा, भांडेर और इंदरगढ़ में लगातार हो रही उनकी बैठकें चर्चा का विषय बनी हुई हैं। बसपा और कांग्रेस के कई कार्यकर्ताओं का उनकी पार्टी से जुड़ने का दावा अगर धरातल पर सच साबित होता है, तो वह एक बेहद मजबूत ‘स्पॉइलर’ बन सकते हैं। उनकी यह रणनीति विशेष रूप से उस यादव वोटबैंक पर सीधा असर डालेगी, जिसे साधने में डॉ. नरोत्तम मिश्रा भी अपनी पूरी ताकत झोंक रहे हैं।
राजनीतिक दलों की इस रस्साकशी के बीच निर्वाचन आयोग भी एक्शन मोड में आ चुका है और दतिया में ईवीएम की ‘फर्स्ट लेवल चेकिंग’ (FLC) शुरू कर दी गई है। कुल मिलाकर, दतिया का यह उपचुनाव अब एक तरफ डॉ. नरोत्तम मिश्रा की व्यक्तिगत साख और जातियों को जोड़ने के उनके अनुभव पर टिका है, तो दूसरी तरफ यह कांग्रेस के टिकट प्रबंधन और आंतरिक गुटबाजी को रोकने की क्षमता का लिटमस टेस्ट है। आने वाले दिनों में कांग्रेस का आधिकारिक टिकट ऐलान और दामोदर यादव का सियासी डैमेज ही इस चुनाव की अंतिम दिशा तय करेगा।



