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मोहन का ‘सुभद्राओं’ को सम्मान: 5 साल की गारंटी, बाजार में बूम और आत्मनिर्भरता का नया दौर

राजनीति में योजनाएं अक्सर चुनावी हार-जीत के गणित से तय होती हैं, लेकिन मध्य प्रदेश में डॉ. मोहन यादव की सरकार ने ‘मातृशक्ति’ के लिए जो लकीर खींची है, वह एक बड़ा नीतिगत मास्टरस्ट्रोक है। मुख्यमंत्री ने प्रदेश की करोड़ों ‘सुभद्राओं’ (लाड़ली बहनों और बेटियों) को सिर्फ कुछ समय की राहत नहीं दी है, बल्कि अगले 5 सालों (2030-31) के लिए उनके सम्मान और आर्थिक सुरक्षा की एक पक्की व्यवस्था कर दी है। सरकार ने लाड़ली बहना, लाड़ली लक्ष्मी और मातृ वंदना योजना के लिए 1 लाख 30 हजार करोड़ रुपये से अधिक का भारी-भरकम बजट तय करके उन सभी अफवाहों पर हमेशा के लिए ताला लगा दिया है, जिनमें इन योजनाओं के बंद होने की आशंकाएं जताई जा रही थीं।
इस बड़े फैसले की टाइमिंग और अंदाज़ भी सीधे आम जनता के दिल को छूने वाला है। मैहर की पवित्र धरती से रक्षाबंधन के मौके पर मुख्यमंत्री ने 1.25 करोड़ से ज्यादा बहनों के खातों में एक क्लिक से 2,148 करोड़ रुपये ट्रांसफर किए। बहनों को मिलने वाली ₹1500 की नियमित किस्त में ₹250 का रक्षाबंधन का ‘शगुन’ जोड़कर कुल ₹1750 का यह उपहार भेजना, सरकार का महिलाओं की छोटी-छोटी खुशियों और त्योहारों से गहरे पारिवारिक जुड़ाव को दर्शाता है।
लेकिन, असली तस्वीर इससे भी बड़ी है। यह योजना अब सिर्फ ‘सरकारी अनुदान’ या नकद सहायता तक सीमित नहीं रही, बल्कि राज्य की अर्थव्यवस्था का एक बड़ा इंजन बन चुकी है। SBI रिसर्च और अन्य आर्थिक अध्ययनों के आंकड़े बताते हैं कि इस योजना का ‘मल्टीप्लायर इफ़ेक्ट’ (Multiplier Effect) 1.7 है। आसान भाषा में कहें तो, सरकार द्वारा महिलाओं के खाते में डाले गए हर 1 रुपये से बाजार में 1.70 रुपये की आर्थिक गतिविधि पैदा हो रही है। लाभार्थी महिलाओं का स्थानीय दुकानों पर खर्च, गैर-लाभार्थियों की तुलना में लगभग ₹9,300 अधिक बढ़ा है। इसका सीधा असर यह हुआ है कि ग्रामीण और स्थानीय बाजारों की खुदरा बिक्री (Retail Sales) में 6% से 9% तक का भारी उछाल आ गया है।
जमीन पर इसका सीधा सकारात्मक असर महिलाओं के जीवन स्तर पर दिख रहा है। सर्वे बताते हैं कि 55% से ज्यादा महिलाएं इस पैसे का इस्तेमाल बच्चों की पढ़ाई, कपड़ों और परिवार के अच्छे खान-पान पर कर रही हैं। गांवों में दूध, हरी सब्जियों और दालों की खपत बढ़ी है, जो कुपोषण को कम करने में बड़ी भूमिका निभा रहा है। जो महिलाएं पहले बच्चों की फीस या घर के राशन जैसी छोटी जरूरतों के लिए पुरुषों पर निर्भर थीं, वे अब खुद आर्थिक फैसले ले रही हैं। हर महीने बैंक खातों में पैसा आने से महिलाओं की बैंकिंग आदतें सुधरी हैं, डिजिटल लेनदेन बढ़ा है और बैंकों में उनकी साख (Credit Score) मजबूत हो रही है।
इस पूरी कवायद का सबसे दूरगामी पहलू महिलाओं को रोजगार मांगने वाले की जगह रोजगार देने वाला (एंटरप्रेन्योर) बनाना है। मुख्यमंत्री की यह नई घोषणा एक असली ‘गेमचेंजर’ है कि अगर लाड़ली बहनें अपना कोई उद्योग या रेडीमेड गारमेंट का काम शुरू करती हैं, तो सरकार उन्हें ₹5000 की अलग से आर्थिक मदद और लोन के ब्याज पर 2% की छूट देगी। जब महिलाओं के हाथ में यह शुरुआती पूंजी आती है, तो वे सिलाई-कढ़ाई या किराना दुकान जैसे स्वरोजगार से जुड़ती हैं और गाय-भैंस जैसे आय के छोटे साधन खरीदकर आत्मनिर्भर बनती हैं।
लंबे समय में यह कदम भारत की कम महिला श्रम बल भागीदारी (FLFPR) को बढ़ाने में एक मील का पत्थर साबित होगा और ग्रामीण मांग को लगातार मजबूत रखेगा। कुल मिलाकर देखें तो, प्रधानमंत्री मातृ वंदन योजना और आशा कार्यकर्ताओं के लिए 11,835 करोड़ रुपये का बजट पास करना यह साफ करता है कि सरकार महिलाओं के स्वास्थ्य, शिक्षा और स्वरोजगार के एक 360-डिग्री इकोसिस्टम पर काम कर रही है। आज लाड़ली बहना योजना केवल एक नकद ट्रांसफर नहीं, बल्कि महिलाओं की आर्थिक आत्मनिर्भरता और अर्थव्यवस्था को मजबूत करने का देश का सबसे सफल और सकारात्मक मॉडल बन चुकी है।

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