मध्य प्रदेश में फाइलों की ‘साइलेंट क्रांति’: CPGRAMS रिपोर्ट में खुला MP के सुशासन का सबसे बड़ा ‘सीक्रेट’
नमस्कार दोस्तों, आज के इस डीप डाइव में हम उस सच्चाई की तह तक जाएंगे जिसे अक्सर राजनैतिक शोर-शराबे और नकारात्मकता के नीचे दबा दिया जाता है। जब भी सरकारी तंत्र की बात आती है, तो कुछ आलोचक हमेशा ‘फाइलों के अटकने’ और ‘सिस्टम की सुस्ती’ का राग अलापते हैं। लेकिन क्या मध्य प्रदेश की ज़मीनी हकीकत वाकई ऐसी ही है? जब हमने भारत सरकार के प्रशासनिक सुधार और लोक शिकायत विभाग (DARPG) की जून 2026 की 47वीं CPGRAMS रिपोर्ट के पन्नों को गहराई से खंगाला, तो जो ‘सीक्रेट’ निकलकर सामने आया, उसने गुड गवर्नेंस पर सवाल उठाने वालों की बोलती बंद कर दी है। सच्चाई यह है कि मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के नेतृत्व में मध्य प्रदेश का प्रशासनिक अमला फाइलों के भीतर एक ऐसी ‘साइलेंट क्रांति’ कर रहा है, जिसने राज्य को पूरे देश में सुशासन का एक नया रोल मॉडल बना दिया है।
‘नागरिक संतुष्टि’ में देश में बजा मध्य प्रदेश का डंका
आइए सीधे उन आंकड़ों की बात करते हैं जिन्हें कोई भी आसानी से झुठला नहीं सकता। आपने अक्सर यह नैरेटिव सुना होगा कि सरकारी दफ्तरों में आम आदमी की कोई सुनवाई नहीं होती, लेकिन केंद्र सरकार का यह आधिकारिक डेटा एक बिलकुल अलग और बेहद सकारात्मक तस्वीर पेश कर रहा है। इस रिपोर्ट के अनुसार, मध्य प्रदेश ने ‘नागरिक संतुष्टि’ (Citizen Satisfaction) में 78 प्रतिशत के शानदार स्कोर के साथ पूरे देश में दूसरा स्थान हासिल किया है।
यह कोई मामूली उपलब्धि नहीं है। इसका सीधा मतलब यह है कि जब कोई आम नागरिक अपनी शिकायत लेकर सिस्टम के पास पहुँचता है, तो सरकारी मशीनरी न सिर्फ उसे गंभीरता से सुनती है, बल्कि इतनी तेज़ी से एक्शन लेती है कि शिकायतकर्ता दिए गए समाधान से पूरी तरह संतुष्ट होकर लौटता है। आम जनता और सरकार के बीच का यह भरोसा ही सुशासन की असली नींव है।
बुलेट ट्रेन की रफ्तार से हो रहा शिकायतों का निपटारा
अगर हम सिर्फ जून 2026 के एक महीने का रिपोर्ट कार्ड देखें, तो राज्य की कार्यकुशलता हैरान करने वाली है। इस महीने राज्य में 5,083 नई शिकायतें आईं, और सिस्टम ने लालफीताशाही को दरकिनार करते हुए 4,703 शिकायतों का तुरंत निपटारा कर दिया। लगभग 92 प्रतिशत से अधिक के इस शानदार ‘डिस्पोजल रेट’ और बेहतरीन कार्यकुशलता के दम पर राज्य ने शिकायत निवारण के मामले में देश में सातवां स्थान पक्का किया है। यह आंकड़ा गवाही देता है कि मध्य प्रदेश का प्रशासनिक ढांचा अब फाइलों को दबाने में नहीं, बल्कि उन्हें निपटाने में यकीन रखता है।
‘पेंडिंग फाइलों’ का वह सच, जो आलोचक नहीं बताते
अब कुछ लोग जानबूझकर उन लंबित मामलों (11,851) की तरफ इशारा करके इस ऐतिहासिक सफलता पर पानी फेरने की कोशिश कर सकते हैं, लेकिन इस ‘पेंडिंग मीटर’ के पीछे का असली सच समझना भी बेहद ज़रूरी है। सुशासन का एक बुनियादी नियम है—जब सिस्टम पारदर्शी होता है और जनता का भरोसा सरकार पर बढ़ता है, तो स्वाभाविक रूप से शिकायतों का आंकड़ा भी बढ़ता है। लोग तभी शिकायत करते हैं, जब उन्हें पता हो कि उनकी सुनवाई होगी।
पिछले छह महीनों (जनवरी से जून 2026) में सिस्टम के सामने 35,099 मामलों का भारी वर्कलोड था। किसी भी साधारण प्रशासन के लिए इस पहाड़ जैसी चुनौती से निपटना मुश्किल था, लेकिन मध्य प्रदेश सरकार ने दिन-रात एक करके इनमें से 23,248 मामलों को सफलतापूर्वक सुलझा लिया है। जो फाइलें अभी पेंडिंग हैं, वे सिस्टम की नाकामी नहीं हैं, बल्कि एक तेज़ गति से चल रही ‘समाधान प्रक्रिया’ का हिस्सा हैं।
‘नंबर वन’ बनने की ओर मजबूती से बढ़ते कदम
मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने इस शानदार सफलता का श्रेय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मार्गदर्शन और राज्य के सुधरे हुए वर्क कल्चर को दिया है। उन्होंने यह स्पष्ट कर दिया है कि उनका लक्ष्य अब यहीं रुकना नहीं है। मध्य प्रदेश अब सिर्फ टॉप 5 या टॉप 3 की रेस में नहीं रहना चाहता, बल्कि सुशासन और जन-सुनवाई की यह लहर राज्य को देश का ‘नंबर वन’ राज्य बनाने की ओर तेज़ी से ले जा रही है।
अखिलीक्स की इस पड़ताल से एक बात तो साफ है—मध्य प्रदेश में अब फाइलें धूल नहीं खा रहीं, बल्कि आम जनता के हकों और उनके समाधान की इबारत लिख रही हैं।



