यूपी का सियासी चक्रव्यूह: सत्ता की चाबी और ‘पंडित’ फैक्टर पर बिछती नई बिसात
उत्तर प्रदेश की सियासत में जातियों का अंकगणित कोई नई बात नहीं है। लेकिन, आगामी विधानसभा चुनाव से पहले जो नई बिसात बिछ रही है, उसकी पूरी धुरी एक ही विशेष वर्ग के इर्द-गिर्द घूम रही है। ‘अखिलीक्स’ के इस डीप-डाइव विश्लेषण में आज हम उस पर्दे के पीछे की कहानी को डिकोड कर रहे हैं, जिसे राजनीतिक दल मंचों से तो कुछ और बताते हैं, लेकिन बंद कमरों की रणनीति में हकीकत कुछ और ही होती है। तमाम दल भले ही पिछड़े और दलितों की गोलबंदी का शोर मचा रहे हों, लेकिन हर सियासी रणनीतिकार यह बखूबी जानता है कि यूपी के सत्ता-सिंहासन की चाबी बिना ब्राह्मणों के ‘आशीर्वाद’ के नहीं घूम सकती।
प्रदेश में 10 प्रतिशत से अधिक की आबादी वाला यह वो मुखर तबका है, जो सीधे तौर पर 100 से अधिक विधानसभा सीटों की हार-जीत तय करता है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि अपनी ‘ओपिनियन मेकिंग’ क्षमता से यह वर्ग पूरे सूबे का नैरेटिव सेट करने का माद्दा रखता है। यही कारण है कि आगामी चुनाव में हर दल की नज़र इस प्रभावशाली वोट बैंक को अपने पाले में करने पर टिकी है।
इस सियासी चक्रव्यूह में सबसे दिलचस्प और आक्रामक दांव समाजवादी पार्टी चल रही है। अपने ‘पीडीए’ (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) फॉर्मूले से संजीवनी पा चुके सपा प्रमुख अखिलेश यादव अब इसी फॉर्मूले का एक अपग्रेडेड वर्जन तैयार कर रहे हैं। सपा की कोशिश अब इस ‘पीडीए’ के ‘पी’ में ‘पंडित’ को भी समाहित करने की है। यह सिर्फ एक शब्द का खेल नहीं है, बल्कि उस पारंपरिक वोट बैंक में सेंध लगाने की सोची-समझी रणनीति है, जो कभी कांग्रेस का और अब भाजपा का सबसे मजबूत आधार माना जाता है।
दूसरी तरफ, बहुजन समाज पार्टी की मुखिया मायावती भी खामोशी से अपने उसी 2007 वाले मास्टरस्ट्रोक की तरफ लौट रही हैं। यह ‘सोशल इंजीनियरिंग’ का वो अचूक प्रयोग था, जिसने दलित-ब्राह्मण गठजोड़ के दम पर हाथी को सीधे लखनऊ के तख्त तक पहुंचाया था। बसपा अब संगठन में फेरबदल से लेकर भावी टिकट बंटवारे तक में ब्राह्मणों को प्रमुखता देकर, फिर से वही खोया हुआ भरोसा जीतने की जद्दोजहद में जुटी है।
विपक्ष की इस चौतरफा घेरेबंदी ने सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी के सामने एक गंभीर चुनौती खड़ी कर दी है। राम मंदिर आंदोलन के बाद से यह वर्ग मोटे तौर पर भाजपा का अजेय दुर्ग रहा है, लेकिन हालिया समय में सरकार और प्रशासन से ब्राह्मणों की कथित नाराजगी, और उपेक्षा की सुगबुगाहटों ने पार्टी आलाकमान को अलर्ट कर दिया है। विपक्ष इसी असंतोष को भुनाने की ताक में है। यही कारण है कि भाजपा अब अपने इस परंपरागत आधार को छिटकने से रोकने के लिए डैमेज कंट्रोल और सीधे संवाद के ‘माइक्रो-मैनेजमेंट’ पर उतर आई है। पार्टी का शीर्ष नेतृत्व अब ब्राह्मण समाज के बुद्धिजीवियों, अधिवक्ताओं, शिक्षकों और धार्मिक संस्थानों के प्रतिनिधियों के साथ भीतरखाने संपर्क साध रहा है, ताकि असंतोष की किसी भी चिंगारी को चुनाव से पहले ही बुझाया जा सके।
लब्बोलुआब यह है कि यूपी का अगला चुनाव महज़ विकास या हिंदुत्व के नाम पर नहीं, बल्कि इस बात पर लड़ा जाएगा कि कौन सा दल इस प्रभावशाली वोट बैंक को अपने पाले में एकजुट रख पाता है। सियासत की हर करवट और अंदरूनी समीकरणों की ऐसी ही बेबाक पड़ताल के लिए जुड़े रहिए ‘अखिलीक्स’ के साथ।



