अखिलीक्स डीप डाइव: ओबीसी आरक्षण के ‘सियासी चक्रव्यूह’ की इनसाइड स्टोरी, जानिए कैसे सीएम मोहन यादव ने पलटी बाजी
मध्य प्रदेश की सियासत में जब भी पिछड़ों के हकों की बात होती है, तो अक्सर बंद कमरों में एक ऐसा सियासी चक्रव्यूह रचा जाता है, जिसकी सबसे भारी कीमत प्रदेश के होनहार और बेरोजगार युवाओं को चुकानी पड़ती है। सात साल लंबी कानूनी जंग के बाद हाल ही में जबलपुर हाई कोर्ट का जो फैसला आया है, जिसमें ओबीसी को 14 फीसदी से ज्यादा आरक्षण देना असंवैधानिक करार दिया गया है, वह कोई सामान्य अदालती आदेश नहीं है। दरअसल, यह उस पुरानी राजनीतिक भूल का पर्दाफाश है जिसकी कच्ची स्क्रिप्ट साल 2019 में लिखी गई थी। अखिलीक्स (Akhileaks.com) के इस एक्सक्लूसिव डीप डाइव में आज हम उसी पर्दे के पीछे की पूरी इनसाइड स्टोरी डिकोड कर रहे हैं। हम यह समझेंगे कि कैसे मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकार द्वारा बुने गए इस लचर कानूनी जाल को बेनकाब किया है और पिछड़ों के वास्तविक अधिकारों की रक्षा के लिए सीधा मोर्चा खोल दिया है।
इस पूरे आरक्षण विवाद की जड़ें साल 2019 में तत्कालीन कमलनाथ सरकार द्वारा लिए गए उस बहुचर्चित फैसले में गहरी धंसी हुई हैं, जिसे आज सत्ता पक्ष और देश के दिग्गज कानूनी जानकार महज एक ‘चुनावी शिगूफा’ बता रहे हैं। आरोप बेहद गंभीर और स्पष्ट हैं कि यह फैसला केवल तात्कालिक लोकप्रियता हासिल करने और चुनावी लाभ बटोरने के लिए भारी हड़बड़ी में लिया गया था। बिना किसी पुख्ता सामाजिक-आर्थिक सर्वे के, बिना किसी ‘विशेष परिस्थिति’ के प्रामाणिक आंकड़े जुटाए और सुप्रीम कोर्ट द्वारा तय की गई 50 प्रतिशत की संवैधानिक लक्ष्मण रेखा को पार करते हुए यह अध्यादेश प्रदेश के युवाओं पर थोप दिया गया था। खुद मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने सामने आकर यह सबसे बड़ा और चौंकाने वाला खुलासा किया है कि उस वक्त जल्दबाजी का आलम यह था कि इतने संवेदनशील और दूरगामी प्रभाव वाले मुद्दे पर ‘राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग’ (NCBC) तक से कोई वैधानिक सलाह लेना जरूरी नहीं समझा गया। जाहिर है, जिस कानून की बुनियाद ही इतनी खोखली और बिना होमवर्क के रखी गई हो, उसका अदालत की कसौटी पर ढह जाना पहले दिन से ही तय माना जा रहा था, और जमीनी हकीकत भी यही रही कि उस आधे-अधूरे राजनीतिक फैसले ने हजारों ओबीसी युवाओं की भर्तियों पर सालों के लिए मजबूत ताला जड़ दिया।
हालांकि, इस बेहद जटिल और उलझे हुए संकट को विरासत में पाने के बावजूद, मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने इससे अपना पल्ला झाड़ने या बहाने बनाने के बजाय फ्रंटफुट पर आकर आक्रामक बैटिंग करना चुना। उन्होंने इस संवेदनशील मुद्दे को तुरंत दलगत राजनीति से ऊपर उठाया, एक सर्वदलीय बैठक बुलाई और पूरे प्रदेश में एक साझा सहमति बनाने की सकारात्मक पहल की। युवाओं के भविष्य को बचाने के लिए राज्य सरकार ने देश के शीर्ष कानूनी विशेषज्ञों और वरिष्ठ वकीलों की पूरी एक फौज को हाई कोर्ट में उतारा। सरकार की इसी आक्रामक और ठोस पैरवी का सीधा नतीजा है कि अदालत ने साल 2019 से 2022 के बीच चयनित हो चुके युवाओं की 13 प्रतिशत अतिरिक्त नियुक्तियों को पूरी तरह संरक्षित करते हुए उन्हें आगामी भर्तियों में समायोजित करने का महत्वपूर्ण निर्देश दिया है। इसका सीधा अर्थ यह है कि सरकार अनगिनत परिवारों का भविष्य और उनका रोजगार बर्बाद होने से बचाने में काफी हद तक कामयाब रही है। यह अलग बात है कि 2022 के बाद की भर्तियों के लिए कोर्ट ने होल्ड किए गए 13 प्रतिशत पदों पर सामान्य वर्ग को नियुक्ति देने को कहा है, जिसने पुराने और त्रुटिपूर्ण कानून की खामियों को पूरी तरह से जनता के सामने उजागर कर दिया है।
अब जबकि हाई कोर्ट का यह अहम फैसला आ चुका है, डॉ. मोहन यादव की सरकार का रुख भविष्य को लेकर एकदम स्पष्ट और बेहद आक्रामक है। मुख्यमंत्री ने दो टूक शब्दों में यह साफ कर दिया है कि पिछड़ों के हक की यह लड़ाई अभी खत्म नहीं हुई है, बल्कि एक नए चरण में प्रवेश कर गई है। फिलहाल राज्य सरकार हाई कोर्ट के इस विस्तृत निर्णय का बहुत ही गहन विधिक परीक्षण कर रही है ताकि आगामी कानूनी कार्यवाही की अचूक रणनीति तय की जा सके। प्रदेश के मुखिया का संदेश बिल्कुल साफ है कि पिछली सरकार की राजनीतिक गलतियों और लचर ड्राफ्टिंग के कारण आए इस निराशाजनक फैसले को अब सुप्रीम कोर्ट में पूरी मजबूती और प्रामाणिकता के साथ चुनौती दी जाएगी। ओबीसी वर्ग को उनका पूर्ण और संवैधानिक 27 प्रतिशत हक दिलाने के लिए मौजूदा सरकार किसी भी हद तक जाने को तैयार है और वह देश की सबसे बड़ी अदालत में पूरी पुख्ता तैयारी के साथ उतरेगी। अब अखिलीक्स की नजर भी इस बात पर टिकी है कि दिल्ली के कानूनी गलियारों में डॉ. मोहन यादव की यह मजबूत और नई पैरवी, कैसे इस पुरानी सियासी उलझन को हमेशा के लिए सुलझाकर मध्य प्रदेश के लाखों युवाओं के लिए न्याय का एक नया और स्थायी रास्ता खोलती है।



