अखिलीक्स एक्सक्लूसिव: मध्य प्रदेश में लाल आतंक के खात्मे के बाद अब ‘सफेद जहर’ पर सर्जिकल स्ट्राइक, हॉक फोर्स करेगी ड्रग माफियाओं का एनकाउंटर
असली बंदूकें और गोलियां जंगलों में भले ही खामोश हो चुकी हों, लेकिन अब मध्य प्रदेश की फिजाओं में एक ऐसा साइलेंट किलर तैर रहा है, जो बिना गोली चलाए पीढ़ियों को तबाह कर रहा है। बालाघाट, मंडला और डिंडोरी के घने जंगलों से लाल आतंक यानी नक्सलवाद को उखाड़ फेंकने के बाद, अब मध्य प्रदेश सरकार ने ‘सफेद जहर’ यानी ड्रग्स और नशे के सिंडिकेट को नेस्तनाबूद करने का अपना सबसे बड़ा टारगेट सेट कर लिया है। केंद्र सरकार के ‘नशामुक्त भारत वर्ष-2029’ के लक्ष्य को साधने के लिए प्रदेश में एक बेहद ताकतवर ‘एंटी नारकोटिक्स टास्क फोर्स’ (ANTF) का गठन होने जा रहा है, जिसमें नक्सलियों का काल बनी ‘हॉक फोर्स’ के जांबाज अब ड्रग माफियाओं का हिसाब करने के लिए सीधे मैदान में उतरेंगे।
मध्य प्रदेश के तकरीबन सभी जिले आज मादक पदार्थों के अवैध कारोबार की चपेट में हैं, जबकि विडंबना यह है कि अब तक नारकोटिक्स विंग का सिर्फ एकमात्र थाना इंदौर में मौजूद था। एक थाने के भरोसे पूरे प्रदेश के ड्रग कार्टेल पर नकेल कसना प्रशासनिक और रणनीतिक रूप से नामुमकिन साबित हो रहा था, लेकिन अब इस पूरे भूगोल को बदला जा रहा है। गृह विभाग को भेजे गए नए और विस्तृत प्रस्ताव के मुताबिक, प्रदेश के आठ रणनीतिक जिलों—भोपाल, इंदौर, जबलपुर, ग्वालियर, उज्जैन, सागर, रीवा और मंडला में स्पेशल नारकोटिक्स थाने स्थापित किए जाएंगे। इस पूरी टास्क फोर्स का कमांड सेंटर यानी मुख्यालय भोपाल या इंदौर में से किसी एक शहर में बनाया जाएगा, जहां से प्रदेश भर में फैले नशे के काले कारोबार की कमर तोड़ी जाएगी।
इस महा-ऑपरेशन की नींव इसी साल 26 जून को दिल्ली में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की अध्यक्षता में हुई हाई-लेवल मीटिंग में रखी गई थी, जिसके बाद 3 अगस्त को नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो (NCB) ने राज्य सरकार को पदों और मानकों का पूरा ब्लूप्रिंट भेजा था। चूंकि मध्य प्रदेश अब आधिकारिक तौर पर नक्सलमुक्त घोषित हो चुका है, इसलिए सरकार ने एक स्मार्ट रणनीतिक बदलाव करते हुए अप्रैल 2025 में हॉक फोर्स के लिए स्वीकृत 325 नए पदों का इस्तेमाल अब नशे के सौदागरों के खिलाफ करने का फैसला किया है। नई एंटी नारकोटिक्स टास्क फोर्स में कुल 451 स्थायी और 54 अस्थायी तकनीकी पद होंगे। इसमें मौजूदा नारकोटिक्स विंग के 213 पद ज्यों के त्यों रहेंगे, जबकि हॉक फोर्स से 238 जवानों को एएनटीएफ में मर्ज किया जाएगा। ग्राउंड जीरो पर ऑपरेशन्स को अंजाम देने के लिए डीएसपी, इंस्पेक्टर, सब-इंस्पेक्टर और एएसआई स्तर के 122 तेजतर्रार अधिकारी और 116 आरक्षक सीधे तौर पर कमान संभालेंगे।
इस पूरी प्रशासनिक कवायद का सबसे दिलचस्प पहलू इसका बजट प्रबंधन और बचत का सटीक गणित है। इतनी बड़ी नई फोर्स और आठ नए थाने बनने के बावजूद राज्य सरकार के खजाने पर एक रुपए का भी अतिरिक्त भार नहीं पड़ेगा। दरअसल, नक्सल मोर्चे पर तैनात हॉक फोर्स के जवानों और अफसरों को उनके मूल वेतन का 70 फीसदी ‘जोखिम भत्ता’ (रिस्क अलाउंस) मिलता है, जिस पर सालाना करीब 9.25 करोड़ रुपए खर्च होते हैं। जब ये पद एएनटीएफ में शिफ्ट होंगे, तो इसी जोखिम भत्ते की राशि में से सालाना 4.10 करोड़ रुपए खर्च करके संविदा पर 54 हाई-टेक और तकनीकी एक्सपर्ट्स की भर्ती की जाएगी।
इस भारी-भरकम सेटअप के बावजूद, सरकार के खजाने में हर साल करीब 5.14 करोड़ रुपए की सीधी बचत होगी। एक तरफ जहां हॉक फोर्स की टैक्टिकल ट्रेनिंग और कॉम्बैट एक्सपीरियंस अब ड्रग पेडलर्स के खिलाफ इस्तेमाल होगा, वहीं 54 टेक्निकल एक्सपर्ट्स की टीम डार्क वेब, क्रिप्टो ट्रांजैक्शन और डिजिटल ट्रेल्स के जरिए अंतरराष्ट्रीय और अंतरराज्यीय नशे के नेटवर्क को ट्रैक करेगी। यह महत्वपूर्ण फाइल फिलहाल गृह विभाग से वित्त विभाग की मंजूरी के लिए बढ़ चुकी है, और हरी झंडी मिलते ही मध्य प्रदेश में सफेद जहर के कारोबारियों के खिलाफ अब तक का सबसे बड़ा और हाइटेक ऑपरेशन शुरू हो जाएगा।



