एमपी में आयुष्मान योजना पर ‘अफसरशाही’ का ग्रहण: क्या मुख्यमंत्री मोहन यादव को अंधेरे में रख रहे हैं अधिकारी?

भोपाल | अखिलीक्स (Akhileaks) एक्सक्लूसिव
लेखक: अखिलेश सोलंकी
भूमिका: एक योजना, दो चेहरे
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सबसे महत्वाकांक्षी योजना ‘आयुष्मान भारत’, जिसका लक्ष्य गरीब को मुफ्त और बेहतर इलाज देना है, आज मध्य प्रदेश के वल्लभ भवन की फाइलों में दम तोड़ती नजर आ रही है। मुख्यमंत्री मोहन यादव एक तरफ प्रदेश में सुशासन और ‘अंत्योदय’ की बात कर रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ उनके ही सिपहसालार यानी प्रदेश के आला अधिकारियों ने एक ऐसा ‘नियम’ थोप दिया है जो सीधे गरीब की जेब और जान पर डाका डालने जैसा है। सवाल सीधा है—जब पूरे देश में आयुष्मान कार्ड से इलाज के लिए किसी खास सर्टिफिकेट की मजबूरी नहीं है, तो फिर मध्य प्रदेश के चार बड़े महानगरों में ही यह ‘एक्सपेरिमेंट’ क्यों किया जा रहा है?
31 मार्च की डेडलाइन और ‘अस्पताल बंदी’ का खौफ
अखिलीक्स के पास मौजूद एक्सक्लूसिव डेटा की परतें उधेड़ें तो रोंगटे खड़े हो जाते हैं। मध्य प्रदेश के चार प्रमुख शहरों—भोपाल, इंदौर, ग्वालियर और जबलपुर—के अस्पतालों में 31 मार्च के बाद सन्नाटा पसरने वाला है। इन महानगरों में कुल 480 निजी अस्पताल आयुष्मान योजना के तहत पंजीकृत हैं, लेकिन अफसरों के नए ‘NABH फाइनल लेवल सर्टिफिकेट’ वाले अड़ंगे के कारण इनमें से 295 अस्पताल एक झटके में योजना से बाहर हो जाएंगे। इसका सीधा और डरावना मतलब यह है कि इन शहरों के 60% से ज्यादा अस्पतालों में आपका आयुष्मान कार्ड महज एक प्लास्टिक का टुकड़ा बनकर रह जाएगा।
आंकड़ों की जुबानी: शहरों का हाल
राजधानी भोपाल: यहाँ के 203 निजी अस्पतालों में से 136 अस्पताल इस नियम की भेंट चढ़कर योजना से बाहर हो रहे हैं।
इंदौर: आर्थिक राजधानी में 100 में से 77 अस्पतालों पर ताला लग जाएगा।
ग्वालियर और जबलपुर: यहाँ की स्थिति भी इससे जुदा नहीं है, जहाँ छोटे और मध्यम श्रेणी के अस्पताल लिस्ट से कटने की कगार पर हैं।
गुणवत्ता का बहाना या ‘कॉर्पोरेट लॉबी’ का निशाना?
अधिकारी तर्क दे रहे हैं कि उन्हें ‘क्वालिटी’ यानी इलाज की गुणवत्ता बढ़ानी है, इसलिए NABH (National Accreditation Board for Hospitals) का फाइनल सर्टिफिकेट अनिवार्य किया गया है। लेकिन सवाल यह है कि क्या गुणवत्ता अस्पतालों को बंद करने से आती है या उन्हें बेहतर संसाधन मुहैया कराने से?
अखिलीक्स का विश्लेषण संकेत देता है कि इस आदेश के पीछे एक ‘कॉर्पोरेट लॉबी’ का हाथ हो सकता है। जब छोटे और किफायती नर्सिंग होम्स योजना से बाहर होंगे, तो मरीजों का सारा हुजूम बड़े कॉर्पोरेट अस्पतालों की तरफ भागेगा। वहां पहले से ही बेड की कमी और लंबी वेटिंग है। नतीजा यह होगा कि गरीब मरीज दर-दर भटकेगा, इमरजेंसी में उसे भर्ती नहीं किया जाएगा और अंततः इलाज इतना महंगा हो जाएगा कि आयुष्मान योजना का मूल उद्देश्य ही खत्म हो जाएगा।
कोरोना में जो ‘रक्षक’ थे, अब वो ‘बाहर’ क्यों?
क्या अधिकारी यह भूल गए कि इसी ‘बिना सर्टिफिकेट’ वाले सिस्टम ने कोरोना की दूसरी लहर में हजारों जानें बचाई थीं? उस वक्त छोटे अस्पतालों ने अपनी क्षमता से बढ़कर काम किया था। तब नियम आड़े नहीं आए, तो अब क्यों? NABH का फाइनल सर्टिफिकेट लेना किसी छोटे अस्पताल के लिए हिमालय चढ़ने जैसा कठिन काम है, जिसमें करोड़ों रुपये का इंफ्रास्ट्रक्चर बदलाव और सालों की कागजी कार्रवाई लगती है।
सरकार के लिए राजनीतिक जोखिम
मध्य प्रदेश नर्सिंग होम एसोसिएशन और IMA जबलपुर ने इस ‘तुगलकी फरमान’ के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। जब क्लीनिकल एस्टेब्लिशमेंट एक्ट या नेशनल हेल्थ अथॉरिटी (NHA) ने इसे अनिवार्य नहीं किया, तो एमपी के अधिकारियों ने इसे ‘प्रतिष्ठा का प्रश्न’ क्यों बना लिया? जनता यह नहीं पूछेगी कि फाइल पर किस सचिव के दस्तखत थे, जनता सीधे मुख्यमंत्री से सवाल करेगी कि “साहब, मोदी जी ने तो कार्ड दिया था, लेकिन आपकी सरकार ने अस्पताल ही छीन लिए।”
निष्कर्ष: वक्त रहते जागना जरूरी
आयुष्मान भारत के सीईओ डॉ. योगेश भरसट कह रहे हैं कि वो इस मामले का ‘रिव्यू’ करेंगे। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या यह रिव्यू 31 मार्च की डेडलाइन निकलने और मरीजों की तड़प बढ़ने के बाद होगा? मुख्यमंत्री मोहन यादव को इस मामले में तत्काल हस्तक्षेप करना चाहिए। यह सिर्फ एक प्रशासनिक फाइल का मामला नहीं, बल्कि प्रदेश के लाखों गरीबों की जिंदगी और मौत का सवाल है। अधिकारियों की इस ‘जिद’ की कीमत आम आदमी अपनी जान देकर न चुकाए, यह सुनिश्चित करना सरकार की प्राथमिक जिम्मेदारी है।
आप पढ़ रहे थे ‘अखिलीक्स’—जहाँ हम बताते हैं खबर के पीछे की खबर और आंकड़ों के पीछे का सच। इस रिपोर्ट को साझा करें ताकि वल्लभ भवन तक आपकी आवाज पहुँच सके।
क्या आप चाहते हैं कि हम इस मामले में स्वास्थ्य मंत्री का पक्ष भी सामने लाएं? नीचे कमेंट में अपनी राय दें।



