एमपी की शिक्षा व्यवस्था का ‘पोस्टमार्टम’: कागजों पर चमक, हकीकत में अंधेरगर्दी
मध्य प्रदेश के भविष्य, यानी हमारे बच्चों की शिक्षा व्यवस्था इन दिनों खुद आईसीयू में नजर आ रही है। विधानसभा के बजट सत्र में पेश किए गए आंकड़े केवल संख्या मात्र नहीं हैं, बल्कि यह प्रदेश की बदहाल होती शिक्षा व्यवस्था का एक ऐसा ‘डेथ वारंट’ हैं जिसे सिस्टम ने बड़ी चतुराई से फाइलों के नीचे दबा रखा था। ‘अखिलीक्स’ के इस डीप डाइव में जब हमने आंकड़ों की परतों को खंगाला, तो डराने वाले दृश्य सामने आए—कहीं ताला लगे स्कूल हैं, तो कहीं जर्जर छतों के नीचे बच्चे अपनी जान जोखिम में डालकर भविष्य संवारने को मजबूर हैं। सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर 1 लाख 15 हजार से ज्यादा शिक्षकों के पद खाली होने के बावजूद सरकार महज 15 हजार पदों पर भर्ती का ‘झुनझुना’ थमाकर किसे गुमराह करने की कोशिश कर रही है? यह केवल प्रशासनिक लापरवाही नहीं, बल्कि अगली पीढ़ी के भविष्य के साथ की जा रही एक संगठित अंधेरगर्दी है, जिसका पर्दाफाश अब खुद कैग (CAG) की रिपोर्ट ने कर दिया है।
स्कूल शिक्षा मंत्री उदय प्रताप सिंह ने सदन में स्वीकार किया है कि प्रदेश में शिक्षकों के कुल 2,89,005 पद स्वीकृत हैं, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि वर्तमान में केवल 1,74,419 शिक्षक ही कार्यरत हैं। इसका सीधा मतलब यह है कि लगभग 1,15,678 पद आज भी खाली पड़े हैं। सरल गणित में समझा जाए तो मध्य प्रदेश के स्कूलों से 40 प्रतिशत ‘इंजन’ गायब हैं; ऐसे में शिक्षा की गाड़ी पटरी पर दौड़ने के बजाय रेंगती नजर आ रही है। कैग की रिपोर्ट इस विसंगति को और भी भयावह तरीके से उजागर करती है। रिपोर्ट के अनुसार, जहां ग्रामीण क्षेत्रों में स्वीकृत पदों के मुकाबले केवल 70.30% शिक्षक ही काम कर रहे हैं, वहीं शहरों की कहानी बिल्कुल इसके उलट है। शहरी क्षेत्रों के स्कूलों में शिक्षकों की जैसे ‘बंपर पैदावार’ हो रही है और वहां स्वीकृत संख्या से कहीं अधिक शिक्षक जमे हुए हैं।
यह कुप्रबंधन कोई इत्तेफाक नहीं, बल्कि रसूख और सेटिंग का एक बड़ा खेल है। भोपाल, ग्वालियर और दतिया जैसे बड़े शहरों के स्कूल शिक्षकों से ‘ओवरलोडेड’ हैं। आंकड़ों की मानें तो ग्वालियर के शहरी क्षेत्रों में स्वीकृत पदों की तुलना में 113% शिक्षक कार्यरत हैं, यानी जरूरत से भी ज्यादा। भोपाल और दतिया में भी यही हाल है जहाँ यह आंकड़ा 108% तक पहुँच गया है। विडंबना देखिए कि इन्हीं जिलों के ग्रामीण अंचलों में 17% से 19% तक शिक्षकों की भारी किल्लत है। प्रभावशाली कनेक्शन के दम पर शिक्षक शहरों में कुर्सियां तोड़ रहे हैं, जबकि गांवों के करीब 1,968 स्कूल ऐसे हैं जो महज एक शिक्षक के भरोसे सांस ले रहे हैं। सोचिए, यदि वह एकमात्र शिक्षक किसी दिन बीमार हो जाए, तो उस पूरे स्कूल के बच्चों के भविष्य पर उस दिन ताला लग जाता है। धार, झाबुआ और सिवनी जैसे आदिवासी जिलों में तो स्थिति और भी दयनीय है, जहाँ हजारों नौनिहालों का भविष्य सिर्फ दो शिक्षकों के कंधों पर टिका दिया गया है।
शिक्षा व्यवस्था की बदहाली सिर्फ शिक्षकों की कमी तक सीमित नहीं है, बल्कि बुनियादी ढांचा भी ढहने की कगार पर है। प्रदेश के 5,735 प्राथमिक विद्यालय आज जर्जर अवस्था में खड़े हैं, जो किसी भी वक्त बड़े हादसे को न्योता दे सकते हैं। ‘बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ’ के नारों के बीच कड़वी सच्चाई यह है कि आज भी सैकड़ों स्कूलों में बेटियों के लिए अलग शौचालय तक मयस्सर नहीं हैं। प्रशासनिक ढिठाई की हद तब पार हो गई जब कैग के सामने सरकार ने यह दलील दी कि प्राथमिक शिक्षक जिला संवर्ग का पद है, इसलिए उन्हें जिले से बाहर नहीं भेजा जा सकता। लेकिन ऑडिट ने इस सफेद झूठ की पोल खोलते हुए बताया कि 2019 से 2022 के बीच विभाग ने बड़ी सुविधा से 5,649 शिक्षकों का मनचाहा तबादला किया। यानी नियम-कायदे सिर्फ तब याद आते हैं जब ‘सरप्लस’ स्टाफ को शहरों की ऐशगाह से निकालकर गांवों की धूल भरी गलियों में भेजने की बारी आती है।
अंततः सवाल वही खड़ा है: जब रिक्तियां सवा लाख के करीब हैं, तो सरकार केवल 15,000 नई भर्तियों की खानापूर्ति क्यों कर रही है? बाकी के 1 लाख पदों का हिसाब कौन देगा? क्या पूरी एक पीढ़ी का भविष्य अतिथि शिक्षकों और गिरती इमारतों के भरोसे ही छोड़ दिया जाएगा? पिछले 8 वर्षों में पदों का सही ‘युक्तियुक्तकरण’ (Rationalization) न करना और पुराने स्टाफ को व्यवस्थित किए बिना ही 7,429 नई भर्तियां कर देना सीधे तौर पर सिस्टम की नीयत पर सवालिया निशान लगाता है। विपक्ष ने घेरा है और ऑडिट ने आईना दिखाया है, लेकिन अब जवाबदेही तय करने का वक्त जनता का है। यह मामला सिर्फ सरकारी नौकरी का नहीं, बल्कि उन बच्चों के हक का है जो कल के भारत की बुनियाद हैं। ‘अखिलीक्स’ शिक्षा के इस गिरते स्तर और सिस्टम की इस साजिश पर अपनी नजर लगातार बनाए रखेगा।



