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मोहन सरकार की ‘संडे क्लास’ : सीएम हाउस में मंत्रियों का 50 मिनट वाला राजनीतिक इंटरव्यू, संगठन ने पूछा— ‘काम किया है या सिर्फ लाल बत्ती चमकाई है?’

मध्य प्रदेश की सत्ता के गलियारों में पिछले ढाई साल से जो एक खास किस्म का ‘वीआईपी कम्फर्ट जोन’ तैयार हो चुका था, रविवार की दोपहर उस पर संगठन का ऐसा कड़ा और अभूतपूर्व हंटर चला, जिसने कई दिग्गज मंत्रियों की राजनीतिक नींद उड़ा दी। मुख्यमंत्री निवास स्थित समत्व भवन में दोपहर एक बजे शुरू हुई यह बैठक सामान्य समीक्षा बैठक नहीं थी, बल्कि मोहन सरकार के मंत्रियों के लिए एक तरह का ‘पॉलिटिकल इंटरव्यू बोर्ड’ थी, जहाँ केवल विभागीय उपलब्धियों की चर्चा नहीं हुई, बल्कि मंत्रियों की जमीन, संगठन, बूथ और जनता से जुड़ाव तक का एक्स-रे किया गया। बाहर भोपाल की सड़कें 42 डिग्री की गर्मी से तप रही थीं, लेकिन सीएम हाउस के भीतर जो राजनीतिक तापमान बना हुआ था, उसने कई मंत्रियों के चेहरे की रंगत बदल दी। जो मंत्री अब तक अपने विभागों में ट्रांसफर-पोस्टिंग, प्रोटोकॉल और प्रभार वाले जिलों में वीआईपी स्वागत से आगे नहीं बढ़ पाए थे, उन्हें शायद इस बात का अंदाजा नहीं था कि संगठन ने उनकी पूरी ‘ढाई साल की कुंडली’ पहले से तैयार कर रखी है।
Akhileaks को मिली बेहद पुख्ता इनसाइड जानकारी के मुताबिक इस पूरी कवायद को भाजपा संगठन और सरकार की संयुक्त ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ के रूप में डिजाइन किया गया था। समीक्षा पैनल में केवल मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ही नहीं बैठे थे, बल्कि भाजपा के राष्ट्रीय सह-संगठन महामंत्री शिवप्रकाश, प्रदेश प्रभारी डॉ. महेंद्र सिंह और भाजपा प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल की वह ताकतवर तिकड़ी भी मौजूद थी, जिसे संगठन के भीतर केंद्रीय नेतृत्व की सबसे भरोसेमंद मॉनिटरिंग टीम माना जाता है। हर मंत्री को अंदर बुलाने से पहले एक गोपनीय फीडबैक फॉर्म दिया गया, जिसमें उन्हें खुद अपने दौरों, संगठनात्मक बैठकों, रात्रि विश्राम और जनता से संवाद का ब्यौरा लिखना था। यही इस पूरी प्रक्रिया का सबसे बड़ा मनोवैज्ञानिक जाल था। मंत्री जो जानकारी अपने हाथों से लिख रहे थे, उसका मिलान अंदर बैठे रणनीतिकारों द्वारा पहले से मौजूद खुफिया फीडबैक, बूथ स्तर की रिपोर्ट और कार्यकर्ताओं के इनपुट से किया जा रहा था।
सूत्र बताते हैं कि जैसे-जैसे यह मिलान होता गया, वैसे-वैसे कई मंत्रियों की घबराहट साफ दिखाई देने लगी। एसी कमरों में बैठने के आदी कई चेहरों पर पसीना दिखाई दिया। बार-बार पानी के गिलास अंदर भेजे गए, कुछ मंत्री लगातार वॉशरूम जाते दिखे और माहौल ऐसा था जैसे कोई प्रशासनिक सेवा का उम्मीदवार अंतिम इंटरव्यू बोर्ड के सामने बैठा हो। हर मंत्री को लगभग 40 से 50 मिनट तक सवालों की ऐसी बौछार झेलनी पड़ी, जिसमें विभागीय उपलब्धियों से ज्यादा संगठनात्मक सक्रियता और जमीनी उपस्थिति को परखा गया। मंत्रियों से पूछा गया कि प्रभार वाले जिलों में वे आखिरी बार कब गए थे, कितनी रातें उन्होंने सर्किट हाउस छोड़कर कार्यकर्ताओं या ग्रामीण इलाकों में बिताईं, कितनी हारी हुई विधानसभा सीटों पर उन्होंने व्यक्तिगत मॉनिटरिंग की, और आगामी नगरीय निकाय एवं पंचायत चुनावों के लिए बूथ स्तर पर उनकी रणनीति क्या है।
सबसे ज्यादा तीखे सवाल उन सीटों को लेकर पूछे गए जहाँ भाजपा पिछला चुनाव हार चुकी थी। पैनल ने सीधा सवाल दागा कि पिछले ढाई साल में उन सीटों पर ऐसा कौन सा काम किया गया जिससे भाजपा का वोट बैंक दोबारा खड़ा हो सके। कई मंत्रियों के पास इसका कोई ठोस जवाब नहीं था। केवल कागजी बैठकें, औपचारिक दौरों और फोटो सेशन से आगे का कोई डेटा उनके पास मौजूद नहीं था। जब विभागीय कामकाज की समीक्षा शुरू हुई तो मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने फ्लैगशिप योजनाओं से आगे जाकर पूछा कि क्या मंत्रियों ने कभी किसी स्कूल, अस्पताल, स्वास्थ्य केंद्र या आंगनबाड़ी का औचक निरीक्षण किया? क्या उन्होंने अपने विभाग में कोई ऐसा नवाचार किया जिससे जनता को फर्क महसूस हुआ हो या अफसरशाही पर नियंत्रण बढ़ा हो?
यहीं पर कई बड़े और स्वयंभू कद्दावर मंत्रियों की बोलती बंद होती दिखाई दी। Akhileaks को मिली जानकारी के मुताबिक कई मंत्री अपने ही विभाग की तीन बड़ी उपलब्धियों को क्रमवार तरीके से गिनाने में असफल रहे। कुछ को अपने प्रभार वाले जिलों के कमजोर बूथों की संख्या तक याद नहीं थी। सांसदों और विधायकों के साथ समन्वय के नाम पर केवल औपचारिक बैठकें बताई गईं, जबकि स्थानीय स्तर पर विधायकों की नाराजगी पहले से संगठन तक पहुंच चुकी थी। दिल्ली से आए पर्यवेक्षकों ने इस बात पर भी गंभीर चिंता जताई कि सरकार और संगठन के बीच जमीनी कार्यकर्ताओं का संवाद लगातार कमजोर होता जा रहा है और मंत्री केवल प्रशासनिक शक्ति के भरोसे राजनीति चला रहे हैं।
करीब आठ घंटे तक चली इस ‘संडे क्लास’ में केवल समीक्षा ही नहीं हुई, बल्कि सत्ता संतुलन को बदलने की भूमिका भी तैयार हुई। बैठक में इस बात पर गंभीर चर्चा हुई कि कैबिनेट मंत्रियों के पास केंद्रित कई प्रशासनिक अधिकारों का कुछ हिस्सा राज्यमंत्रियों को दिया जाए। अभी तक राज्यमंत्रियों के पास केवल सीमित स्तर की प्रशासनिक फाइलें और छोटे तबादलों का अधिकार है, लेकिन संगठन चाहता है कि उन्हें ज्यादा सक्रिय भूमिका मिले ताकि कैबिनेट मंत्रियों का विभागीय एकाधिकार टूटे और कामकाज में जवाबदेही बढ़े। यह प्रस्ताव सीधे तौर पर उन मंत्रियों के लिए चेतावनी माना जा रहा है जिन्होंने विभागों को निजी सत्ता केंद्र की तरह चलाना शुरू कर दिया था।
इसी बैठक में हाल ही में नियुक्त किए गए निगम-मंडल और बोर्ड अध्यक्षों के लिए भी विशेष सांगठनिक प्रशिक्षण कार्यक्रम की रूपरेखा तय की गई। मुख्यमंत्री खुद उन्हें जनता से संवाद, संगठनात्मक अनुशासन और राजनीतिक व्यवहार का प्रशिक्षण देंगे। भाजपा नेतृत्व यह संदेश देना चाहता है कि अब केवल पद मिलना पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि हर पदाधिकारी को जनता और संगठन दोनों के प्रति जवाबदेह रहना होगा।
इस पूरे तनावपूर्ण माहौल के बीच सबसे ज्यादा चर्चा ऊर्जा मंत्री प्रद्युम्न सिंह तोमर की एंट्री को लेकर हुई। वे बिना किसी वीआईपी काफिले, बिना पायलट गाड़ी और बिना सुरक्षा प्रदर्शन के खुद ई-स्कूटी चलाकर सीएम हाउस पहुंचे। संगठन के भीतर इसे एक प्रतीकात्मक संदेश के रूप में देखा गया कि अब केवल लाल बत्ती और प्रोटोकॉल नहीं, बल्कि जमीन पर सक्रियता ही राजनीतिक भविष्य तय करेगी।
सोमवार को बाकी बचे मंत्रियों के इंटरव्यू के साथ यह पहला चरण पूरा हो जाएगा, लेकिन भाजपा संगठन के भीतर इस पूरी प्रक्रिया को आने वाले बड़े राजनीतिक फेरबदल की प्रस्तावना माना जा रहा है। हालांकि बाहर मीडिया के सामने प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल ने बेहद नियंत्रित बयान देते हुए कहा कि “यह केवल सांगठनिक समीक्षा है, मंत्रिमंडल विस्तार या किसी की छुट्टी पर कोई चर्चा नहीं हुई,” लेकिन Akhileaks के सूत्र साफ संकेत दे रहे हैं कि इस ‘संडे क्लास’ की रिपोर्ट भविष्य में कई लाल बत्तियों को बुझाने और नए चेहरों को मौका देने का आधार बनेगी।
भाजपा संगठन ने इस पूरी कवायद के जरिए अपने मंत्रियों को एक अंतिम और स्पष्ट संदेश दे दिया है— अब केवल सत्ता का सुख, वीआईपी प्रोटोकॉल और विभागीय रसूख काफी नहीं होगा। जो मंत्री बूथ से जुड़ा रहेगा, जनता के बीच सक्रिय रहेगा, संगठन के साथ तालमेल रखेगा और जमीन पर काम करेगा, वही सत्ता में टिकेगा। बाकी के लिए संगठन हमेशा की तरह वही पुराना संदेश दोहरा रहा है— भाजपा अगर किसी को अर्श तक पहुंचाना जानती है, तो जरूरत पड़ने पर उसे जमीन पर उतारकर दोबारा दरी बिछाने और झंडा उठाने की भूमिका में लाना भी जानती है। मध्य प्रदेश की राजनीति में अब ‘परफॉर्म या परिश्रम करो’ वाला नया दौर शुरू हो चुका है, और मोहन सरकार ने साफ कर दिया है कि अगला राजनीतिक भविष्य केवल कुर्सी से नहीं, बल्कि काम के हिसाब से तय होगा।

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