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एमपी राज्यसभा चुनाव 2026: बीजेपी का ‘मिशन-3’, कमलनाथ की दिल्ली राह और कांग्रेस के भीतर ‘साइलेंट सेंधमारी’ का डर

भोपाल। मध्य प्रदेश की राजनीति में राज्यसभा चुनाव को लेकर जो नई सियासी बिसात बिछ रही है, उसने सत्ता और विपक्ष—दोनों खेमों की बेचैनी बढ़ा दी है। अब तस्वीर सिर्फ इतनी नहीं रह गई है कि भारतीय जनता पार्टी अपनी परंपरागत दो सीटें आराम से जीत ले और कांग्रेस अपनी एक सीट बचा ले। पर्दे के पीछे चल रही रणनीतियाँ इस बात की ओर इशारा कर रही हैं कि बीजेपी इस बार केवल “सेफ गेम” खेलने के मूड में नहीं है, बल्कि उसकी निगाह कांग्रेस के उस आखिरी मजबूत किले पर भी है जिसे विपक्ष अपनी राजनीतिक विरासत और सम्मान की सीट मानकर चल रहा है। यही कारण है कि भोपाल से लेकर दिल्ली तक संगठन और सत्ता के गलियारों में लगातार बैठकों, फीडबैक और संभावित नामों को लेकर मंथन तेज हो गया है।

विधानसभा चुनाव में दो केंद्रीय मंत्रियों की हार ने बीजेपी के पुराने गणित को जरूर प्रभावित किया है। यही वजह है कि पहले जिन परिस्थितियों में चार सीटों की संभावनाएँ तलाशने की चर्चा होती थी, अब पार्टी का पूरा फोकस तीन सीटों के समीकरण पर केंद्रित दिखाई दे रहा है। लेकिन राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि बीजेपी की असली रणनीति सिर्फ तीसरी सीट जीतने की नहीं, बल्कि कांग्रेस के भीतर अस्थिरता और मनोवैज्ञानिक दबाव पैदा करने की भी हो सकती है। यही कारण है कि “मिशन-3” शब्द अब भाजपा खेमे में एक नए राजनीतिक प्रयोग की तरह देखा जा रहा है।

अखिलीक्स की एक्सक्लूसिव पड़ताल के अनुसार बीजेपी संगठन के भीतर इस समय सबसे बड़ा मंथन उम्मीदवार चयन को लेकर चल रहा है। पार्टी के एक वर्ग का मानना है कि यदि फिर से जॉर्ज कुरियन या एल. मुरुगन जैसे बाहरी चेहरों को मध्य प्रदेश से राज्यसभा भेजा गया, तो कार्यकर्ताओं के बीच असंतोष और गहरा सकता है। प्रदेश संगठन का एक बड़ा धड़ा चाहता है कि इस बार राज्यसभा के जरिए किसी स्थानीय और प्रभावशाली चेहरे को दिल्ली भेजा जाए ताकि कार्यकर्ताओं को यह संदेश दिया जा सके कि पार्टी प्रदेश नेतृत्व और क्षेत्रीय संतुलन को प्राथमिकता दे रही है।

यही कारण है कि पूर्व गृहमंत्री डॉ. नरोत्तम मिश्रा का नाम अचानक राजनीतिक चर्चाओं के केंद्र में आ गया है। माना जा रहा है कि अगर बीजेपी उन्हें या किसी अन्य क्षेत्रीय क्षत्रप को तीसरे उम्मीदवार के रूप में मैदान में उतारती है, तो यह केवल एक नामांकन नहीं होगा बल्कि कांग्रेस के भीतर असंतुष्ट विधायकों को दिया गया एक सियासी संकेत होगा। बीजेपी के रणनीतिकार यह अच्छी तरह समझते हैं कि राज्यसभा चुनावों में कई बार संख्या से ज्यादा महत्व “मनोविज्ञान” और “मैसेज” का होता है। यही वजह है कि पार्टी अंदरखाने कांग्रेस के उन चेहरों की भी लगातार निगरानी कर रही है जो लंबे समय से अपनी ही पार्टी में उपेक्षा और असंतोष महसूस कर रहे हैं।

दूसरी तरफ कांग्रेस खेमे में पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ का नाम लगभग तय माना जा रहा है। कांग्रेस नेतृत्व इस चुनाव को सिर्फ राज्यसभा सीट नहीं बल्कि कमलनाथ की राजनीतिक पुनर्स्थापना के तौर पर भी देख रहा है। दिल्ली की राजनीति में उनकी वापसी कांग्रेस संगठन के लिए प्रतीकात्मक रूप से बेहद महत्वपूर्ण मानी जा रही है। लेकिन सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या कांग्रेस अपने विधायकों को पूरी तरह एकजुट रख पाएगी? क्योंकि कागजों पर भले ही पार्टी के पास 62 विधायक दिखाई देते हों, लेकिन असली चुनौती उन “अतिरिक्त चार वोटों” की नहीं बल्कि उन “असंतुष्ट चेहरों” की है जो ऐन वक्त पर राजनीतिक समीकरण बदलने की क्षमता रखते हैं।

प्रदेश कांग्रेस कार्यालय में सबसे ज्यादा चर्चा इस बात को लेकर है कि कहीं बीजेपी “अंतरात्मा की आवाज” वाला फॉर्मूला दोहराने की कोशिश तो नहीं करेगी। राज्यसभा चुनावों का इतिहास गवाह रहा है कि कई बार क्रॉस वोटिंग ने बड़े-बड़े दिग्गजों की राजनीतिक रणनीति को ध्वस्त किया है। यही कारण है कि कांग्रेस नेतृत्व अब केवल संख्या के भरोसे निश्चिंत नहीं बैठ सकता। पार्टी के भीतर गुटबाजी, क्षेत्रीय असंतुलन और टिकट वितरण को लेकर पुरानी नाराजगियाँ अब फिर से चर्चा में आने लगी हैं।

सत्ता के गलियारों में यह सवाल भी तेजी से उठ रहा है कि क्या कांग्रेस का असंतुष्ट गुट कमलनाथ की नई पारी को पूरी सहजता से स्वीकार करेगा या फिर अंदरखाने कुछ और खेल चल रहा है। बीजेपी की रणनीति पर नजर रखने वाले राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि अंतिम समय में तीसरा उम्मीदवार उतारा गया तो पूरा चुनाव “हाई वोल्टेज पॉलिटिकल थ्रिलर” में बदल सकता है। तब यह केवल राज्यसभा की एक सीट का चुनाव नहीं रहेगा बल्कि यह सत्ता, प्रभाव, वफादारी और भविष्य की राजनीति का खुला प्रदर्शन बन जाएगा।

भोपाल में राजनीतिक हलकों में यह चर्चा भी लगातार चल रही है कि बीजेपी यदि तीसरा उम्मीदवार उतारती है तो उसका उद्देश्य सीट जीतना जितना होगा, उससे कहीं ज्यादा विपक्ष को “डिफेंसिव मोड” में धकेलना होगा। कांग्रेस को हर विधायक की निगरानी करनी पड़ेगी, रिसॉर्ट पॉलिटिक्स की आशंकाएँ बढ़ेंगी और सत्ता पक्ष लगातार मनोवैज्ञानिक दबाव बनाए रखेगा। इस पूरे घटनाक्रम ने वल्लभ भवन से लेकर दिल्ली तक हलचल बढ़ा दी है।

अब सारी निगाहें नामांकन की तारीख पर टिक गई हैं। क्योंकि उसी दिन यह साफ होगा कि बीजेपी वास्तव में “रिस्क” लेकर कांग्रेस की तीसरी सीट पर हमला करने जा रही है या फिर यह पूरी रणनीति विपक्ष को अस्थिर रखने के लिए बनाई गई एक सियासी मनोवैज्ञानिक घेराबंदी है। लेकिन इतना तय है कि इस राज्यसभा रण ने मध्य प्रदेश की राजनीति में एक नई बेचैनी पैदा कर दी है। आने वाले नगर निगम चुनावों, संगठनात्मक नियुक्तियों और 2028 के विधानसभा चुनावों तक इसकी राजनीतिक गूंज सुनाई दे सकती है।

Akhileaks Analysis:
राज्यसभा का यह चुनाव केवल सांसद चुनने की प्रक्रिया नहीं रह गया है। यह मध्य प्रदेश की राजनीति में शक्ति संतुलन, संगठनात्मक पकड़ और विधायकों की वफादारी का सबसे बड़ा टेस्ट बनता जा रहा है। अब देखना यह होगा कि क्या कमलनाथ की दिल्ली वाली डगर आसान होगी या बीजेपी का “लोकल कार्ड” कांग्रेस के किले में दरार डाल देगा।

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