Karachi–New York Nexus: कराची के मंच से चल रहा ‘डिजिटल जिहाद’?

पन्नू का रेफरेंडम, ISI का एजेंडा और AI Propaganda का नया खेल | Akhileaks Investigation
नमस्कार, मैं हूँ अखिलेश सोलंकी और आप पढ़ रहे हैं Akhileaks—जहाँ खबरों को सिर्फ दिखाया नहीं जाता, बल्कि उनके पीछे छिपे नेटवर्क, नैरेटिव और नेक्सस को डिकोड किया जाता है। 29 अप्रैल 2026 की दोपहर दक्षिण एशिया की सुरक्षा राजनीति में एक ऐसे नए अध्याय की शुरुआत लेकर आई, जिसने भारत के खिलाफ चल रहे ‘हाइब्रिड वारफेयर’ के चेहरे को पूरी तरह बेनकाब कर दिया। न्यूयॉर्क की एक सुरक्षित डिजिटल स्क्रीन से निकला वीडियो लिंक जब कराची प्रेस क्लब के मंच पर लाइव चलाया गया, तो यह सिर्फ एक ऑनलाइन संबोधन नहीं था, बल्कि भारत के खिलाफ एक समन्वित मनोवैज्ञानिक अभियान का औपचारिक प्रदर्शन था। गुरुपतवंत सिंह पन्नू का तथाकथित ‘रेफरेंडम’ अब किसी विचारधारा का आंदोलन नहीं, बल्कि पाकिस्तान की रणनीतिक परियोजना ‘Project K-2’ का सार्वजनिक डिजिटल संस्करण बन चुका है।
अखिलीक्स की पड़ताल में यह साफ सामने आया है कि जिस समय कराची में यह प्रेस कॉन्फ्रेंस चल रही थी, उसी समय पंजाब पुलिस सीमा पार से भेजे गए आरडीएक्स, आईईडी और रॉकेट प्रोपेल्ड ग्रेनेड की खेप पकड़ रही थी। यह घटनाएँ अलग-अलग नहीं हैं। यह एक ‘सिंक्रोनाइज़्ड ऑपरेशन’ का हिस्सा दिखाई देती हैं, जिसमें एक तरफ डिजिटल नैरेटिव तैयार किया जाता है और दूसरी तरफ जमीनी अस्थिरता पैदा करने की कोशिश की जाती है। यही आधुनिक ‘हाइब्रिड वॉर’ की परिभाषा है—जहाँ बंदूक, बम, डेटा, डीपफेक और सोशल मीडिया सब एक ही युद्ध रणनीति का हिस्सा होते हैं।
सबसे बड़ा सवाल यही है कि यदि यह आंदोलन वास्तव में पंजाब की जनता का प्रतिनिधित्व करता है, तो इसकी शुरुआत पंजाब से क्यों नहीं हुई? आखिर क्यों पन्नू और उसका नेटवर्क दिल्ली और हिमाचल से तथाकथित ‘रजिस्ट्रेशन ड्राइव’ शुरू करने की बात करता है? इसका जवाब पंजाब की जमीन खुद देती है। पंजाब की जनता अब अलगाववाद की राजनीति को पूरी तरह नकार चुकी है। 2022 के विधानसभा चुनावों में लोगों ने बिजली, स्वास्थ्य, रोजगार, शिक्षा और किसान कल्याण के मुद्दों पर वोट दिया था, न कि किसी खालिस्तानी एजेंडे पर। यही कारण है कि पन्नू और उसके आकाओं को विदेशी मंचों का सहारा लेना पड़ रहा है।
इंटेलिजेंस ब्यूरो और सुरक्षा एजेंसियों के इनपुट बताते हैं कि पाकिस्तान की ISI ने ‘Project K-2’ के तहत पंजाब और कश्मीर दोनों क्षेत्रों में एक साथ अस्थिरता फैलाने की रणनीति बनाई है। कराची प्रेस क्लब का इस्तेमाल महज प्रतीकात्मक नहीं था। यह एक संदेश था कि पाकिस्तान अब पर्दे के पीछे नहीं, बल्कि खुले मंच से इस एजेंडे को संरक्षण दे रहा है। न्यूयॉर्क में बैठे एक घोषित आतंकी को कराची के प्रतिष्ठित प्रेस क्लब का मंच उपलब्ध कराना बिना सरकारी संरक्षण के संभव नहीं माना जा सकता। यही कारण है कि अब यह पूरा मामला केवल अलगाववाद नहीं, बल्कि ‘State Sponsored Hybrid Threat’ के रूप में देखा जा रहा है।
पन्नू का पाकिस्तान के सेना प्रमुख आसिम मुनीर को ‘Field Marshal’ कहकर संबोधित करना और भारत विरोधी ऑपरेशनों की खुली प्रशंसा करना इस बात का प्रमाण है कि यह संगठन किसी धार्मिक या राजनीतिक प्रतिनिधित्व का मंच नहीं, बल्कि पाकिस्तानी सैन्य प्रतिष्ठान का डिजिटल टूल बन चुका है। जो संगठन खुद को सिखों की आवाज बताता है, वही संगठन पाकिस्तान की सेना के नैरेटिव को amplify करता दिखाई देता है। यही वह बिंदु है जहाँ यह पूरा ‘रेफरेंडम ड्रामा’ लोकतांत्रिक प्रक्रिया से हटकर साइकोलॉजिकल ऑपरेशन में बदल जाता है।
अब बात उस तथाकथित 1.8 मिलियन यानी 18 लाख रजिस्ट्रेशन के दावे की। अखिलीक्स को मिली सुरक्षा एजेंसियों की जानकारी के अनुसार यह आंकड़ा पूरी तरह ‘मैन्युफैक्चर्ड नैरेटिव’ का हिस्सा माना जा रहा है। डेटा एनालिटिक्स के आधार पर एजेंसियों का दावा है कि इसमें भारी स्तर पर duplication, bot activity और fabricated registrations शामिल हैं। लेकिन इससे भी बड़ा खतरा उस डेटा हार्वेस्टिंग मॉडल में छिपा है, जिसके तहत डिजिटल रजिस्ट्रेशन के नाम पर दुनियाभर के सिख समुदाय की व्यक्तिगत जानकारी एकत्रित की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियों को आशंका है कि यह डेटा सीधे ISI हैंडलर्स तक पहुँच रहा है, जिसका इस्तेमाल भविष्य में साइकोलॉजिकल टार्गेटिंग, फेक नैरेटिव और डिजिटल ब्लैकमेलिंग के लिए किया जा सकता है।
इस पूरे अभियान का सबसे खतरनाक पहलू Artificial Intelligence और Deepfake Technology का इस्तेमाल है। सुरक्षा एजेंसियों ने चेतावनी दी है कि अब पंजाब में कथित अत्याचारों के फर्जी वीडियो तैयार किए जा रहे हैं। AI Generated Voices, morphed visuals और manipulated clips के जरिए दुनिया भर के सिख समुदाय को भावनात्मक रूप से भड़काने की कोशिश हो रही है। यह वही मॉडल है जिसका इस्तेमाल दुनिया के कई संघर्ष क्षेत्रों में पहले भी किया जा चुका है। फर्क सिर्फ इतना है कि अब पंजाब को डिजिटल युद्धभूमि बनाने की कोशिश हो रही है। यानी आतंकवाद अब केवल बारूद से नहीं, बल्कि एल्गोरिद्म और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से भी संचालित किया जा रहा है।
दिलचस्प बात यह है कि पन्नू के हर बड़े बयान के आसपास पंजाब में किसी न किसी आतंकी गतिविधि का पैटर्न दिखाई देता है। कराची प्रेस कॉन्फ्रेंस वाले सप्ताह में ही पंजाब पुलिस ने शंभू रेलवे ट्रैक ब्लास्ट और मोगा CIA कार्यालय पर हुए हमलों की जांच के दौरान RPG और हथियारों का बड़ा जखीरा बरामद किया। डीजीपी गौरव यादव की रिपोर्ट के अनुसार हरविंदर सिंह रिंदा और बब्बर खालसा इंटरनेशनल जैसे मॉड्यूल्स को सीमा पार से निर्देशित किया जा रहा था ताकि डिजिटल प्रोपेगेंडा के साथ-साथ जमीन पर भी भय और अस्थिरता का माहौल बनाया जा सके। यानी Narrative और Violence—दोनों को साथ चलाने की रणनीति अपनाई गई।
लेकिन इस पूरी साजिश की सबसे बड़ी विफलता पंजाब का मौजूदा सामाजिक और राजनीतिक जनादेश है। आज का पंजाब 1980 और 90 के दशक वाला पंजाब नहीं है। यहाँ की नई पीढ़ी रोजगार, व्यापार, टेक्नोलॉजी, खेती और वैश्विक अवसरों की बात करती है। पंजाब के किसान देश की खाद्य सुरक्षा की रीढ़ हैं और पंजाब के जवान भारत की सीमाओं की सुरक्षा का प्रतीक। यही कारण है कि अलगाववादी नैरेटिव जमीन पर स्वीकार्यता नहीं पा रहा। SGPC सहित कई धार्मिक और सामाजिक संगठनों ने भी ऐसे एजेंडों से दूरी बनाई है। पंजाब आज जख्मों को याद रखता है, लेकिन उन्हें भविष्य की बेड़ियाँ नहीं बनने देना चाहता।
भारत के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती यह है कि इस खतरे को केवल कानून-व्यवस्था के मुद्दे के रूप में न देखा जाए। UAPA ट्रिब्यूनल और न्यायिक फैसलों ने इस संगठन की आतंकी पहचान को कानूनी रूप से स्थापित कर दिया है, लेकिन अब जरूरत है कि इसे अंतरराष्ट्रीय मंचों पर ‘Hybrid Warfare Architecture’ के हिस्से के रूप में प्रस्तुत किया जाए। ओटावा, लंदन, वॉशिंगटन और कैनबरा जैसे देशों के सामने भारत को स्पष्ट रूप से यह रखना होगा कि पन्नू जैसे तत्व केवल राजनीतिक एक्टिविस्ट नहीं, बल्कि विदेशी सुरक्षा एजेंसियों के influence operators हैं।
अंत में सबसे बड़ा जवाब भारत का सामाजिक ताना-बाना खुद देता है। पन्नू का डिजिटल प्रोपेगेंडा उस सिख किसान को नहीं तोड़ सकता जो देश का अन्नदाता है। कराची का मंच उस सिख सैनिक की राष्ट्रभक्ति को नहीं हिला सकता जो सियाचिन की बर्फ में तिरंगे की रक्षा कर रहा है। न्यूयॉर्क की स्क्रीन और ISI की स्क्रिप्ट मिलकर भी भारत की उस अखंडता को नहीं तोड़ सकती, जिसे करोड़ों भारतीयों के विश्वास और वीर जवानों के बलिदान ने मजबूत किया है।
Akhileaks की इस विशेष पड़ताल में आज के लिए इतना ही। तथ्यों के साथ फिर मिलेंगे। देखते रहिए Akhileaks — जहाँ खबर नहीं, खबर के पीछे की सच्चाई दिखाई जाती है।



