अखिलीक्स विशेष : ‘शहुबली’ का संकल्प और लाल आतंक का संपूर्ण खात्मा
हम बात कर रहे हैं उस निर्णायक मोड़ की, जिसने दशकों से देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए सबसे बड़े खतरे—नक्सलवाद—को जड़ से उखाड़ने का दावा पेश किया है। यह सिर्फ एक सुरक्षा ऑपरेशन की कहानी नहीं है, बल्कि यह उस राजनीतिक इच्छाशक्ति, रणनीतिक स्पष्टता और निरंतर एक्शन का परिणाम है, जिसने भारत के उन इलाकों की तस्वीर बदल दी, जहाँ कभी बंदूक की आवाज ही कानून हुआ करती थी।
जब देश के गृह मंत्री Amit Shah ने 31 मार्च 2026 तक नक्सलवाद के खात्मे की डेडलाइन तय की, तो इसे कई लोगों ने एक राजनीतिक बयान मानकर हल्के में लिया था, लेकिन इस डेडलाइन के पीछे जो रणनीति काम कर रही थी, वह बेहद स्पष्ट थी—“Trace, Target, Neutralise”। यानी हर नक्सली नेटवर्क को ट्रैक करना, सटीक निशाना बनाना और उसे पूरी तरह खत्म करना। यही कारण है कि जिस विचारधारा ने दशकों तक देश के बड़े भूभाग को प्रभावित किया, उसकी रीढ़ अब टूटती हुई दिखाई दे रही है।
भारत के जिन हिस्सों में कभी विकास की कल्पना भी असंभव लगती थी, वहाँ अब सड़कों का जाल बिछ रहा है, मोबाइल नेटवर्क पहुँच रहा है, और सरकारी योजनाओं का लाभ सीधे अंतिम व्यक्ति तक पहुँच रहा है। यह बदलाव सिर्फ सुरक्षा बलों की कार्रवाई का परिणाम नहीं है, बल्कि एक समन्वित मॉडल का नतीजा है, जिसमें सुरक्षा, विकास और प्रशासन—तीनों एक साथ काम कर रहे हैं।
इस पूरे अभियान में सबसे बड़ा मोड़ तब आया जब नक्सली नेतृत्व पर सीधा प्रहार किया गया। हिड़मा जैसे कुख्यात कमांडरों के खिलाफ ऑपरेशन ने यह स्पष्ट संदेश दे दिया कि अब जंगलों में छिपकर हमला करने की रणनीति ज्यादा दिन नहीं चलने वाली। यही वह बिंदु था, जहाँ से नक्सलवाद की मनोवैज्ञानिक बढ़त टूटनी शुरू हुई।
लेकिन इस लड़ाई का एक वैचारिक पहलू भी है, जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। कुछ वर्गों द्वारा नक्सलियों की तुलना Bhagat Singh और Birsa Munda जैसे महान स्वतंत्रता सेनानियों से करना न केवल ऐतिहासिक रूप से गलत है, बल्कि यह उन शहीदों के बलिदान का अपमान भी है, जिन्होंने देश की आज़ादी के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया। जहाँ स्वतंत्रता सेनानियों ने राष्ट्र के लिए संघर्ष किया, वहीं नक्सली हिंसा ने आम नागरिकों और सुरक्षा बलों को ही निशाना बनाया।
यही कारण है कि सरकार ने केवल हथियारों से नहीं, बल्कि नैरेटिव के स्तर पर भी इस विचारधारा को चुनौती दी है। अब वह दौर खत्म होता दिख रहा है, जब शहरों में बैठकर नक्सलवाद के पक्ष में वैचारिक समर्थन तैयार किया जाता था। आज वही नैरेटिव कमजोर पड़ता दिख रहा है, क्योंकि जमीन पर हालात बदल चुके हैं।
सरकार की रणनीति ने यह भी सुनिश्चित किया कि जिन इलाकों में कभी नक्सलियों का वर्चस्व था, वहाँ शासन की मौजूदगी मजबूत हो। स्कूल, अस्पताल, सड़कें और रोजगार के अवसर—ये सभी उस वैक्यूम को भर रहे हैं, जिसे कभी नक्सलवाद ने अपनी जड़ें जमाने के लिए इस्तेमाल किया था।
आज स्थिति यह है कि नक्सलवाद का नेटवर्क न केवल कमजोर पड़ा है, बल्कि उसके पास विकल्प भी सीमित हो गए हैं। या तो आत्मसमर्पण करें या फिर कार्रवाई का सामना करें। यह बदलाव अचानक नहीं आया है, बल्कि यह लगातार चल रहे ऑपरेशनों, खुफिया तंत्र की मजबूती और राजनीतिक इच्छाशक्ति का परिणाम है।
31 मार्च 2026 की जो डेडलाइन तय की गई थी, उससे पहले ही जिस तरह से नक्सलवाद के खात्मे का दावा सामने आया है, उसने यह संकेत जरूर दे दिया है कि भारत अब आंतरिक सुरक्षा के मुद्दों पर किसी भी तरह की ढिलाई बरतने के मूड में नहीं है। यह नया भारत है—जहाँ केवल चेतावनी नहीं दी जाती, बल्कि परिणाम भी दिखाए जाते हैं।
इस पूरे घटनाक्रम ने एक बात साफ कर दी है कि अब देश में ‘शब्दों’ की राजनीति से ज्यादा ‘एक्शन’ की राजनीति हावी है। जो राष्ट्र के साथ खड़ा है, वह विकास की धारा में आगे बढ़ेगा, और जो इसके खिलाफ खड़ा होगा, उसके लिए सिस्टम का जवाब भी उतना ही कठोर होगा।
अखिलीक्स का यह विश्लेषण यही बताता है कि नक्सलवाद के खिलाफ यह लड़ाई केवल बंदूक की नहीं थी, बल्कि यह विचार, रणनीति और संकल्प की लड़ाई थी—और फिलहाल इस लड़ाई में बाजी भारत के हाथ में दिखाई दे रही है।



