सिफारिश का खेल, वफादार फेल! : संगठन के भीतर सेंधमारी, रसूखदारों की मनमानी और भाजपा के सामने बड़ा सवाल
मध्य प्रदेश की राजनीति में इन दिनों एक ऐसा सवाल तैर रहा है, जो सिर्फ नियुक्तियों तक सीमित नहीं है, बल्कि संगठन की आत्मा से जुड़ा हुआ है। सवाल यह है कि क्या अब भाजपा में वफादारी से ज्यादा वजन सिफारिश का हो गया है? क्या अनुशासन से ज्यादा ताकत रसूख की हो गई है? और क्या बगावत अब योग्यता का नया प्रमाणपत्र बनती जा रही है?
मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के नेतृत्व में सरकार लगातार विकास, निवेश, सुशासन और प्रशासनिक पारदर्शिता की दिशा में काम कर रही है। सरकार की नीयत पर सवाल नहीं है। मुख्यमंत्री की छवि साफ, संयमित और कार्यकर्ता आधारित नेतृत्व की रही है। लेकिन राजनीति में सिर्फ शीर्ष नेतृत्व की नीयत काफी नहीं होती, उसके नीचे बैठा तंत्र भी उतना ही शुद्ध होना चाहिए। यहीं सबसे बड़ा संकट दिखाई देता है।
सरकार और संगठन के बीच जो राजनीतिक फिल्टर काम करता है, वही यदि दूषित हो जाए, तो फैसले विवादों में घिर जाते हैं। आज यही होता दिख रहा है। मलाईदार पदों, बोर्ड-निगमों और महत्वपूर्ण संस्थाओं में कुछ ऐसे नाम सामने आ रहे हैं, जिनका इतिहास पार्टी अनुशासन से टकराव, बगावत या विवादों से जुड़ा रहा है। इससे कार्यकर्ताओं के बीच असहजता है, विपक्ष को हमला करने का मौका है और संगठन की साख पर प्रश्नचिह्न लग रहा है।
सबसे पहले चर्चा महेश केवट की। जून 2022 में निवाड़ी जिले से जुड़ा यह मामला भाजपा के अनुशासन की मिसाल के रूप में सामने आया था। पार्टी ने उन्हें छह साल के लिए निष्कासित किया था। आरोप था अनुशासनहीनता और कांग्रेस से नजदीकी। उस समय संदेश स्पष्ट था कि पार्टी के खिलाफ जाने वालों के लिए दरवाजे बंद हैं। लेकिन राजनीति का दृश्य अचानक बदलता है और वही नेता आज मछुआ कल्याण बोर्ड के अध्यक्ष बनाकर राज्यमंत्री स्तर का दर्जा पा लेते हैं।
अब सवाल सिर्फ व्यक्ति की वापसी का नहीं है। सवाल यह है कि यह वापसी किन रास्तों से हुई? क्या संगठन के भीतर किसी प्रभावशाली लॉबी ने उनकी फाइल आगे बढ़ाई? क्या शीर्ष नेतृत्व तक पूरा सच पहुंचाया गया? क्या यह बताया गया कि जिन कार्यकर्ताओं ने वर्षों तक पार्टी का झंडा उठाया, बूथ संभाला, दरी बिछाई, संघर्ष किया, उनके ऊपर एक निष्कासित चेहरे को प्राथमिकता दी जा रही है?
यहां असली चोट कार्यकर्ता के मनोबल पर पड़ती है। भाजपा हमेशा खुद को कैडर आधारित पार्टी कहती रही है। यदि कार्यकर्ता को यह महसूस होने लगे कि मेहनत से ज्यादा महत्व संपर्क का है, तो संगठन की जड़ें कमजोर होने लगती हैं। किसी भी राजनीतिक दल की असली ताकत उसके पदाधिकारी नहीं, बल्कि उसका मौन कार्यकर्ता होता है।
अब बात पन्ना के संजय नगाईच की। यह मामला और ज्यादा गंभीर इसलिए माना जा रहा है क्योंकि यहां सिर्फ संगठनात्मक विवाद नहीं, बल्कि कानूनी और नैतिक प्रश्न भी जुड़े हैं। उन पर करोड़ों रुपये के गबन के आरोप, धोखाधड़ी से जुड़ी एफआईआर और पार्टी विरोधी गतिविधियों के आरोप पहले भी चर्चा में रहे हैं। इसके बावजूद यदि ऐसे नाम को मध्य प्रदेश वेयरहाउसिंग एंड लॉजिस्टिक्स कॉर्पोरेशन जैसे महत्वपूर्ण संस्थान में जिम्मेदारी दी जाती है, तो स्वाभाविक रूप से सवाल उठेंगे।
वेयरहाउसिंग और लॉजिस्टिक्स कॉर्पोरेशन कोई सामान्य संस्था नहीं है। यह किसानों की उपज, भंडारण व्यवस्था, सप्लाई चेन और सार्वजनिक संसाधनों से जुड़ा संवेदनशील क्षेत्र है। ऐसे पद पर नियुक्ति केवल राजनीतिक संतुलन का मामला नहीं होती, बल्कि प्रशासनिक विश्वसनीयता का भी प्रश्न होती है। यदि नियुक्ति पर सवाल खड़े हों, तो संस्था की साख प्रभावित होती है।
यहां एक बड़ा राजनीतिक एंगल भी है। क्या संगठन के भीतर कुछ नेता जानबूझकर ऐसे विवादित नामों को आगे बढ़ा रहे हैं ताकि सरकार की छवि पर असर पड़े? क्या यह आंतरिक शक्ति-संघर्ष का हिस्सा है? क्या कुछ गुट अपने समर्थकों को स्थापित करने के लिए नेतृत्व की साफ छवि का इस्तेमाल कर रहे हैं? राजनीति में यह असंभव नहीं है। कई बार शीर्ष नेता का नाम आगे होता है, लेकिन फैसलों की स्क्रिप्ट कहीं और लिखी जाती है।
मुख्यमंत्री मोहन यादव की कार्यशैली अपेक्षाकृत सरल, संवाद आधारित और विकास केंद्रित मानी जाती है। यही सरलता कई बार ताकत भी होती है और कई बार सिस्टम के लिए अवसर भी। यदि आसपास बैठे लोग आधी जानकारी दें, चयनात्मक सिफारिश करें और निजी एजेंडा को संगठनात्मक आवश्यकता बताकर आगे बढ़ाएं, तो अच्छे इरादे भी विवाद में फंस जाते हैं।
भाजपा का वैचारिक ढांचा हमेशा कहता रहा है—देश पहले, पार्टी बाद में और व्यक्ति सबसे अंत में। लेकिन यदि व्यक्ति आधारित पैरवी पार्टी अनुशासन पर भारी पड़ने लगे, तो यह मूल दर्शन से विचलन माना जाएगा। यही कारण है कि कार्यकर्ता वर्ग के भीतर बेचैनी है। वे विरोध खुलकर नहीं करते, लेकिन सवाल जरूर पूछते हैं—क्या समर्पण अब पुराना मॉडल हो गया है? क्या अब तरक्की के लिए विचारधारा नहीं, किसी बड़े नेता का आशीर्वाद चाहिए?
विपक्ष भी ऐसे मामलों को तुरंत हथियार बना लेता है। जब भाजपा खुद को शुचिता, पारदर्शिता और अनुशासन की पार्टी कहती है, तब विरोधी दल हर विवादित नियुक्ति को उदाहरण बनाकर हमला करते हैं। यानी नुकसान सिर्फ एक पद या एक नाम का नहीं होता, नैरेटिव का होता है।
इस पूरे घटनाक्रम में जरूरी है कि जिम्मेदारी तय हो। यदि कोई नियुक्ति तथ्य छिपाकर कराई गई, तो उस प्रक्रिया की समीक्षा होनी चाहिए। यदि कोई नाम विवादित पृष्ठभूमि के बावजूद आगे बढ़ा, तो यह देखना चाहिए कि उसकी सिफारिश किस स्तर से हुई। यदि कार्यकर्ताओं में असंतोष है, तो संवाद होना चाहिए। और यदि संगठन की छवि प्रभावित हो रही है, तो सुधारात्मक कदम उठने चाहिए।
यह विश्लेषण किसी व्यक्ति विशेष के खिलाफ नहीं है। लोकतंत्र में हर व्यक्ति को सुधार, वापसी और अवसर का अधिकार है। लेकिन राजनीतिक पुनर्वास और संस्थागत नियुक्ति में अंतर होता है। वापसी हो सकती है, पर बिना जवाबदेही के पुरस्कृत वापसी सवाल जरूर खड़े करती है।
मध्य प्रदेश भाजपा के लिए यह सिर्फ नियुक्तियों का मामला नहीं, संगठनात्मक विश्वसनीयता की परीक्षा है। मुख्यमंत्री की मंशा यदि साफ है, तो उनके आसपास के फिल्टर भी साफ होने चाहिए। क्योंकि अगर दागियों को इनाम मिलेगा, तो ईमानदारों का भरोसा टूटेगा। और जब भरोसा टूटता है, तब सबसे मजबूत संगठन भी भीतर से कमजोर होने लगता है।
अखिलीक्स का सवाल सीधा है—क्या भाजपा में योग्यता की परिभाषा बदली जा रही है, या नेतृत्व समय रहते इस सिफारिशी तंत्र पर लगाम लगाएगा? आने वाले दिनों में इसका जवाब सिर्फ बयान नहीं, फैसले देंगे।



