यूपी में ‘पावर गेम’ का चरम!, सीएम के 13 बड़े मंत्रालयों पर दिल्ली की नजर, शाह-योगी क्लेश और 20 मई का लिटमस टेस्ट
उत्तर प्रदेश की राजनीति इस वक्त एक ऐसे निर्णायक मोड़ पर खड़ी है, जहां सत्ता के गलियारों में चल रही खामोश लड़ाई अब खुलकर ‘पावर गेम’ में बदलती दिखाई दे रही है। 10 मई को हुए मंत्रिमंडल विस्तार के बाद जिस तेजी से नए चेहरों को शपथ दिलाई गई थी, उससे यह उम्मीद की जा रही थी कि कुछ ही घंटों या अधिकतम एक-दो दिनों में मंत्रालयों का बंटवारा भी हो जाएगा। लेकिन अब एक हफ्ते से ज्यादा समय बीत जाने के बावजूद विभागों का आवंटन पूरी तरह ठप पड़ा हुआ है। आधिकारिक स्तर पर इसे “तकनीकी सहमति” और “संगठनात्मक संतुलन” का मामला बताया जा रहा है, लेकिन अखिलीक्स के खोजी सूत्रों के मुताबिक यह केवल एक प्रशासनिक देरी नहीं, बल्कि दिल्ली और लखनऊ के बीच छिड़े एक बड़े वैचारिक और राजनीतिक शक्ति संघर्ष का परिणाम है। सत्ता के शीर्ष पर बैठी भाजपा के भीतर इस समय जो मंथन चल रहा है, वह केवल मंत्रालय बांटने का नहीं, बल्कि उत्तर प्रदेश के भविष्य के ‘पावर स्ट्रक्चर’ को तय करने का संघर्ष बन चुका है।
अंदरूनी सूत्रों का दावा है कि इस पूरे टकराव की जड़ मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के पास मौजूद वे 13 सबसे ताकतवर विभाग हैं, जिन्हें दिल्ली अब एक व्यक्ति के नियंत्रण से निकालकर अलग-अलग शक्ति केंद्रों में बांटना चाहती है। मुख्यमंत्री के पास वर्तमान में गृह, नियुक्ति एवं कार्मिक, सतर्कता, सूचना एवं जनसंपर्क, आवास एवं शहरी नियोजन, राजस्व और लोक निर्माण विभाग जैसे बेहद प्रभावशाली मंत्रालय हैं। यही वे विभाग हैं जिनके जरिए शासन की असली पकड़ और नौकरशाही पर नियंत्रण स्थापित होता है। दिल्ली का केंद्रीय नेतृत्व अब इस व्यवस्था में व्यापक बदलाव चाहता है। माना जा रहा है कि हाल ही में मंत्रिमंडल में शामिल किए गए नए चेहरों और विशेष रूप से दोनों उपमुख्यमंत्रियों को अधिक प्रशासनिक शक्ति देने की रणनीति पर काम हो रहा है। राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा तेज है कि दिल्ली की मंशा यूपी सरकार के भीतर एक ऐसा संतुलन बनाने की है, जिसमें किसी एक नेता के हाथ में अत्यधिक शक्ति केंद्रित न रहे।
अखिलीक्स को मिली जानकारी के अनुसार केंद्रीय नेतृत्व की रणनीति केवल राजनीतिक संतुलन तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका सीधा संबंध नौकरशाही के नियंत्रण और भविष्य की राजनीतिक संरचना से भी जुड़ा हुआ है। यदि गृह, नियुक्ति, सतर्कता और सूचना जैसे विभाग मुख्यमंत्री से लेकर अलग-अलग शक्ति केंद्रों में बांटे जाते हैं, तो उत्तर प्रदेश की प्रशासनिक मशीनरी पर दिल्ली का प्रभाव पहले से कहीं अधिक मजबूत हो जाएगा। यही वजह है कि इस पूरे घटनाक्रम को केवल ‘मंत्रालय बंटवारा’ नहीं, बल्कि “लखनऊ बनाम दिल्ली” की सबसे बड़ी संस्थागत लड़ाई के रूप में देखा जा रहा है। सूत्र बताते हैं कि दिल्ली के कुछ रणनीतिकार मानते हैं कि उत्तर प्रदेश जैसे विशाल राज्य में शक्ति का विकेंद्रीकरण ही भविष्य की राजनीतिक स्थिरता का रास्ता है, जबकि योगी खेमे का मानना है कि ऐसा करना प्रशासनिक नियंत्रण को कमजोर करेगा और सरकार के भीतर समानांतर शक्ति केंद्र खड़े कर देगा।
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और उनके करीबी इस पूरे फेरबदल को अपनी प्रशासनिक कार्यशैली पर सीधे हमले के तौर पर देख रहे हैं। योगी खेमे की दलील साफ है कि उत्तर प्रदेश जैसा संवेदनशील और विशाल राज्य तभी नियंत्रित रह सकता है, जब गृह, सतर्कता, नियुक्ति और सूचना जैसे महत्त्वपूर्ण विभाग सीधे मुख्यमंत्री के नियंत्रण में रहें। उनका मानना है कि इन विभागों का बंटवारा नौकरशाही के भीतर भ्रम की स्थिति पैदा कर सकता है और कानून-व्यवस्था पर भी उसका असर दिखाई दे सकता है। यही कारण है कि मुख्यमंत्री इस व्यापक कटौती वाले फॉर्मूले को आसानी से स्वीकार करने के मूड में नहीं हैं। सूत्रों के मुताबिक उन्होंने अपने करीबी प्रशासनिक और राजनीतिक सलाहकारों के साथ कई दौर की बैठकें की हैं और दिल्ली के सामने अपनी मजबूत दलील रखने की तैयारी भी कर ली है।
अब इस पूरे सियासी संघर्ष का सबसे अहम पड़ाव रायपुर में होने वाली मध्य क्षेत्रीय परिषद की बैठक को माना जा रहा है, जहां गृह मंत्री अमित शाह और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ एक ही मंच पर दिखाई देंगे। राजनीतिक विश्लेषकों की नजर इस मुलाकात की बॉडी लैंग्वेज से लेकर बंद कमरे में होने वाली चर्चाओं तक पर टिकी हुई है। हालांकि भाजपा के अंदरूनी सूत्र यह भी मान रहे हैं कि अंतिम फैसला रायपुर में नहीं, बल्कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की विदेश यात्रा से वापसी के बाद ही होगा। 20 मई को प्रधानमंत्री की वापसी के बाद दिल्ली में होने वाली उच्चस्तरीय बैठकों में मंत्रालयों के अंतिम स्वरूप पर मुहर लग सकती है। यही कारण है कि अब पूरे उत्तर प्रदेश की राजनीति की निगाहें 20 मई पर टिक गई हैं।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि 20 मई केवल विभागों के आवंटन की तारीख नहीं होगी, बल्कि यह उस बड़े सवाल का जवाब भी देगी कि भाजपा के भीतर वास्तविक शक्ति संतुलन किस दिशा में जा रहा है। यदि मुख्यमंत्री के पास मौजूद प्रमुख विभागों में बड़ी कटौती होती है, तो इसे दिल्ली की निर्णायक जीत और योगी मॉडल की सीमाओं के संकेत के तौर पर देखा जाएगा। वहीं यदि योगी आदित्यनाथ अपने अधिकांश वीवीआईपी मंत्रालय बचाने में सफल रहते हैं, तो यह साफ संदेश होगा कि उत्तर प्रदेश में उनका राजनीतिक कद अभी भी केंद्रीय नेतृत्व के लिए चुनौतीपूर्ण और अपरिहार्य दोनों बना हुआ है।
इस पूरे घटनाक्रम ने भाजपा के भीतर चल रही उस खामोश वैचारिक बहस को भी सतह पर ला दिया है, जिसमें एक तरफ केंद्रीकृत नेतृत्व मॉडल है और दूसरी तरफ राज्यों में मजबूत क्षेत्रीय शक्ति केंद्रों का उभार। उत्तर प्रदेश की मौजूदा लड़ाई इसी बहस का सबसे बड़ा उदाहरण बनती दिखाई दे रही है। आने वाले कुछ दिन केवल मंत्रालयों का इंतजार नहीं, बल्कि भाजपा की भविष्य की सत्ता संरचना का रोडमैप तय करने वाले साबित हो सकते हैं। अब देखना यह होगा कि दिल्ली और लखनऊ के इस ‘महा-संग्राम’ में अंतिम जीत किसकी होती है और 20 मई के बाद खुलने वाला बंद लिफाफा यूपी की राजनीति में कौन सा नया विस्फोट लेकर आता है। देखते रहिए Akhileaks.com… क्योंकि सत्ता के हर बंद दरवाजे के पीछे की असली कहानी सबसे पहले यहीं सामने आती है।



