Exclusive

अमित शाह, लाल किला और आदिवासियों की ‘डी-लिस्टिंग’ की सबसे बड़ी इनसाइड स्टोरी!

देश की राजधानी दिल्ली का ऐतिहासिक लाल किला एक बार फिर ऐसी राजनीतिक और वैचारिक हलचल का केंद्र बनने जा रहा है, जिसकी गूंज सिर्फ सत्ता के गलियारों तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि आने वाले वर्षों में भारत की सामाजिक संरचना, आदिवासी राजनीति और आरक्षण व्यवस्था के पूरे विमर्श को प्रभावित कर सकती है। 24 मई 2026 को आयोजित होने वाला ‘जनजातीय सांस्कृतिक समागम’ केवल एक सांस्कृतिक आयोजन नहीं माना जा रहा, बल्कि इसे देश की सबसे बड़ी वैचारिक शक्ति प्रदर्शन रैली के रूप में देखा जा रहा है। इस आयोजन में देशभर से लगभग 5 लाख आदिवासियों के जुटने का दावा किया जा रहा है और सबसे अहम बात यह है कि इस मंच के केंद्र में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह स्वयं मौजूद रहेंगे। राजनीतिक विश्लेषकों की नजर इस बात पर टिकी है कि क्या लाल किले से उठने वाली यह हुंकार आने वाले समय में संविधान और आरक्षण की राजनीति को नई दिशा देने वाली है।
इस पूरे आयोजन का सबसे बड़ा और सबसे विवादित एजेंडा है—‘डी-लिस्टिंग’। यह ऐसा शब्द है जिसने पिछले कुछ महीनों में आदिवासी क्षेत्रों से लेकर राष्ट्रीय राजनीति तक गहरी बहस छेड़ दी है। जनजातीय सुरक्षा मंच और उससे जुड़े संगठनों का दावा है कि संविधान के अनुच्छेद 341 और अनुच्छेद 342 के बीच एक बड़ा अंतर मौजूद है। उनका तर्क है कि अनुसूचित जाति (SC) वर्ग में यदि कोई व्यक्ति अपना मूल धर्म छोड़कर ईसाई या इस्लाम स्वीकार करता है तो उसे आरक्षण का लाभ नहीं मिलता, लेकिन अनुसूचित जनजाति (ST) वर्ग में ऐसा कोई स्पष्ट प्रतिबंध नहीं होने के कारण धर्मांतरण के बाद भी आरक्षण और अन्य संवैधानिक लाभ जारी रहते हैं। इसी को आधार बनाकर अब यह मांग उठाई जा रही है कि जो आदिवासी अपनी पारंपरिक संस्कृति और मूल आस्था को छोड़ चुके हैं, उन्हें ST सूची से बाहर किया जाए।
इस आंदोलन की वैचारिक जड़ें नई नहीं हैं। इसे 1960 और 70 के दशक के आदिवासी नेता डॉ. कार्तिक उरांव की विचारधारा से जोड़कर देखा जा रहा है। संसद में उन्होंने सबसे पहले यह सवाल उठाया था कि यदि कोई व्यक्ति अपनी मूल आदिवासी परंपरा और सामाजिक संरचना से अलग होकर किसी अन्य धर्म को अपनाता है, तो क्या उसे उसी तरह जनजातीय संरक्षण और आरक्षण का लाभ मिलता रहना चाहिए? आज वही बहस नए राजनीतिक संदर्भों में फिर सामने खड़ी दिखाई दे रही है।
इस पूरे आंदोलन का सबसे बड़ा तर्क ‘डबल बेनिफिट’ यानी दोहरे लाभ का है। डी-लिस्टिंग की मांग करने वाले संगठनों का कहना है कि धर्मांतरित समुदाय एक तरफ अल्पसंख्यक योजनाओं और संस्थागत सुविधाओं का लाभ उठाते हैं, वहीं दूसरी तरफ ST आरक्षण के जरिए सरकारी नौकरियों, राजनीति और शिक्षा में भी मजबूत हिस्सेदारी बनाए रखते हैं। उनका आरोप है कि इसका सबसे बड़ा नुकसान उन मूल आदिवासी परिवारों को हो रहा है जो आज भी जंगलों और सुदूर इलाकों में पारंपरिक जीवनशैली के साथ संघर्ष कर रहे हैं। यही वजह है कि इस मुद्दे को अब ‘आरक्षण बनाम संस्कृति’ की बहस के रूप में भी पेश किया जा रहा है।
हालांकि इस आंदोलन ने आदिवासी समाज के भीतर ही एक गहरी वैचारिक रेखा खींच दी है। आरएसएस समर्थित वनवासी कल्याण आश्रम और जनजातीय सुरक्षा मंच इसे संस्कृति और पहचान बचाने की लड़ाई बता रहे हैं, जबकि झारखंड, छत्तीसगढ़ और पूर्वोत्तर के कई स्वतंत्र आदिवासी संगठनों का आरोप है कि यह आदिवासी समाज को बांटने की राजनीतिक रणनीति है। विरोध करने वाले संगठनों का कहना है कि आदिवासी पहचान धर्म से नहीं, बल्कि उनकी पारंपरिक सामाजिक संरचना और भौगोलिक जीवनशैली से तय होती है। इसलिए धर्मांतरण को आधार बनाकर ST पहचान समाप्त करना आदिवासी एकता को कमजोर करेगा।
इस पूरी राजनीतिक पटकथा का सबसे मजबूत आधार हाल ही में नक्सलवाद से प्रभावित रहे बस्तर क्षेत्र में तैयार हुआ है। गृह मंत्री अमित शाह ने अपने हालिया बस्तर दौरे के दौरान जिस तरह ‘नक्सल मुक्त बस्तर’ और ‘विकसित बस्तर’ का नया नैरेटिव प्रस्तुत किया, उसने पूरे घटनाक्रम को नया आयाम दे दिया। पहले जहां बस्तर को केवल सुरक्षा और सैन्य कार्रवाई के नजरिए से देखा जाता था, वहीं अब सरकार वहां विकास, विश्वास और वैचारिक पुनर्निर्माण की रणनीति पर जोर देती दिखाई दे रही है। अमित शाह ने घोषणा की कि बस्तर में स्थापित लगभग 400 सुरक्षा कैंप अब केवल सैन्य चौकियां नहीं रहेंगे, बल्कि उन्हें ‘सेवा केंद्र’ के रूप में विकसित किया जाएगा, जहां से आदिवासियों तक राशन, स्वास्थ्य, शिक्षा, सड़क और अन्य सरकारी सुविधाएं सीधे पहुंचाई जाएंगी।
सरकार का दावा है कि पिछले 50 वर्षों में नक्सलवाद ने बस्तर को विकास की मुख्यधारा से दूर रखा, लेकिन अब अगले 5 वर्षों में इस पूरे क्षेत्र को देश का सबसे विकसित आदिवासी संभाग बनाने की योजना तैयार की जा रही है। यही वजह है कि लाल किले के इस आयोजन को केवल सांस्कृतिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि ‘विकास + वैचारिक ध्रुवीकरण’ की संयुक्त राजनीतिक रणनीति के रूप में देखा जा रहा है।
अगर इस पूरे घटनाक्रम के राजनीतिक गणित को समझा जाए तो तस्वीर और भी स्पष्ट हो जाती है। भारत में अनुसूचित जनजातियों की आबादी लगभग 10 करोड़ 42 लाख है, जो कुल आबादी का करीब 8.6 प्रतिशत हिस्सा है। लोकसभा की 47 सीटें सीधे ST वर्ग के लिए आरक्षित हैं, जबकि 30 से ज्यादा सीटें ऐसी हैं जहां आदिवासी वोट निर्णायक भूमिका निभाते हैं। यानी लगभग 80 से अधिक लोकसभा सीटों पर आदिवासी वोट बैंक का सीधा प्रभाव है। मध्य प्रदेश, झारखंड, छत्तीसगढ़, उड़ीसा, गुजरात और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में आदिवासी वोट किसी भी चुनावी परिणाम को बदलने की क्षमता रखते हैं।
मध्य प्रदेश इस राजनीति का सबसे बड़ा केंद्र माना जा रहा है क्योंकि देश की सबसे बड़ी आदिवासी आबादी यहीं रहती है। राज्य की 29 लोकसभा सीटों में से 6 सीटें ST वर्ग के लिए आरक्षित हैं, जबकि विधानसभा की 47 सीटें आदिवासी वर्ग के प्रभाव में हैं। यही वजह है कि बीजेपी और संघ लंबे समय से आदिवासी इलाकों में वैचारिक और सामाजिक पकड़ मजबूत करने में जुटे हुए हैं।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि डी-लिस्टिंग का मुद्दा बीजेपी के लिए केवल वैचारिक नहीं, बल्कि चुनावी दृष्टि से भी बेहद महत्वपूर्ण है। इसके जरिए गैर-धर्मांतरित आदिवासियों का एक बड़ा ध्रुवीकरण संभव माना जा रहा है। साथ ही विपक्ष के ‘जल-जंगल-जमीन’ और ‘आदिवासी बनाम वनवासी’ नैरेटिव की काट तैयार करने की कोशिश भी दिखाई देती है। यदि विपक्ष डी-लिस्टिंग का विरोध करता है, तो उसे ‘धर्मांतरण समर्थक’ और ‘मूल आदिवासियों के अधिकारों के खिलाफ’ बताने की रणनीति भी तैयार मानी जा रही है।
लाल किले पर होने वाला यह महाकुंभ इसलिए भी अहम है क्योंकि यह केवल एक सांस्कृतिक शक्ति प्रदर्शन नहीं, बल्कि 2026 से 2029 तक की राजनीति का नया ब्लूप्रिंट बनता दिखाई दे रहा है। अमित शाह जिस तरह नक्सल प्रभावित इलाकों में विकास और वैचारिक राष्ट्रवाद को एक साथ जोड़ने की कोशिश कर रहे हैं, उसे बीजेपी की सबसे आक्रामक सामाजिक इंजीनियरिंग रणनीतियों में से एक माना जा रहा है। आने वाले समय में यह मुद्दा संसद से लेकर सुप्रीम कोर्ट और चुनावी मैदान तक बड़ा राजनीतिक और संवैधानिक संघर्ष पैदा कर सकता है।
अखिलीक्स की इस स्पेशल डीप डाइव में सबसे बड़ा सवाल यही है—क्या लाल किले से उठने वाली यह हुंकार वास्तव में आदिवासी समाज को ‘असली न्याय’ दिलाने की शुरुआत है, या फिर यह देश की सबसे बड़ी चुनावी सामाजिक इंजीनियरिंग का अगला अध्याय? आने वाले महीनों में इसका जवाब भारत की राजनीति का नया भविष्य तय करेगा।

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button