अखिलीक्स एक्सक्लूसिव: जंतर-मंतर पर ‘जेन ज़ी’ का शंखनाद, शिक्षा मंत्री का इस्तीफा और सियासत का मास्टरस्ट्रोक
नमस्कार! अखिलीक्स के इस खास ‘डीप डाइव’ विश्लेषण में आपका स्वागत है। आज हम उस सियासी भूचाल की बात कर रहे हैं, जिसका केंद्र इस बार दिल्ली का जंतर-मंतर बना है। यह मामला सिर्फ शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उस ‘जेन ज़ी’ (Gen Z) की हुंकार है, जिसने दिल्ली के तख्त को एक बड़ा फैसला लेने पर मजबूर कर दिया। कॉकरोच जनता पार्टी (CGP) और उसके संस्थापक अभिजीत दीपके के नेतृत्व में जंतर-मंतर से जो शंखनाद हुआ, उसने एक बार फिर इस कहावत को सच साबित कर दिया है कि— “झुकती है दुनिया, झुकाने वाला चाहिए।”
धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा इस युवा आंदोलन का पहला विकेट ज़रूर है, लेकिन अगर हम इसे सिर्फ सिस्टम की हार मान लें, तो यह विश्लेषण बिल्कुल अधूरा होगा। दरअसल, इस पूरे घटनाक्रम में पर्दे के पीछे सरकार ने बेहद समझदारी और दूरदृष्टि का परिचय दिया है। याद कीजिए हमारे पड़ोसी देश नेपाल का वह हालिया ‘जेन ज़ी’ आंदोलन, जिसने वहां की पूरी व्यवस्था को हिला कर रख दिया था। भारत सरकार ने उस अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रम से सबक लिया और खुद प्रधानमंत्री ने आगे बढ़कर देश के यूथ के साथ कनेक्ट करने की रणनीति अपनाई। सरकार ने अपने कदम पीछे इसलिए खींचे, ताकि कोई भी अवसरवादी राजनीतिक दल या ‘देश विरोधी ताकतें’ युवाओं के इस आक्रोश का गलत फायदा ना उठा सकें।
इस फैसले के पीछे की रणनीति को समझने के लिए हमें संघ प्रमुख मोहन भागवत के उस बयान को भी याद करना होगा, जिसमें उन्होंने एक बहुत गहरी बात कही थी। उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा था कि इस नई जनरेशन (Gen Z) को आदेश देकर या ‘डिक्टेट’ करके नहीं समझाया जा सकता, बल्कि इनसे केवल ‘डिस्कशन’ यानी संवाद के जरिए ही बात की जा सकती है। सत्ता के गलियारों में शायद इस बात को समय रहते समझ लिया गया। सियासत का एक बड़ा उसूल है कि एक ताकतवर लीडर वही होता है, जो सही वक्त पर दो कदम पीछे हटना जानता हो। और जब मांग देश के अपने युवाओं की हो, और वो मांग पूरी तरह से ‘जेनुइन’ हो, तो झुकने में हार नहीं, बल्कि बड़प्पन है।
नीट (NEET) पेपर लीक के बाद देश भर के छात्रों में जो गुस्सा था, वह कोई राजनीतिक प्रोपेगेंडा नहीं था, वो एक असली दर्द था। उन मासूम बच्चों की पीड़ा को कैसे नज़रअंदाज़ किया जा सकता था, जिन्होंने इस पेपर लीक और सिस्टम की नाकामी से टूटकर अपनी जान दे दी। यह कोई आम आंदोलन नहीं था, यह उन छात्रों के सपनों और उनकी जिंदगियों की लड़ाई थी। इसलिए, जंतर-मंतर पर उमड़े इस आक्रोश को शांत करने के लिए सरकार का यह कदम एक रणनीतिक मास्टरस्ट्रोक था।
लेकिन असली कहानी अब यहाँ से शुरू होती है। इस इस्तीफे के बाद अब उन तमाम नेताओं और मंत्रियों को भी सावधान हो जाना चाहिए, जिन पर करप्शन (भ्रष्टाचार) के गंभीर आरोप लगे हैं। सत्ताधीशों को यह बात अच्छे से समझ लेनी चाहिए कि शिक्षा और भविष्य के साथ खिलवाड़ के बाद, ‘करप्शन’ ही वह सबसे बड़ा मुद्दा है, जिस पर देश का युवा रातों-रात लामबंद (mobilize) हो सकता है। सीजीपी और अभिजीत दीपके ने जो राजनीति शुरू की है, उसने यकीनन देश के सामने एक नया पॉलिटिकल टेम्पलेट सेट कर दिया है।
भले ही सरकार ने एक मंत्री का इस्तीफा लेकर समझदारी से डैमेज कंट्रोल कर लिया हो, लेकिन देश के युवाओं को अब अपनी एकजुटता और ताकत का अंदाज़ा हो चुका है। अगर देश का यूथ शिक्षा के लिए दिल्ली को झुका सकता है, तो दागी और भ्रष्ट नेताओं के खिलाफ भी वह जंतर-मंतर पर जुटने में देर नहीं लगाएगा। अब यह देखना बेहद दिलचस्प होगा कि जंतर-मंतर से उठी ‘जेन ज़ी’ की यह चिंगारी, संवाद के इस नए दौर में आगे चलकर करप्शन के खिलाफ कितने बड़े विकेट गिराती है।
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