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अखिलीक्स एक्सक्लूसिव: उज्जैन बीजेपी में मचे घमासान का इनसाइड सच! मेयर टटवाल के सरेआम अपमान के पीछे की गहरी साजिश और ‘सौतेला खेल’

आज हम बात करेंगे मध्य प्रदेश के उज्जैन में भारतीय जनता पार्टी के भीतर मचे उस सियासी घमासान की, जिसने पार्टी के स्थानीय संगठन की कार्यप्रणाली और अनुशासन पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन के रोड शो में जो कुछ हुआ, वह सिर्फ एक लापरवाही नहीं, बल्कि संगठन की एक बहुत बड़ी और शर्मनाक चूक है। शहर के प्रथम नागरिक, यानी महापौर मुकेश टटवाल को सरेआम रथ से नीचे उतार दिया गया। अखिलीक्स की पड़ताल में यह शीशे की तरह साफ है कि नगर अध्यक्ष संजय अग्रवाल द्वारा बनाई गई अधिकृत सूची से महापौर का नाम एक सोची-समझी रणनीति के तहत गायब किया गया था। यह सीधे तौर पर संगठन के भीतर चल रही गुटबाजी और समन्वय की भारी कमी का जीता-जागता सबूत है।

इस पूरी संगठनात्मक चूक में दोहरे मापदंड का सबसे बड़ा और हैरान करने वाला उदाहरण तब बेनकाब होता है, जब हम हेमंत खंडेलवाल की भूमिका देखते हैं। जिस ‘तथाकथित सूची’ का हवाला देकर और नियम-कायदे बताकर महापौर टटवाल को सरेआम जलील करके रथ से उतारा गया, अखिलीक्स इस बात को प्रमुखता से उठा रहा है कि उसी सूची में हेमंत खंडेलवाल का नाम भी नहीं था! इसके बावजूद वे पूरे समय रथ पर शान से विराजमान रहे। ऐसे में संगठन से यह सवाल पूछना लाजिमी है कि नियम और प्रोटोकॉल क्या सिर्फ महापौर के लिए ही थे? बिना सूची में नाम हुए एक नेता को रथ पर जगह देना और दूसरे को उतार देना, संगठन की निष्पक्षता पर सीधा प्रहार है।

अपने साथ हुए इस सौतेले व्यवहार और सार्वजनिक अपमान को लेकर महापौर मुकेश टटवाल ने कड़ा रुख अपनाया है। उन्होंने स्पष्ट तौर पर सूची बनाने वाले स्थानीय पार्टी नेताओं और नगर अध्यक्ष की शिकायत पार्टी के शीर्ष नेतृत्व और राष्ट्रीय पदाधिकारियों से की है। टटवाल ने आलाकमान को साफ संदेश दिया है कि उनके साथ जानबूझकर भेदभाव किया गया है और पार्टी स्तर पर बनी सूची में उनका नाम न होना एक गहरी राजनीतिक साजिश का हिस्सा है।

अब सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि संगठन की इस भारी फजीहत से कैसे बचा जा सकता था? अगर स्थानीय संगठन और विशेषकर नगर अध्यक्ष संजय अग्रवाल ने थोड़ी सी भी राजनीतिक परिपक्वता और सूझबूझ दिखाई होती, तो यह नौबत ही नहीं आती। महापौर किसी गुट का नहीं, बल्कि पूरे शहर का प्रथम नागरिक होता है, प्रोटोकॉल के लिहाज से उनका नाम स्वतः ही वीआईपी सूची में सबसे ऊपर होना चाहिए था। रोड शो से पहले अगर कोर कमेटी की एक छोटी सी समन्वय बैठक कर ली जाती, या फिर विवाद होने पर मौके पर ही डैमेज कंट्रोल करते हुए महापौर को रथ पर सम्मानजनक जगह दे दी जाती, तो आज सड़कों पर पार्टी की इतनी बड़ी किरकिरी होने से बच जाती।

लेकिन अब जब यह विवाद सड़क पर आ चुका है, तो चूक करने वालों पर क्या कार्रवाई होनी चाहिए? संगठन को अगर अपना इकबाल और अनुशासन कायम रखना है, तो शीर्ष नेतृत्व को इस मामले में तुरंत कड़ा एक्शन लेना होगा। जिन स्थानीय नेताओं और विशेषकर नगर अध्यक्ष ने यह सूची तैयार की और प्रोटोकॉल का खुलेआम उल्लंघन करते हुए पार्टी की छवि को दांव पर लगाया, उन्हें तत्काल प्रभाव से कारण बताओ नोटिस (Show Cause Notice) जारी किया जाना चाहिए। व्यक्तिगत खुन्नस और गुटबाजी के चलते एक चुने हुए जनप्रतिनिधि का सरेआम अपमान करने वाले जिम्मेदारों को पद से हटाने जैसी सख्त अनुशासनात्मक कार्रवाई होनी चाहिए, ताकि संगठन में यह कड़ा संदेश जाए कि पार्टी सर्वोपरि है, कोई व्यक्ति विशेष नहीं।

फिलहाल इस संगठनात्मक विफलता का खामियाजा पूरी पार्टी भुगत रही है। बैरवा समाज ने इसे अपना अपमान मानते हुए सीधे राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री के नाम ज्ञापन भेजकर उच्च स्तरीय जांच की मांग कर डाली है। आहत महापौर 20 सितंबर को टावर चौक पर बाबा साहब डॉ. आंबेडकर की प्रतिमा के पास अनशन पर बैठने जा रहे हैं, और विपक्ष में बैठे कांग्रेस विधायक महेश परमार इसे ‘पूरे उज्जैन का अपमान’ बताकर इस आग को और भड़का रहे हैं। नगर अध्यक्ष की चुप्पी बता रही है कि स्थानीय संगठन हालात संभालने में पूरी तरह फेल हो चुका है। अब यह देखना बेहद दिलचस्प होगा कि पार्टी का शीर्ष नेतृत्व इस बगावत को शांत करने के लिए दोषियों पर क्या चाबुक चलाता है। ऐसी ही बेबाक, सटीक और अंदर की खबरों के लिए जुड़े रहिए अखिलीक्स के साथ।

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