Exclusive

अखिलीक्स एक्सक्लूसिव: 350 करोड़ का टेंडर, लापता यूनिफॉर्म और आजादी के 80वें जश्न में नीलाम होता बचपन

नमस्कार, बहुत स्वागत है आपका, मैं हूं अखिलेश सोलंकी और आप पढ़ रहे हैं अखिलीक्स की वो एक्सक्लूसिव पड़ताल, जो सत्ता के बंद कमरों की सबसे स्याह हकीकत को आपके सामने नंगा कर देगी। कागजों पर गढ़े गए ‘स्वर्णिम मध्यप्रदेश’ के दावों की स्याही जब हकीकत की उबड़-खाबड़ जमीन पर उतरती है, तो वह 56 लाख स्कूली बच्चों के तन पर झूलती पुरानी, फटी और उधड़ी हुई यूनिफॉर्म के रूप में सिस्टम के मुंह पर एक सीधा तमाचा बन जाती है। इस बार देश ने पूरे गर्व के साथ अपनी आजादी का 80वां जश्न मनाया, लेकिन 15 अगस्त के इस पावन राष्ट्रीय पर्व पर मध्य प्रदेश के सरकारी स्कूलों की कतारों में एक बेहद शर्मनाक तस्वीर नजर आई, जहां लाखों बच्चे बिना यूनिफॉर्म या पुरानी, छोटी हो चुकी ड्रेस में ही जश्न-ए-आजादी मनाने को मजबूर थे। यह कोई सामान्य प्रशासनिक लेटलतीफी या किसी बाबू की मामूली चूक नहीं है, बल्कि यह 350 करोड़ रुपये के उस सोचे-समझे ‘टेंडर-तंत्र’ का नतीजा है, जिसने बच्चों के तन से कपड़े छीनकर बड़ी कंपनियों की तिजोरियां भरने का ऐसा चक्रव्यूह रचा कि आज स्कूल शिक्षा मंत्री राव उदय प्रताप सिंह के विभाग की पूरी की पूरी व्यवस्था मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के स्टे (Stay) के जाल में बुरी तरह फड़फड़ा रही है।

नीतियों का ‘खेला’ और छीना गया रोजगार
इस नीतिगत ‘खेला’ की क्रोनोलॉजी बेहद चौंकाने वाली और सत्ता के लालच को बेनकाब करने वाली है। कल तक व्यवस्था बिल्कुल पारदर्शी थी; बच्चों के खातों में डीबीटी (DBT) के जरिए सीधे ₹600 आते थे, जिससे गांव-कस्बों के स्व-सहायता समूहों (SHGs) की गरीब महिलाएं अपने हाथों से ड्रेसेस सिलकर सम्मान से अपना घर चलाती थीं, लेकिन शिक्षा मंत्री राव उदय प्रताप सिंह के वातानुकूलित कमरों में बैठे रणनीतिकारों को यह सादगी और ईमानदारी रास नहीं आई। रातों-रात 700 करोड़ के टर्नओवर वाली बड़ी कॉर्पोरेट कंपनियों को फायदा पहुंचाने के लिए एक ऐसा सेंट्रलाइज्ड टेंडर डिजाइन किया गया, जिसने झटके में उन हजारों गरीब महिलाओं के हाथों से सुई-धागा छीन लिया और उन्हें बेरोजगार कर दिया। मुनाफे की यह बिसात इतनी बेखौफ बिछाई गई थी कि जब इस पूरी प्रक्रिया में धांधली की बदबू उठने लगी, तो अदालत को खुद संज्ञान लेना पड़ा और फौरन इस मेगा-टेंडर पर रोक लगा दी गई, जिसके बाद से प्रदेश का पूरा शिक्षा महकमा जवाब देने से बचता फिर रहा है।

दांव पर नौनिहालों का स्वाभिमान
इस कानूनी लड़ाई और कमीशनखोरी की बिसात में सबसे ज्यादा वो गरीब माता-पिता पिस रहे हैं, जो हर सुबह अपने बच्चों को पैबंद लगी पुरानी ड्रेस पहनाते वक्त खुद को इस भ्रष्ट सिस्टम के हाथों ठगा हुआ महसूस करते हैं। जरा उस बेबस पिता की नजर से सिस्टम को देखिए, जो दिन भर पसीना बहाने के बाद यह देखता है कि उसका बच्चा स्कूल में बिना यूनिफॉर्म के जाने के कारण किस कदर हीन भावना का शिकार हो रहा है। जब पड़ोस के किसी प्राइवेट स्कूल का बच्चा साफ-सुथरी टाई-बेल्ट में निकलता है और वहीं सरकारी स्कूल का बच्चा रंग उड़े हुए कपड़ों में सिर झुकाए खड़ा होता है, तो वहां केवल एक कपड़ा नहीं फटता, बल्कि उस बच्चे का स्वाभिमान तार-तार होता है, जिसे सरकार ने अपने 350 करोड़ के मुनाफे की वेदी पर चढ़ा दिया है।

टूटता भरोसा और मिशनरी स्कूलों का बढ़ता दायरा
यही वो हृदयहीन प्रशासनिक नीतियां हैं, जिनके कारण आज निचले और मध्यम वर्ग का सरकारी शिक्षा व्यवस्था से पूरी तरह मोहभंग हो रहा है, और मिशनरी स्कूल या अन्य निजी संस्थाएं इसी सरकारी खालीपन का सीधा फायदा उठाकर इन गरीब बच्चों को तेजी से अपने सिस्टम की तरफ खींच रही हैं। महज एक साफ ड्रेस, कुछ मुफ्त किताबों और थोड़ी सी झूठी सहानुभूति का चोगा पहनाकर ये संस्थाएं उस विश्वास को बहुत आसानी से खरीद रही हैं, जिसे माननीय राव उदय प्रताप सिंह जी का शिक्षा विभाग अपनी अदूरदर्शिता, लेटलतीफी और 350 करोड़ के टेंडर की जिद में हमेशा के लिए खोता जा रहा है। अगर यही आलम रहा, तो वो दिन दूर नहीं जब सरकारी स्कूल सिर्फ कागजों और खंडहरों में तब्दील होकर रह जाएंगे।

अखिलीक्स का सीधा सवाल
आज ‘अखिलीक्स’ के इस मंच से हमारा सूबे की जनता और सत्ता के शीर्ष पर बैठे नुमाइंदों से सीधा सवाल है— क्या आजादी के 80वें जश्न पर बच्चों को बिना यूनिफॉर्म के खड़ा कर देना सिर्फ एक प्रशासनिक चूक है, या 350 करोड़ के मुनाफे के लिए रची गई कोई सोची-समझी साजिश? क्या स्कूल शिक्षा मंत्री राव उदय प्रताप सिंह को आगे आकर इस जलालत की जिम्मेदारी नहीं लेनी चाहिए और प्रदेश से माफी नहीं मांगनी चाहिए?

आपकी क्या राय है? नीचे कमेंट बॉक्स में अपने विचार जरूर लिखें, इस ज्वलंत बहस में हिस्सा लें, और इस रिपोर्ट को अपने सभी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर इतना शेयर करें कि इन 56 लाख मासूमों की यह आवाज़ सत्ता के बंद और बहरे दरवाजों को तोड़ सके।
देखते रहिए, पढ़ते रहिए— अखिलीक्स… क्योंकि सच छुपता नहीं।

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button