आदिम जाति विभाग में ‘भूतिया चिपसेट’ का खेल? Acer इंडिया के पत्र ने खोली ₹31 करोड़ से ज्यादा की कथित ‘स्मार्ट लूट’ की परतें
इस वक्त पूरी दुनिया एक ऐसे भू-राजनीतिक संकट से गुजर रही है जहाँ इज़रायल, अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव ने वैश्विक सप्लाई चेन को झकझोर कर रख दिया है। पेट्रोल, डीजल और एलपीजी की सप्लाई पर दबाव है, कच्चे तेल की कीमतों में उछाल की आशंका बढ़ रही है, और सोने पर बढ़ी इंपोर्ट ड्यूटी ने आम आदमी की बचत पर सीधा असर डालना शुरू कर दिया है। दुनिया भर की सरकारें जरूरी संसाधनों को बचाने और पारदर्शी खरीद प्रणाली बनाए रखने की कोशिश कर रही हैं, लेकिन मध्य प्रदेश के आदिम जाति कल्याण विभाग में एक ऐसा मामला सामने आया है जिसने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या सरकारी खरीद के नाम पर तकनीकी शब्दों की आड़ में करोड़ों रुपये की ‘डिजिटल लूट’ का रास्ता बनाया जा रहा है?
Akhileaks के हाथ लगे Acer इंडिया के आधिकारिक पत्र ने विभागीय टेंडर प्रक्रिया पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। मामला संदीपनि विद्यालयों के लिए प्रस्तावित 3760 कंप्यूटर लैब और 1504 स्मार्ट क्लास से जुड़ा हुआ है। आरोप है कि इस पूरी खरीद प्रक्रिया में ऐसी तकनीकी शर्तें डाली गईं जिनका वास्तविकता से कोई संबंध ही नहीं है। सबसे बड़ा विवाद ‘AMD Pro 665’ नाम के उस कथित चिपसेट को लेकर है, जिसके बारे में Acer इंडिया ने साफ शब्दों में लिखा कि दुनिया में ऐसा कोई चिपसेट या मदरबोर्ड अस्तित्व में ही नहीं है। सवाल यह है कि जब कोई तकनीक बाजार में उपलब्ध ही नहीं है, तो उसे सरकारी टेंडर की अनिवार्य शर्त कैसे बनाया गया? क्या यह केवल तकनीकी गलती थी, या फिर पहले से तय सप्लायर को फायदा पहुँचाने के लिए बनाया गया एक ‘टेलर-मेड मॉडल’?
Acer इंडिया ने अपने पत्र में यह भी दावा किया कि विभाग की कुछ शर्तों की वजह से सरकार को प्रति यूनिट लगभग ₹59,900 तक अतिरिक्त भुगतान करना पड़ सकता है। अगर इस अनुमान को पूरी परियोजना पर लागू किया जाए तो संभावित अतिरिक्त वित्तीय बोझ ₹31 करोड़ 37 लाख से ज्यादा बैठता है। यह रकम उस दौर में और भी गंभीर हो जाती है जब आम नागरिक महंगाई, ईंधन कीमतों और आर्थिक दबाव से जूझ रहा है। आरोप यह भी है कि ‘Ubuntu Certification’ जैसी अनावश्यक तकनीकी शर्तें जोड़कर प्रतिस्पर्धा को सीमित किया गया, जिससे कम कीमत पर योग्य सप्लायर्स बाहर हो जाएँ और महंगे कोटेशन को वैध ठहराया जा सके।
सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि Acer ने कथित तौर पर 13 मार्च 2026 को ही विभाग को लिखित रूप से आगाह कर दिया था कि टेंडर की तकनीकी शर्तें अव्यावहारिक हैं और इससे सरकारी खजाने को भारी नुकसान हो सकता है। इसके बावजूद विभागीय स्तर पर कोई बड़ा सुधार या संशोधन सामने नहीं आया। अब सवाल सीधे प्रशासनिक जवाबदेही पर खड़ा हो रहा है। क्या अधिकारियों ने जानबूझकर इन आपत्तियों को नजरअंदाज किया? क्या यह केवल लापरवाही थी, या फिर इसके पीछे कोई बड़ा आर्थिक हित जुड़ा हुआ था? Akhileaks की पड़ताल में यह भी चर्चा है कि विभागीय स्तर पर ऐसी शर्तें केवल तभी डाली जाती हैं जब किसी विशेष सप्लायर के लिए रास्ता तैयार करना हो।
यह पूरा मामला इसलिए भी गंभीर हो जाता है क्योंकि यह आदिवासी छात्रों की शिक्षा और डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर से जुड़ा हुआ है। जिन संसाधनों का उद्देश्य दूरदराज क्षेत्रों के बच्चों को आधुनिक शिक्षा से जोड़ना होना चाहिए, उन्हीं संसाधनों पर अब कथित कमीशनखोरी और तकनीकी हेरफेर के आरोप लग रहे हैं। यदि आरोप सही साबित होते हैं तो यह केवल वित्तीय अनियमितता नहीं बल्कि आदिवासी शिक्षा के नाम पर भरोसे के साथ खिलवाड़ माना जाएगा।
अब निगाहें मुख्यमंत्री Mohan Yadav और राज्य सरकार पर टिक गई हैं। क्या इस कथित ‘भूतिया चिपसेट’ मामले की उच्चस्तरीय जांच होगी? क्या टेंडर प्रक्रिया की तकनीकी समीक्षा कराई जाएगी? और सबसे बड़ा सवाल — क्या उन अधिकारियों की जवाबदेही तय होगी जिनके फैसलों की वजह से करोड़ों रुपये के संभावित नुकसान का आरोप लग रहा है?
Akhileaks लगातार इस पूरे मामले की परत-दर-परत जांच कर रहा है। अगर आपके पास इस टेंडर, सप्लाई प्रक्रिया या विभागीय निर्णयों से जुड़े दस्तावेज़ या जानकारी है, तो आप हम तक पहुँचा सकते हैं। क्योंकि सवाल केवल एक टेंडर का नहीं है, सवाल यह है कि क्या मध्य प्रदेश में डिजिटल शिक्षा के नाम पर ‘अदृश्य तकनीक’ बेचकर सरकारी खजाने को नुकसान पहुँचाने की कोशिश की जा रही थी? देखते रहिए Akhileaks.com — सच की जीत तक।



