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मध्य प्रदेश कांग्रेस में ‘साइलेंट वॉर’: क्या जीतू पटवारी सिस्टम बदलने आए थे या सिस्टम का शिकार हो रहे हैं?

मध्य प्रदेश की राजनीति में इस वक्त जो सबसे बड़ा राजनीतिक संघर्ष चल रहा है, वह भाजपा और कांग्रेस के बीच नहीं, बल्कि कांग्रेस के अपने ही घर के भीतर चल रहा एक ‘साइलेंट वॉर’ है। यह लड़ाई पोस्टरों और प्रेस कॉन्फ्रेंसों में दिखाई नहीं देती, लेकिन इसके कंपन भोपाल से लेकर दिल्ली तक महसूस किए जा रहे हैं। साल 2023 के विधानसभा चुनाव में मिली करारी हार के बाद जब कांग्रेस हाईकमान ने जीतू पटवारी को प्रदेश अध्यक्ष बनाकर एक नई शुरुआत का संदेश दिया था, तब पार्टी के भीतर यह उम्मीद जगी थी कि अब कांग्रेस पुराने गुटीय ढांचे से बाहर निकलकर एक आधुनिक चुनावी मशीन बनने की कोशिश करेगी। लेकिन डेढ़-दो साल बाद तस्वीर यह है कि कांग्रेस आज भी उन्हीं पुराने शक्ति केंद्रों, उन्हीं क्षेत्रीय क्षत्रपों और उन्हीं व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं के जाल में उलझी हुई दिखाई देती है, जिसने उसे लगातार कमजोर किया है।

अखिलीक्स की पड़ताल बताती है कि जीतू पटवारी ने शुरुआत में संगठन के भीतर कई आक्रामक बदलाव करने की कोशिश की। उनका फोकस सिर्फ प्रेस बयान देने वाली राजनीति नहीं, बल्कि बूथ स्तर पर संरचना खड़ी करने पर था। “संगठन सृजन अभियान 2025” इसी रणनीति का हिस्सा माना गया, जिसके तहत जिलाध्यक्षों से लेकर ब्लॉक स्तर तक नई नियुक्तियों का रोडमैप तैयार किया गया। कागजों पर यह अभियान बेहद प्रभावशाली दिखाई देता है। कांग्रेस का दावा है कि उसने बूथ स्तर तक नई ऊर्जा भर दी है, लेकिन जमीन पर स्थिति अलग है। जिन नए चेहरों को जिम्मेदारी मिली, उनमें बड़ी संख्या ऐसे नेताओं की है जो किसी न किसी बड़े गुट या वरिष्ठ नेता के करीबी माने जाते हैं। यही कारण है कि संगठन का ढांचा भले बदल गया हो, लेकिन संगठन की आत्मा अब भी पुराने समीकरणों की कैद में है।

यही वजह है कि कांग्रेस आज भी भाजपा के “पन्ना प्रमुख मॉडल” का कोई ठोस जवाब तैयार नहीं कर पाई है। भाजपा वर्षों से माइक्रो मैनेजमेंट पर काम कर रही है। बूथ स्तर पर डेटा, लाभार्थी नेटवर्क, सोशल मीडिया नैरेटिव और कार्यकर्ताओं की सीधी जवाबदेही—यह सब भाजपा की चुनावी मशीन को मजबूत बनाता है। इसके मुकाबले कांग्रेस का संगठन अभी भी “इवेंट आधारित राजनीति” से पूरी तरह बाहर नहीं निकल पाया है। अखिलीक्स को मिले इनपुट्स बताते हैं कि कई जिलों में नए पदाधिकारियों की नियुक्ति तो हुई, लेकिन उन्हें संसाधन, प्रशिक्षण और स्पष्ट राजनीतिक दिशा नहीं मिली। नतीजा यह हुआ कि संगठन की नई संरचना जमीन पर प्रभावी होने के बजाय सिर्फ सूची और पोस्टर तक सीमित रह गई।

वल्लभ भवन की राजनीति पर नजर रखने वाले सूत्र बताते हैं कि कांग्रेस की सबसे बड़ी समस्या भाजपा नहीं बल्कि “सिंगल वॉइस की कमी” है। हर मंगलवार जब मोहन यादव सरकार कैबिनेट ब्रीफिंग के जरिए योजनाओं और फैसलों का आक्रामक प्रचार करती है, तब कांग्रेस के भीतर ही यह तय नहीं हो पाता कि पार्टी की आधिकारिक लाइन क्या होगी। कोई नेता किसान मुद्दे पर बोलता है, कोई आरक्षण पर, कोई भ्रष्टाचार पर, तो कोई अपनी व्यक्तिगत राजनीति चमकाने में जुटा रहता है। परिणाम यह होता है कि कांग्रेस का हमला बिखरा हुआ नजर आता है और भाजपा को एक मजबूत नैरेटिव मिल जाता है कि विपक्ष खुद ही असंगठित है।

अब सवाल उठता है कि आखिर यह स्थिति क्यों बनी हुई है? इसका जवाब कांग्रेस के उन बड़े चेहरों में छिपा है जिनकी मौजूदगी पार्टी की ताकत भी है और कमजोरी भी। दिग्विजय सिंह, कमलनाथ, अजय सिंह ‘राहुल भैया’, अरुण यादव और उमंग सिंघार—इन सभी नेताओं का अपना प्रभाव क्षेत्र है, अपनी राजनीतिक शैली है और अपने समर्थकों का मजबूत नेटवर्क है। जीतू पटवारी की सबसे बड़ी चुनौती भाजपा नहीं बल्कि इन्हीं शक्ति केंद्रों के बीच संतुलन बनाना है। अखिलीक्स के राजनीतिक सूत्रों का दावा है कि कई बार पटवारी की रणनीति और आंदोलनों को पार्टी के भीतर से ही कमजोर किया जाता है। जब भी कोई बड़ा आंदोलन या राज्यव्यापी अभियान शुरू होता है, तब किसी न किसी वरिष्ठ नेता की अनुपस्थिति पूरे संदेश को कमजोर कर देती है। सार्वजनिक रूप से सब एकजुट दिखाई देते हैं, लेकिन बंद कमरों में नेतृत्व को लेकर अविश्वास साफ महसूस किया जा सकता है।

असल में कांग्रेस के भीतर यह लड़ाई सिर्फ संगठनात्मक नहीं, बल्कि भविष्य की सत्ता की लड़ाई है। 2028 अभी दूर है, लेकिन मुख्यमंत्री पद की दावेदारी की राजनीति अभी से शुरू हो चुकी है। हर बड़ा नेता अपने समर्थकों को सक्रिय रख रहा है, अपने क्षेत्रीय प्रभाव को बचाए रखना चाहता है और यह संदेश देना चाहता है कि कांग्रेस अगर सत्ता में लौटती है तो असली शक्ति केंद्र वही होगा। यही कारण है कि जीतू पटवारी के लिए एक “निष्पक्ष अध्यक्ष” बने रहना भी मुश्किल होता जा रहा है। अगर वे किसी एक गुट को ज्यादा महत्व देते हैं तो दूसरा गुट असहज हो जाता है, और अगर वे संतुलन बनाने की कोशिश करते हैं तो उनकी अपनी राजनीतिक पकड़ कमजोर पड़ती दिखाई देती है।

राज्यसभा की आने वाली सीट इस पूरी लड़ाई का सबसे बड़ा टेस्ट मानी जा रही है। यह सिर्फ एक सांसद चुनने का मामला नहीं है, बल्कि यह तय करेगा कि कांग्रेस के भीतर वास्तविक शक्ति किसके पास है। क्या हाईकमान किसी युवा चेहरे को मौका देगा या फिर पुराने दिग्गजों का दबाव भारी पड़ेगा? क्या जीतू पटवारी किसी सर्वसम्मत नाम पर सहमति बना पाएंगे या यह चुनाव भी गुटबाजी का नया अखाड़ा बन जाएगा? कांग्रेस के भीतर चल रही खींचतान को देखते हुए यह सीट पार्टी नेतृत्व की साख से जुड़ी हुई दिखाई देती है। अगर यहां भी विवाद और नाराजगी सामने आती है, तो यह संदेश जाएगा कि कांग्रेस अभी तक अपने भीतर की लड़ाई खत्म नहीं कर पाई है।
इसके साथ-साथ स्थानीय निकाय चुनाव और छोटे उपचुनाव भी कांग्रेस के लिए बेहद महत्वपूर्ण होने वाले हैं। भाजपा इन चुनावों को सिर्फ स्थानीय चुनाव नहीं बल्कि 2028 की तैयारी के रूप में देख रही है। कांग्रेस के लिए यह मौका है कि वह अपने नए संगठन की वास्तविक ताकत साबित करे। लेकिन सवाल वही है—क्या बूथ स्तर का संगठन वास्तव में सक्रिय है या सिर्फ सोशल मीडिया की राजनीति तक सीमित है? कई जिलों में कार्यकर्ताओं की शिकायत है कि पार्टी के भीतर अभी भी पुराने नेताओं के करीबी लोगों को ही प्राथमिकता मिलती है। इससे नए कार्यकर्ताओं में उत्साह के बजाय निराशा पैदा हो रही है।

अखिलीक्स का विश्लेषण साफ कहता है कि कांग्रेस को भाजपा से पहले अपने भीतर की राजनीति से लड़ना होगा। जीतू पटवारी के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह नहीं है कि वे भाजपा के खिलाफ कितने आक्रामक हैं, बल्कि यह है कि क्या वे कांग्रेस के भीतर एक अनुशासित और एकजुट राजनीतिक संस्कृति विकसित कर पाते हैं। उन्हें सिर्फ प्रदेश अध्यक्ष की औपचारिक भूमिका से बाहर निकलकर एक ऐसे “राजनीतिक कमांडर” की भूमिका निभानी होगी जो कठिन फैसले लेने की क्षमता रखता हो। अगर वरिष्ठ नेताओं को यह संदेश नहीं दिया गया कि “सरकार के बिना मुख्यमंत्री का सपना सिर्फ राजनीतिक कल्पना है”, तो कांग्रेस 2028 में भी वही गलती दोहराती नजर आएगी जो 2023 में हुई थी।

मध्य प्रदेश की राजनीति में एक मजबूत विपक्ष की जरूरत हमेशा महसूस की जाती रही है। लोकतंत्र का संतुलन तभी बना रहता है जब सत्ता के सामने एक संगठित और आक्रामक विपक्ष मौजूद हो। लेकिन अगर विपक्ष खुद ही अपनी आंतरिक लड़ाइयों में उलझ जाए, तो जनता का भरोसा कमजोर होने लगता है। आज कांग्रेस उसी मोड़ पर खड़ी दिखाई दे रही है। सवाल सिर्फ जीतू पटवारी का नहीं है, सवाल पूरी पार्टी की राजनीतिक दिशा का है। क्या कांग्रेस अपने भीतर के इस ‘साइलेंट वॉर’ को खत्म कर पाएगी, या फिर जीतू पटवारी भी उन नेताओं की सूची में शामिल हो जाएंगे जो बदलाव का सपना लेकर आए थे लेकिन अंततः सिस्टम का हिस्सा बनकर रह गए? यही वह बड़ा सवाल है जिस पर आने वाले महीनों में मध्य प्रदेश की राजनीति घूमती दिखाई देगी।

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