सक्षम आंगनवाड़ी या सिस्टम की बर्बादी? — ₹69 करोड़ की ‘डिजिटल हकीकत’ का पर्दाफाश
भोपाल.
मध्यप्रदेश में बच्चों के भविष्य को संवारने की जिम्मेदारी जिस विभाग के कंधों पर है, वही विभाग अब सवालों के घेरे में है। ‘सक्षम आंगनवाड़ी’ योजना के तहत डिजिटल और आधुनिक सुविधाओं का सपना दिखाया गया, लेकिन जमीनी सच्चाई कुछ और ही कहानी बयान कर रही है। यह कहानी सिर्फ लापरवाही की नहीं, बल्कि सिस्टम की उस सोच की है जहां योजना का लक्ष्य सेवा नहीं, बल्कि ‘खर्च दिखाना’ बन जाता है।
केंद्र सरकार से करीब ₹200 करोड़ की राशि इस मकसद से मिली थी कि प्रदेश की 24,662 आंगनवाड़ियों को आधुनिक बनाया जाए। योजना के तहत बच्चों को बेहतर सुविधाएं देने के लिए LED टीवी, RO वाटर प्यूरीफायर जैसे उपकरण खरीदने का फैसला लिया गया। कागजों पर यह पहल ‘डिजिटल इंडिया’ की दिशा में एक बड़ा कदम नजर आती है, लेकिन जब इन फैसलों को जमीन पर परखा गया, तो तस्वीर बिल्कुल उलट निकली।
विभाग की अपनी रिपोर्ट ही इस योजना की पोल खोल देती है। रिपोर्ट के मुताबिक प्रदेश में 3,740 आंगनवाड़ी केंद्र ऐसे हैं जहां बिजली की कोई व्यवस्था ही नहीं है। यानी न बिजली का कनेक्शन, न वायरिंग, न स्विच बोर्ड—कुछ भी नहीं। इसके बावजूद इन्हीं केंद्रों में 43 इंच के LED टीवी इंस्टॉल कर दिए गए। सवाल उठता है कि जब बिजली ही नहीं है, तो ये टीवी चलेंगे कैसे?
इतना ही नहीं, कई जगहों पर ₹20,000 तक की लागत वाले RO वाटर प्यूरीफायर भी लगा दिए गए, जबकि वहां साफ पानी की मूलभूत व्यवस्था तक नहीं है। यानी जहां पानी नहीं, वहां RO… और जहां बिजली नहीं, वहां टीवी। यह सिर्फ एक तकनीकी चूक नहीं, बल्कि योजना के क्रियान्वयन में गंभीर खामी का संकेत है।
भोपाल और इंदौर संभाग की स्थिति इस पूरे मामले को और गंभीर बना देती है। इन दोनों संभागों में ही 1,030 आंगनवाड़ी केंद्र ऐसे पाए गए जहां बिजली नहीं है, लेकिन वहां भी उपकरणों की इंस्टॉलेशन दिखा दी गई। यानी कागजों में ‘काम पूरा’, लेकिन हकीकत में ‘सुविधा शून्य’।
पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल ₹69 करोड़ के उस खर्च पर उठ रहा है, जिसमें बिना बुनियादी ढांचे की जांच किए उपकरणों की खरीद और इंस्टॉलेशन कर दी गई। नियम स्पष्ट कहते हैं कि पहले आधारभूत सुविधाएं सुनिश्चित की जाएं, उसके बाद ही डिजिटल उपकरण लगाए जाएं। लेकिन यहां प्रक्रिया उल्टी चली—पहले खरीद, फिर इंस्टॉलेशन, और बाद में सवाल।
यही नहीं, इस योजना में टेंडर प्रक्रिया को लेकर भी गंभीर आरोप सामने आए हैं। आरोप है कि टेंडर की शर्तें इस तरह से बनाई गईं कि प्रदेश की छोटी कंपनियां अपने आप बाहर हो जाएं और सिर्फ 2–3 बड़ी कंपनियों को फायदा मिले। इसे ‘कार्टेलाइजेशन’ का नाम दिया जा रहा है, जहां प्रतिस्पर्धा को खत्म कर एक तय समूह को काम सौंपने की कोशिश की गई।
भुगतान प्रक्रिया में भी अनियमितताओं के आरोप सामने आए हैं। नियम के मुताबिक, जब तक इंस्टॉलेशन का वेरिफिकेशन नहीं हो जाता, तब तक भुगतान नहीं किया जा सकता। लेकिन सीहोर और रायसेन जैसे जिलों में स्थिति यह है कि सामान आज भी गोदामों में बंद है, जबकि कंपनियों को भुगतान पहले ही किया जा चुका है। यह सवाल उठता है कि आखिर किस दबाव में बिना काम की पुष्टि के करोड़ों रुपये रिलीज कर दिए गए?
जब यह मामला तूल पकड़ने लगा, तो विभाग की मंत्री निर्मला भूरिया ने सफाई दी कि बजट लैप्स होने से बचाने के लिए प्रक्रिया में तेजी लाई गई। लेकिन यह तर्क अपने आप में कई सवाल खड़े करता है—क्या बजट बचाने के नाम पर बिना उपयोग की वस्तुएं खरीदना और उन्हें अनुपयोगी स्थानों पर लगाना सही ठहराया जा सकता है?
मामला अब राज्य के उच्च स्तर तक पहुंच चुका है। मुख्य सचिव को शिकायत दी गई है और जांच के आदेश भी जारी कर दिए गए हैं। लेकिन सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या यह जांच निष्पक्ष होगी? क्या वही अधिकारी, जिन्होंने इन फाइलों पर हस्ताक्षर किए, अब खुद ही जांच का हिस्सा बनेंगे?
इस पूरे प्रकरण ने ‘सक्षम आंगनवाड़ी’ जैसे महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े कर दिए हैं। जिन बच्चों के लिए यह योजना बनाई गई थी, क्या उन्हें पता भी है कि उनके केंद्र में लगाया गया टीवी कभी चालू होगा या नहीं? क्या उन्हें वह साफ पानी मिलेगा, जिसके लिए RO लगाया गया है?
यह मामला सिर्फ एक विभागीय गड़बड़ी नहीं है, बल्कि उस मानसिकता का आईना है जहां योजनाएं ‘जनसेवा’ के बजाय ‘टारगेट पूरा करने’ और ‘फंड खर्च करने’ का माध्यम बन जाती हैं। डिजिटल इंडिया का सपना तब तक अधूरा रहेगा, जब तक जमीनी सच्चाई को नजरअंदाज कर सिर्फ आंकड़ों का खेल खेला जाता रहेगा।
अखिलीक्स इस पूरे मामले की हर परत को सामने लाता रहेगा। सवाल वही रहेगा—क्या इस मामले में जिम्मेदारी तय होगी? क्या उन लोगों के नाम सामने आएंगे जिन्होंने बच्चों के हक के साथ यह खिलवाड़ किया?
आप क्या सोचते हैं? क्या इस मामले में बड़े स्तर पर कार्रवाई होगी या यह भी फाइलों में दबकर रह जाएगा?



