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निगम-मंडल की नियुक्तियां टलीं या आपसी जंग में फंसीं?

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भोपाल के सियासी गलियारों में इन दिनों एक ही चर्चा है—निगम-मंडलों की नियुक्तियां आखिर टली क्यों? महीनों से इंतजार कर रहे कार्यकर्ताओं की उम्मीदों पर फिलहाल ब्रेक लग गया है और आधिकारिक तौर पर जो वजह सामने आई है, वो है आने वाले पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव। लेकिन क्या वाकई यह सिर्फ एक रणनीतिक फैसला है, या फिर इसके पीछे सत्ता और संगठन के भीतर चल रही खामोश जंग का बड़ा खेल छिपा है?
प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल ने इस पूरे मुद्दे को बेहद सहज तरीके से “छोटा विषय” बताया। उनका कहना है कि निगम-मंडलों में केवल 50 से 60 लोगों को ही जगह मिलती है, जबकि पार्टी का असली फोकस एल्डरमैन और जनभागीदारी समितियों जैसे बड़े प्लेटफॉर्म पर है, जहां हजारों कार्यकर्ताओं को अवसर दिया जा सकता है। पहली नजर में यह बयान कार्यकर्ता-केंद्रित और संतुलित लगता है, लेकिन राजनीति की परतें हमेशा सतह से कहीं ज्यादा गहरी होती हैं।
दरअसल, अंदर की तस्वीर कुछ और ही कहानी कह रही है। पार्टी के भीतर इन दिनों जिस तरह का अंतर्कलह सामने आ रहा है, उसने संगठन की निर्णय प्रक्रिया को लगभग जाम कर दिया है। हालात यह हैं कि सरकार, संगठन और संघ के बीच लगातार बैठकें हो रही हैं, लंबा मंथन चल रहा है, लेकिन नतीजा लगभग शून्य है। 17 प्रकोष्ठों की सूची तैयार होनी थी, लेकिन सिर्फ 3 नामों पर सहमति बन पाई। बाकी 14 पर नेताओं के बीच सहमति नहीं बन सकी।
इस असहमति की जड़ में है ‘वर्चस्व की राजनीति’। पार्टी के बड़े नेता अपने-अपने समर्थकों को संगठन में स्थापित करना चाहते हैं, ताकि अंदरूनी ताकत बनी रहे। हर नेता चाहता है कि संगठन के भीतर उसके भरोसेमंद लोग मौजूद हों, जो उसे लगातार अपडेट देते रहें और उसकी राजनीतिक पकड़ मजबूत बनी रहे। यही वजह है कि नियुक्तियों की सूची बार-बार अटक रही है। इसे सीधे शब्दों में कहें तो संगठन के भीतर ‘साइलेंट पावर स्ट्रगल’ चल रहा है।
इस पूरी स्थिति में सबसे बड़ी चुनौती प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल के सामने खड़ी हो गई है। उनकी कार्यशैली सौम्य और समन्वयवादी मानी जाती है, लेकिन जब राजनीति में अहंकार टकराते हैं, तो संतुलन बनाना आसान नहीं होता। सामूहिक बैठकों में जब समाधान नहीं निकला, तो अब उन्होंने रणनीति बदल दी है। पिछले कुछ दिनों से वे वन-टू-वन बैठकों के जरिए नेताओं को साधने की कोशिश कर रहे हैं। मंत्रियों और वरिष्ठ नेताओं से अलग-अलग मुलाकात कर उन्हें मनाने का प्रयास जारी है।
सूत्रों के मुताबिक, यह ‘पर्सनल एंगेजमेंट’ वाली रणनीति धीरे-धीरे असर दिखा रही है और कुछ मुद्दों पर सहमति बनने के संकेत मिल रहे हैं। हालांकि, अभी भी तस्वीर पूरी तरह साफ नहीं है। संगठन के भीतर खींचतान जारी है और अंतिम सूची कब आएगी, इस पर कोई स्पष्ट टाइमलाइन सामने नहीं है।
इस पूरे घटनाक्रम से एक बात साफ होती है कि निगम-मंडल की नियुक्तियां सिर्फ प्रशासनिक या चुनावी रणनीति का मामला नहीं हैं, बल्कि यह भाजपा के अंदर चल रहे शक्ति संतुलन की लड़ाई का प्रतिबिंब बन चुकी हैं। एक तरफ कार्यकर्ता उम्मीद लगाए बैठे हैं, तो दूसरी तरफ नेता अपने-अपने समीकरण साधने में जुटे हैं।
अब सवाल यही है कि क्या हेमंत खंडेलवाल का ‘मनावन मिशन’ इस गतिरोध को खत्म कर पाएगा? क्या संगठन अपनी अंदरूनी खींचतान से बाहर निकलकर एकजुटता दिखा पाएगा? या फिर नियुक्तियों का यह इंतजार और लंबा खिंचेगा?
मध्य प्रदेश की राजनीति में यह सिर्फ एक नियुक्ति का मामला नहीं, बल्कि आने वाले समय की सत्ता संरचना का संकेत है। और इस संकेत को समझना ही असली राजनीति है।
Akhileaks — जहां खबर नहीं, खबर के पीछे की सच्चाई दिखाई जाती है।

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