दतिया का सियासी भूकंप: 3 साल की सजा, मिनटों में गई विधायकी—क्या ये कानून का खेल है या राजनीति का पलटवार?
मध्य प्रदेश की राजनीति में दतिया एक बार फिर सुर्खियों में है, लेकिन इस बार वजह चुनावी जीत नहीं बल्कि कानूनी हार है। 2023 के विधानसभा चुनाव में जहां कांग्रेस के राजेंद्र भारती ने बीजेपी के दिग्गज नेता नरोत्तम मिश्रा को चौंकाते हुए हराया था, वहीं अब वही राजेंद्र भारती अपनी विधायकी गंवा चुके हैं। दिल्ली की राऊज एवेन्यू कोर्ट से जैसे ही सजा का ऐलान हुआ, कुछ ही घंटों के भीतर भोपाल से उनकी सदस्यता रद्द करने का आदेश जारी हो गया। इस पूरी प्रक्रिया की तेजी ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं—क्या यह सिर्फ एक कानूनी कार्रवाई थी या फिर राजनीतिक प्रतिक्रिया भी इसमें शामिल है?
अगर इस पूरे मामले की जड़ में जाएं, तो कहानी आज की नहीं बल्कि 1998 से 2011 के बीच की है, जब ‘जिला सहकारी कृषि और ग्रामीण विकास बैंक’ में कथित हेराफेरी का मामला सामने आया था। इसी केस में अदालत ने राजेंद्र भारती को IPC की धारा 420, 467, 468 और 471 के तहत दोषी करार दिया और 3 साल की सजा के साथ 1 लाख रुपये का जुर्माना लगाया। यहीं से उनके राजनीतिक करियर पर संकट की शुरुआत हो गई, क्योंकि 2 साल से अधिक की सजा सीधे लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम (RPA) की धारा 8 को सक्रिय कर देती है, जिसके तहत जनप्रतिनिधि की सदस्यता तुरंत समाप्त हो जाती है।
अब सवाल यह उठता है कि जब राजेंद्र भारती को जमानत मिल गई है, तो उनकी विधायकी क्यों गई? इसका जवाब कानून की उस बारीक लाइन में छिपा है, जिसे अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है। जमानत का मतलब है कि व्यक्ति जेल से बाहर रह सकता है, लेकिन इसका यह अर्थ नहीं कि उसकी दोषसिद्धि खत्म हो गई है। जब तक उच्च न्यायालय ‘दोषसिद्धि पर रोक’ यानी Stay on Conviction नहीं देता, तब तक अयोग्यता बरकरार रहती है। यही वजह है कि भारती को राहत मिलने के बावजूद उनकी कुर्सी चली गई।
इतिहास गवाह है कि ऐसे मामलों में अदालतें बहुत सोच-समझकर ही स्टे देती हैं। आजम खान से लेकर लालू प्रसाद यादव और अब्दुल्ला आजम तक—कई बड़े नेताओं को सजा के बाद अपनी राजनीतिक जमीन गंवानी पड़ी, क्योंकि उन्हें दोषसिद्धि पर रोक नहीं मिल सकी। जयललिता जैसी बड़ी नेता को भी इसी कारण मुख्यमंत्री पद छोड़ना पड़ा था। अपवाद के तौर पर राहुल गांधी का मामला जरूर सामने आता है, जहां मानहानि केस में सुप्रीम कोर्ट ने सजा पर सवाल उठाते हुए राहत दी थी, लेकिन धोखाधड़ी जैसे गंभीर मामलों में राहत मिलना कहीं ज्यादा मुश्किल होता है।
दतिया की बात करें तो अब यह सीट खाली हो चुकी है और उपचुनाव की आहट साफ सुनाई दे रही है। बीजेपी के लिए यह मौका है अपनी खोई हुई प्रतिष्ठा वापस पाने का, खासकर तब जब नरोत्तम मिश्रा जैसे अनुभवी नेता फिर से मैदान में उतर सकते हैं। वहीं कांग्रेस के सामने चुनौती है कि वह इस सीट को बचा पाए और राजेंद्र भारती के लिए कानूनी राहत हासिल कर सके। विवेक तन्खा और कपिल सिब्बल जैसे वरिष्ठ वकीलों की भूमिका अब निर्णायक हो सकती है, क्योंकि पूरा दारोमदार दिल्ली हाई कोर्ट से मिलने वाली संभावित ‘स्टे’ पर टिका है।
लेकिन अगर आने वाले दिनों में हाई कोर्ट से दोषसिद्धि पर रोक नहीं मिलती, तो चुनाव आयोग उपचुनाव की घोषणा कर सकता है और एक बार चुनावी प्रक्रिया शुरू हो गई, तो मामला और जटिल हो जाएगा। ऐसे में राजेंद्र भारती के लिए राजनीतिक वापसी का रास्ता बेहद संकरा नजर आ रहा है।
कुल मिलाकर दतिया की यह कहानी सिर्फ एक विधायक की अयोग्यता की नहीं है, बल्कि यह उस सिस्टम की भी कहानी है जहां कानून और राजनीति अक्सर एक-दूसरे के समानांतर चलते हैं, लेकिन कई बार एक-दूसरे को प्रभावित भी करते हैं। अब सबकी नजर दिल्ली हाई कोर्ट की अगली सुनवाई पर है, जो यह तय करेगी कि यह कहानी यहीं खत्म होगी या इसमें कोई नया मोड़ आएगा।



