Exclusive

178 करोड़ का ‘शराब सिंडिकेट’: आम आदमी पर सख्ती, माफिया पर मेहरबानी—क्या सिस्टम खुद ‘नशे’ में है?

मध्य प्रदेश में राजस्व वसूली की कहानी अब सिर्फ आंकड़ों का खेल नहीं रह गई है, बल्कि यह उस सिस्टम की परतें खोल रही है जहां नियम आम आदमी के लिए सख्त हैं, लेकिन बड़े खिलाड़ियों के लिए ‘लचीले’। 178 करोड़ 54 लाख रुपये—यह कोई छोटा आंकड़ा नहीं है, बल्कि यह वह रकम है जो आबकारी विभाग को ठेकेदारों से वसूलनी थी, लेकिन तय समय सीमा 31 मार्च बीत जाने के बाद भी यह पैसा सरकारी खजाने तक नहीं पहुंच सका। सवाल सीधा है—क्या यह महज प्रशासनिक लापरवाही है या फिर इसके पीछे कोई बड़ा खेल चल रहा है?

इस पूरे मामले में सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि कुल बकाया राशि का लगभग 35% हिस्सा अकेले एक बड़े समूह—सोम डिस्टिलरी—पर है, जिस पर करीब 60 करोड़ रुपये का बकाया बताया जा रहा है। यानी पूरे प्रदेश के राजस्व संकट का बड़ा हिस्सा सिर्फ एक नाम से जुड़ा हुआ है। ऐसे में यह सवाल उठना लाजिमी है कि आखिर इस समूह पर इतनी ‘नरमी’ क्यों दिखाई जा रही है? क्या यह वही पैटर्न नहीं है जहां छोटे ठेकेदारों पर विभाग तुरंत कार्रवाई करता है, लेकिन बड़े नामों के सामने फाइलें ठहर जाती हैं?

अगर जिलों के हिसाब से देखें तो तस्वीर और भी गंभीर नजर आती है। भोपाल में करीब 60 करोड़, सागर में 35 करोड़ और मुरैना में 23 करोड़ रुपये का बकाया सामने आया है। यानी सिर्फ तीन जिले मिलकर आधे से ज्यादा बकाया दबाए बैठे हैं। भोपाल में ही तीन बड़े समूह ऐसे हैं जिनके पास सैकड़ों करोड़ रुपये के ठेके हैं, लेकिन जब सरकार को उसका हिस्सा देने की बात आती है, तो वही समूह भुगतान में पीछे रह जाते हैं। यह विरोधाभास सिर्फ संयोग नहीं हो सकता।

सबसे बड़ा सवाल आबकारी विभाग की कार्यप्रणाली पर उठता है। जब किसी छोटे दुकानदार की एक किस्त बाउंस होती है, तो दुकान सील करने में देर नहीं लगती, लेकिन जब मामला करोड़ों का हो, तो विभाग ‘नोटिस’ जारी करने तक सीमित क्यों रह जाता है? क्या वसूली की प्रक्रिया जानबूझकर धीमी रखी जा रही है? और अगर हां, तो किसके दबाव में?

अधिकारियों के दावों पर भी अब सवाल उठने लगे हैं। विभाग का कहना है कि वसूली की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है, लेकिन यह प्रक्रिया 31 मार्च की डेडलाइन से पहले क्यों शुरू नहीं हुई? क्या ठेकेदारों को समय दिया गया कि वे अपना स्टॉक खपा लें या कानूनी रास्ते तलाश लें? और क्या वरिष्ठ स्तर पर इस पूरे मामले की निगरानी नहीं हो रही थी, या फिर निगरानी होते हुए भी कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई?

यह मामला सिर्फ राजस्व का नहीं है, बल्कि प्राथमिकताओं का भी है। 178 करोड़ रुपये से राज्य की कई जनकल्याण योजनाओं को मजबूती मिल सकती थी—लाड़ली बहना योजना की कई किश्तें दी जा सकती थीं, सरकारी स्कूलों की हालत सुधारी जा सकती थी, और बुनियादी ढांचे पर खर्च किया जा सकता था। लेकिन जब यह पैसा सिस्टम में ही अटका रह जाए, तो सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर सरकार के लिए ज्यादा अहम क्या है—जनता का हित या बड़े खिलाड़ियों की ‘सुविधा’?

अब नजर 15 अप्रैल की उस संभावित समय सीमा पर है, जिसके भीतर अगर यह बकाया वसूली नहीं होती, तो सरकार को कठोर कदम उठाने पड़ सकते हैं। क्या डिफॉल्टर ठेकेदारों को अगली टेंडर प्रक्रिया से बाहर किया जाएगा? क्या जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई होगी? और क्या लोकायुक्त या आर्थिक अपराध शाखा (EOW) इस पूरे मामले की जांच करेगी कि आखिर इतने बड़े स्तर पर डिफॉल्ट की स्थिति बनने दी कैसे गई?

अंततः यह पूरा मामला एक बड़े सिस्टम फेलियर की ओर इशारा करता है, जहां नियम तो मौजूद हैं, लेकिन उनका अनुपालन चयनात्मक तरीके से किया जा रहा है। अब देखना यह है कि क्या यह मुद्दा सिर्फ फाइलों में दबकर रह जाएगा या फिर कोई ठोस कार्रवाई इस ‘नशे’ को उतार पाएगी।

‘Akhileaks’ इस पूरे मामले पर लगातार नजर बनाए हुए है, क्योंकि यह सिर्फ एक खबर नहीं, बल्कि जनता के हक की लड़ाई है—और इस लड़ाई में हर सवाल का जवाब जरूरी है।

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button