मध्य प्रदेश की पॉलिटिकल कहानी: अध्याय 3
जब एक ‘चाणक्य’ अपनी ही बिसात पर मात खा गया
मध्य प्रदेश की राजनीति के इतिहास में कई ऐसे किरदार रहे हैं जिनकी रणनीति, बुद्धिमत्ता और राजनीतिक कौशल ने पूरे देश की राजनीति को प्रभावित किया। इन्हीं में से एक नाम था पंडित द्वारिका प्रसाद मिश्र का। उन्हें उस दौर में राजनीति का ‘चाणक्य’ कहा जाता था। लेकिन विडंबना देखिए, वही नेता अंततः अपनी ही बिसात पर मात खा गया।
यह कहानी केवल एक मुख्यमंत्री के उत्थान और पतन की नहीं है, बल्कि यह उस दौर की कहानी है जब मध्य प्रदेश की सियासत में अहंकार, महत्वाकांक्षा और राजनीतिक प्रतिशोध ने मिलकर सत्ता का पूरा समीकरण बदल दिया।
बौद्धिकता और रणनीति के प्रतीक थे डीपी मिश्र
पंडित द्वारिका प्रसाद मिश्र कोई साधारण राजनेता नहीं थे। वे उन चुनिंदा नेताओं में शामिल थे जिनकी राजनीतिक समझ और वैचारिक गहराई के सामने दिल्ली का सत्ता गलियारा भी प्रभावित होता था।
1963 में जब मध्य प्रदेश की सत्ता उनके हाथों में आई, तब उन्हें एक दूरदर्शी रणनीतिकार के रूप में देखा जाता था। राजनीति के जानकार उन्हें ‘चाणक्य’ कहते थे, क्योंकि वे शतरंज की तरह राजनीति की चालें चलते थे और कई बार परिणाम पहले ही भांप लेते थे।
दिलचस्प बात यह भी है कि एक समय कांग्रेस ने उन्हें टिकट देने से इनकार कर दिया था। लेकिन बाद के वर्षों में वही कांग्रेस पार्टी उनके राजनीतिक प्रबंधन और रणनीतिक कौशल की कायल हो गई।
नेहरू से टकराने वाला राष्ट्रवादी नेता
डीपी मिश्र की राजनीति केवल सत्ता तक सीमित नहीं थी। उनके भीतर एक मजबूत राष्ट्रवादी दृष्टिकोण भी था।
पंडित जवाहरलाल नेहरू के दौर में जब पूरे देश में उनकी लोकप्रियता चरम पर थी, तब डीपी मिश्र उन गिने-चुने नेताओं में थे जिन्होंने नेहरू की विदेश नीति पर खुलकर सवाल उठाए। खासकर चीन और तिब्बत के मुद्दे पर उन्होंने नेहरू की नीति को ‘अत्यधिक नरम’ बताया था।
मिश्र का मानना था कि चीन के प्रति यह नरम रुख भारत को भविष्य में भारी नुकसान पहुंचा सकता है। इतिहास गवाह है कि 1962 के भारत-चीन युद्ध के बाद उनकी यह आशंका काफी हद तक सही साबित हुई।
इन वैचारिक मतभेदों के कारण उन्होंने एक समय कांग्रेस से इस्तीफा भी दे दिया था।
जनसंघ का प्रस्ताव और मिश्र का इनकार
उस दौर में उनकी राष्ट्रवादी छवि इतनी प्रभावशाली थी कि जनसंघ के बड़े नेता भी उन्हें अपने साथ जोड़ना चाहते थे।
बताया जाता है कि श्यामा प्रसाद मुखर्जी और पंडित दीनदयाल उपाध्याय जैसे नेताओं ने उन्हें जनसंघ का नेतृत्व संभालने का प्रस्ताव दिया था। लेकिन डीपी मिश्र ने यह प्रस्ताव ठुकरा दिया।
उनका मानना था कि जनसंघ उस समय व्यापारिक वर्ग की पार्टी के रूप में उभर रही है और उससे देश की व्यापक राजनीति को वह दिशा नहीं मिल पाएगी जिसकी जरूरत है।
इंदिरा गांधी के राजनीतिक सलाहकार
नेहरू युग के बाद जब इंदिरा गांधी राष्ट्रीय राजनीति में उभरीं, तब उन्हें ऐसे नेताओं की जरूरत थी जो राजनीति की बारीकियों को समझते हों और रणनीतिक सलाह दे सकें।
इसी दौर में डीपी मिश्र इंदिरा गांधी के भरोसेमंद सलाहकार बनकर उभरे। कहा जाता है कि इंदिरा गांधी उन्हें अपने राजनीतिक ‘थिंक-टैंक’ के रूप में देखती थीं।
1962 के युद्ध के बाद जब इंदिरा गांधी केंद्रीय नागरिक परिषद की अध्यक्ष बनीं, तब उन्होंने मिश्र को जनसंपर्क समिति का प्रमुख बनाया।
राष्ट्रवाद से जुड़ी एक दिलचस्प पहल
डीपी मिश्र के राष्ट्रवादी दृष्टिकोण की एक दिलचस्प मिसाल भी सामने आती है।
आज सिनेमाघरों में फिल्म शुरू होने से पहले जो राष्ट्रगान बजाया जाता है, उसके पीछे भी मिश्र की सोच को प्रेरणा माना जाता है। उनका मानना था कि देश में राष्ट्रभावना को मजबूत करने के लिए सार्वजनिक स्थानों पर राष्ट्रीय प्रतीकों के प्रति सम्मान की भावना विकसित की जानी चाहिए।
पचमढ़ी सम्मेलन और राजनीतिक विस्फोट
लेकिन राजनीति में हर रणनीतिकार कभी न कभी चूक करता है। डीपी मिश्र के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ।
उनके राजनीतिक पतन की शुरुआत पचमढ़ी में हुए एक सम्मेलन से मानी जाती है। इस सम्मेलन का आयोजन उस समय के युवा कांग्रेस नेता अर्जुन सिंह ने किया था। मंच पर डीपी मिश्र मौजूद थे और सामने बैठी थीं ग्वालियर की राजमाता विजयराजे सिंधिया।
अपने भाषण के दौरान मिश्र ने लोकतंत्र की बात करते हुए राजा-रजवाड़ों और सामंती व्यवस्था पर तीखा हमला कर दिया। उन्होंने सामंतों को जनता का शोषक तक कह दिया।
राजमाता विजयराजे सिंधिया के लिए यह केवल एक राजनीतिक टिप्पणी नहीं थी, बल्कि उनके आत्मसम्मान पर चोट थी। उस क्षण से उन्होंने तय कर लिया कि कांग्रेस में उनका भविष्य अब नहीं है।
राजमाता का राजनीतिक प्रतिशोध
पचमढ़ी की घटना के बाद राजमाता विजयराजे सिंधिया ने कांग्रेस छोड़ दी और जनसंघ का दामन थाम लिया।
लेकिन यह केवल दल बदलने की घटना नहीं थी। इसके पीछे एक गहरा राजनीतिक प्रतिशोध भी था। राजमाता ने तय कर लिया था कि डीपी मिश्र की सरकार को गिराकर ही दम लेंगी।
मंत्रिमंडल की दरार बनी सरकार गिरने की वजह
इसी बीच कांग्रेस के भीतर भी असंतोष बढ़ने लगा था।
डीपी मिश्र के मंत्रिमंडल में गोविंद नारायण सिंह एक मजबूत नेता माने जाते थे। लेकिन मिश्र ने उन्हें अपेक्षित महत्व नहीं दिया। इसके उलट वे युवा नेता अर्जुन सिंह को ज्यादा तवज्जो देने लगे।
यह स्थिति धीरे-धीरे एक बड़े ‘ईगो क्लैश’ में बदल गई।
राजमाता ने इसी असंतोष का फायदा उठाया और गोविंद नारायण सिंह को अपने राजनीतिक समीकरण में शामिल कर लिया।
1967: जब सत्ता की बाजी पलट गई
1967 के विधानसभा सत्र के दौरान मध्य प्रदेश की राजनीति में एक ऐतिहासिक मोड़ आया।
सदन के भीतर ही गोविंद नारायण सिंह ने कांग्रेस से बगावत कर दी। उनके साथ कांग्रेस के 36 विधायक भी टूटकर विपक्ष के साथ चले गए।
इस घटना ने डीपी मिश्र की सरकार की नींव हिला दी और आखिरकार उनकी सरकार गिर गई।
पहली गैर-कांग्रेसी सरकार की शुरुआत
डीपी मिश्र की सरकार गिरने के बाद मध्य प्रदेश में पहली बार गैर-कांग्रेसी सरकार बनने का रास्ता साफ हुआ।
राजमाता विजयराजे सिंधिया के समर्थन से गोविंद नारायण सिंह मुख्यमंत्री बने। यह घटना केवल एक सरकार का पतन नहीं थी, बल्कि राज्य की राजनीति में एक नए दौर की शुरुआत थी।
राजनीति का बड़ा सबक
डीपी मिश्र की कहानी हमें एक बड़ा राजनीतिक सबक देती है।
राजनीति में केवल रणनीति और बुद्धिमत्ता ही पर्याप्त नहीं होती। संवादहीनता, अहंकार और अपने सहयोगियों की महत्वाकांक्षा को न समझ पाने की गलती कई बार सबसे बड़े नेताओं को भी सत्ता से बाहर कर देती है।
मध्य प्रदेश की राजनीति में डीपी मिश्र का अध्याय इसी सच का उदाहरण है कि कभी-कभी सबसे अनुभवी ‘चाणक्य’ भी अपनी ही बिसात पर मात खा जाते हैं।



