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MP पॉलिटिक्स: दिल्ली का ‘पावर गेम’ और ‘अखिलीक्स’ की इनसाइड स्टोरी

​नई दिल्ली/भोपाल: राजनीति में कभी भी कुछ भी ‘अचानक’ नहीं होता, खासकर जब कमान अमित शाह के हाथों में हो। शनिवार को दिल्ली के लुटियंस जोन में जो कुछ हुआ, उसने भोपाल के श्यामला हिल्स से लेकर वल्लभ भवन तक के गलियारों में एक अजीब सी बेचैनी पैदा कर दी है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव और प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल का दिल्ली पहुंचना तो प्रोटोकॉल लग सकता है, लेकिन उनके पीछे-पीछे मध्य प्रदेश के दो सबसे कद्दावर मंत्रियों—कैलाश विजयवर्गीय और प्रहलाद पटेल—का अलग-अलग अमित शाह के दरबार में हाजिर होना, किसी सामान्य मुलाकात का हिस्सा नहीं है। यह मध्य प्रदेश की ‘Power Structure’ में आने वाले एक बड़े सियासी भूकंप की पूर्व-आहट है। आज ‘अखिलीक्स’ पर हम इसी की परतें खोलेंगे कि आखिर बंद कमरों में क्या खिचड़ी पकी है।

​बदल गया युग: अब भोपाल नहीं, दिल्ली में तय होती है ‘किस्मत’
​यहाँ एक बहुत बड़ा वैचारिक और रणनीतिक बदलाव समझने की जरूरत है। याद कीजिए शिवराज सिंह चौहान और वीडी शर्मा का दौर, जब संगठन की नियुक्तियों और सूचियों का फैसला अक्सर भोपाल में ही तय होता था। रायशुमारी भोपाल में होती थी, नाम भोपाल में तय होते थे और दिल्ली केवल उस पर ‘फाइनल मुहर’ लगाने का काम करती थी। लेकिन अब नजारा पूरी तरह उलट चुका है। आज मुख्यमंत्री मोहन यादव खुद प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल को अपने साथ लेकर दिल्ली पहुंच रहे हैं और बैठकों का दौर वहां चल रहा है।

​यह बदलाव साफ तौर पर दिखाता है कि मोहन यादव न केवल सत्ता, बल्कि संगठन पर भी अपना पूर्ण ‘डोमिनेंस’ (Dominate) स्थापित कर चुके हैं। वे यह स्पष्ट संदेश दे रहे हैं कि अब मध्य प्रदेश का ‘पावर सेंटर’ सिर्फ एक है और वह सीधे दिल्ली से कनेक्टेड है। संगठन और सरकार के बीच की लकीर को धुंधला कर, उन्होंने अपनी पकड़ को इतना मजबूत कर लिया है कि अब हर छोटे-बड़े फैसले की पटकथा दिल्ली में उनकी मौजूदगी में लिखी जा रही है।

​11 मार्च की डेडलाइन और ‘शिव प्रकाश’ फैक्टर का रहस्य
​इस पूरी दिल्ली दौड़ के पीछे एक गहरा रणनीतिक गणित छिपा है। मुख्यमंत्री चाहते हैं कि हर हाल में 11 मार्च के पहले प्रदेश के निगम-मंडलों की नियुक्तियां फाइनल हो जाएं। आखिर 11 मार्च ही क्यों? दरअसल, 11 मार्च को राजस्थान में ‘प्रतिनिधि सभा’ की एक अहम बैठक होने वाली है, जिसमें राष्ट्रीय सह-संगठन महामंत्री शिव प्रकाश जी के भविष्य को लेकर बड़ा फैसला हो सकता है। ​जेपी नड्डा के हटने और चिदानंद शर्मा की विदाई के बाद, दिल्ली के शक्ति केंद्र में शिव प्रकाश ही मोहन यादव की आखिरी और सबसे बड़ी ताकत बचे हैं। चर्चाएं गरम हैं कि शिव प्रकाश के कुछ विभागों में ‘हस्तक्षेप’ को लेकर एक ‘फैक्टशीट’ आलाकमान तक पहुंच चुकी है। मोहन यादव बखूबी जानते हैं कि अगर 11 मार्च के बाद समीकरण बदले, तो दिल्ली में उनकी पैरवी करने वाला कोई मजबूत कंधा नहीं बचेगा। इसीलिए, वे चाहते हैं कि उनके करीबियों की नियुक्तियां इस तारीख से पहले ही हो जाएं ताकि उनका दबदबा बरकरार रहे।

​अमित शाह का कड़ा निर्देश: ‘संगठन को साथ लेकर चलें’
​अमित शाह के आवास पर हुई आधे घंटे की मुलाकात में मुख्यमंत्री ने जब नियुक्तियों का विषय रखा, तो गृह मंत्री ने बहुत ही स्पष्ट और कड़े निर्देश दिए। शाह ने साफ कर दिया कि इन नियुक्तियों की बारीकियों और तालमेल को लेकर मुख्यमंत्री को राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन और संगठन के शीर्ष नेतृत्व—बी.एल. संतोष और शिव प्रकाश—के साथ विस्तार से चर्चा करनी चाहिए। शाह का यह इशारा साफ था: “नीतिगत हरी झंडी मेरी है, लेकिन लिस्ट और संगठन का संतुलन इन दिग्गजों के साथ ही तय होगा।” यही कारण था कि शाह से मिलने के तुरंत बाद सीएम और प्रदेश अध्यक्ष सीधे नितिन नवीन और फिर बी.एल. संतोष के पास पहुंचे, जहां घंटों तक नामों पर माथापच्ची हुई।

​विजयवर्गीय और प्रहलाद पटेल: ‘चेक एंड बैलेंस’ की राजनीति
​इस पूरी कहानी में कैलाश विजयवर्गीय और प्रहलाद पटेल का अलग-अलग शाह से मिलना ‘चेक एंड बैलेंस’ की राजनीति की ओर इशारा करता है। विजयवर्गीय को अचानक इंदौर से दिल्ली बुलाना और प्रहलाद पटेल का राजनाथ सिंह के साथ सक्रिय होना बताता है कि दिल्ली अभी भी पुराने दिग्गजों के जरिए सत्ता का संतुलन बनाए रखना चाहती है। जहां विजयवर्गीय का अपना एक स्वतंत्र पावर सेंटर है, वहीं प्रहलाद पटेल की अपने विभागों के लिए ‘ऑटोनॉमी’ की मांग, मोहन यादव के बढ़ते ‘डोमिनेंस’ के बीच एक प्रतिरोध (Resistance) की तरह देखी जा रही है।

​निष्कर्ष: क्या होगा अगले 72 घंटों में?
​इन मुलाकातों का निचोड़ तीन बिंदुओं में समझा जा सकता है:
​संगठन पर सीएम का कब्जा: अब फैसले भोपाल में नहीं, दिल्ली में सीएम की मौजूदगी में हो रहे हैं।
​जल्दबाजी की वजह: शिव प्रकाश के संभावित प्रभार बदलने से पहले मोहन यादव अपनी बिसात बिछाना चाहते हैं।
​शाह की नसीहत: आलाकमान ने संगठन के साथ मिलकर चलने का रास्ता दिखाया है, लेकिन ताकत का केंद्र मोहन यादव को ही बनाए रखा है।

​’अखिलीक्स’ के पाठकों के लिए हमारी सलाह है कि आप अगले 72 घंटों पर कड़ी नजर रखें। भोपाल की सड़कों पर दौड़ने वाली गाड़ियों की नेमप्लेट और उनके झंडे बदलने वाले हैं। नियुक्तियों की पहली सूची किसी भी वक्त धमाका कर सकती है।
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