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भोपाल के 138 अस्पताल आयुष्मान से बाहर: क्या मोदी की फ्लैगशिप स्कीम को चुनौती?

तुगलकी फ़रमान या राजनीतिक साज़िश?

भोपाल से आई यह ख़बर किसी लोकल नोटिस की तरह नहीं है, बल्कि सीधा करोड़ों लोगों की ज़िंदगी से जुड़ा मसला है। 1 अप्रैल 2026 से मध्यप्रदेश में सिर्फ़ वही अस्पताल आयुष्मान नेटवर्क में रहेंगे जिनके पास NABH Final Level सर्टिफ़िकेट होगा। इस आदेश के पीछे हैं डॉ. योगेश भरसट — सीईओ, आयुष्मान भारत निरामया योजना।
नतीजा? भोपाल के 223 अस्पतालों में से 138 सीधे बाहर हो जाएंगे। यह आदेश सिर्फ़ प्रशासनिक क़दम नहीं, बल्कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की फ्लैगशिप योजना को चुनौती जैसा है।

1. आदेश और असर

मध्यप्रदेश में कुल 1624 अस्पताल आयुष्मान नेटवर्क में हैं।

इनमें से सिर्फ़ 295 के पास NABH Final मान्यता है।

यानी 80% अस्पताल बाहर हो सकते हैं।

भोपाल: 223 में से सिर्फ़ 85 मान्यता प्राप्त → 138 बाहर।

यह वही अस्पताल हैं जहाँ गरीब लोग बुखार, डेंगू, टायफाइड, छाती की तकलीफ़ या छोटी सर्जरी कराते हैं। अब वे मजबूर होकर बड़े कॉरपोरेट अस्पतालों का दरवाज़ा खटखटाएँगे।

2. NABH Final Level: नामुमकिन डेडलाइन

इसमें 600+ पैरामीटर की जांच होती है।

ICU, OT, SOPs, वेंटिलेशन, इंफेक्शन कंट्रोल, डॉक्टर-नर्स ट्रेनिंग सब शामिल।

प्रोसेस पूरा करने में 12–24 महीने लगते हैं।

खर्च: 20–40 लाख (100–300 बेड अस्पताल) और बड़े अस्पतालों के लिए 50 लाख+।

लेकिन भरसट ने आदेश में लिखा — 31 मार्च 2026 तक सब NABH Final ले लें।
आज से सिर्फ़ 6–7 महीने। यह तकनीकी रूप से असंभव है।

3. गरीब पर सीधा वार

मध्यप्रदेश में 4 करोड़ 38 लाख आयुष्मान कार्डधारक हैं।

ये कार्ड सबसे ज़्यादा छोटे इलाज में इस्तेमाल होते हैं।

कॉरपोरेट अस्पताल छोटे रोगियों को अक्सर मना करते हैं।

शहर के अंदरूनी छोटे अस्पताल बाहर होंगे, बड़े अस्पताल बाहर की ओर।

नतीजा: ग़रीब को इलाज के लिए किलोमीटरों दूर जाना पड़ेगा।

कैंसर और डायलिसिस जैसे पेशेंट का इलाज बीच में ही टूट सकता है।

4. मोदी बनाम भरसट: सीधा टकराव

मोदी सरकार की गाइडलाइन:

Entry-Level NABH भी मान्य।

उन्हें 10% पैकेज इंसेंटिव तक दिया जाएगा।

भरसट का नियम:

Entry-Level? OUT.

सिर्फ़ NABH Final मान्य।

यानी राज्य का अफसर केंद्र की स्कीम को बदल रहा है।
क्या यह सीधा प्रधानमंत्री की स्कीम को कमजोर करने की साज़िश नहीं?

5. असली खेल: सुधार या राजनीति?

गड़बड़ी करने वाले अस्पतालों को ब्लैकलिस्ट करना चाहिए था।

लेकिन यहाँ सब पर एक ही डंडा चलाया गया।

छोटे–मझोले अस्पताल दिवालिया हो जाएँगे।

सिर्फ़ कॉरपोरेट हॉस्पिटल बचेगा → मोनोपॉली।

स्पष्ट है, यह फैसला मरीज के लिए नहीं, बल्कि राजनीति और शक्ति-खेल के लिए है।

6. मोदी के मिशन को खुला चैलेंज

आयुष्मान भारत को मोदी ने गरीब का सुरक्षा कवच कहा।

अब यही स्कीम “बे-आयुष्मान भारत” बनने की ओर।

कार्ड रहेगा, लेकिन इलाज नहीं मिलेगा।

यह फैसला सीधे-सीधे मोदी की फ्लैगशिप स्कीम को कमजोर करता है।

7. निष्कर्ष: साज़िश का सूत्रधार

भोपाल के 138 अस्पताल बाहर, 4 करोड़ 38 लाख कार्डधारक प्रभावित, और एक अफसर का फ़रमान।
यह कहानी साफ़ कहती है:
यह आदेश सुधार का नहीं, बल्कि साजिश का है।
यह कदम गरीब को इलाज से वंचित करने का है।
यह मोदी सरकार के मिशन को सीधा चैलेंज करता है।

अगर यही रवैया जारी रहा, तो यह फैसला सिर्फ़ अस्पतालों को नहीं, बल्कि बीजेपी सरकार को भी डिस्चार्ज स्लिप थमा देगा।

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