सत्ता का ‘विपरीत राजयोग’: जब विपक्ष बना ढाल और अपनों ने साधी चुप्पी!
राजनीति की बिसात पर मोहरे अक्सर उम्मीद के मुताबिक चाल चलते हैं, लेकिन मध्य प्रदेश की सियासी चौसर पर इन दिनों जो खेल चल रहा है, उसने सियासत के स्थापित व्याकरण को ही उलट कर रख दिया है। कल्पना कीजिए—सत्ताधारी दल के एक मुख्यमंत्री पर जमीन घोटालों के संगीन आरोप लगें, और उनके बचाव में ढाल बनकर उनकी अपनी पार्टी के दिग्गज नहीं, बल्कि विपक्ष के बड़े चेहरे सीना तानकर खड़े हो जाएं। मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव के साथ ठीक ऐसा ही अजूबा घटित हो रहा है, जिसे अगर सियासत का ‘विपरीत राजयोग’ कहा जाए, तो कतई गलत नहीं होगा।
इस पूरी सियासी फिल्म की शुरुआत होती है एक मीडिया रिपोर्ट से, जिसमें खुलासा हुआ कि मोहन यादव के परिजनों ने उज्जैन में 168 एकड़ जमीन खरीदी है। इस मुद्दे को लपकते हुए कांग्रेस ने इसे ‘महाकाल की जमीन की लूट’ बताकर इस्तीफे की मांग कर डाली। आग में घी डालने का काम किया मध्य प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष जीतू पटवारी ने, जिन्होंने दिल्ली में प्रेस कॉन्फ्रेंस कर आरोप मढ़ दिया कि मुख्यमंत्री ने 500 करोड़ रुपये की सरकारी जमीन और सिंधिया राजघराने की इमारत महज एक रुपये के टोकन पर एक निजी ट्रस्ट को सौंप दी है।
जब लग रहा था कि विपक्ष इस मुद्दे पर सरकार की ईंट से ईंट बजा देगा, तब कहानी में एक ऐसा ट्विस्ट आया जिसने सबको चौंका दिया। उत्तर प्रदेश से समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव अचानक मोहन यादव के संकटमोचक बनकर अवतरित हुए। अखिलेश ने इसे घोटाला नहीं, बल्कि खुद बीजेपी आलाकमान की रची हुई एक गहरी साजिश करार दिया। उनका तर्क बड़ा सीधा और मारक था—मोहन यादव राजनीति के शीर्ष पर पहुंचने से पहले ही रियल एस्टेट के बड़े खिलाड़ी रहे हैं, तो जमीन खरीदना कोई नई बात कैसे हो गई? अखिलेश ने सीधा बम फोड़ते हुए दावा किया कि बीजेपी दरअसल अपने तीन मुख्यमंत्रियों की कुर्सी छीनने की पटकथा लिख रही है, और उसी तख्तापलट की स्क्रिप्ट के तहत पर्दे के पीछे से ये आरोप प्लांट करवाए जा रहे हैं।
लेकिन असली सियासी जलजला तो तब आया, जब खुद कांग्रेस के खेमे से ही ‘फ्रेंडली फायर’ हो गया। प्रदेश अध्यक्ष जीतू पटवारी ने जिस 500 करोड़ के घोटाले की फाइल दिल्ली में खोली थी, उसे पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने उज्जैन में बकायदा दस्तावेजों के साथ भरे बाजार में खारिज कर दिया। ‘दिग्गी राजा’ ने साफ कर दिया कि जिस ‘वीर भारत न्यास’ को जमीन दी गई है, वह कोई निजी संस्था नहीं बल्कि एक पूर्णतः शासकीय ट्रस्ट है, जिसके पदेन अध्यक्ष खुद मुख्यमंत्री होते हैं। दिग्विजय सिंह ने दलालों द्वारा झूठे आरोप गढ़ने की बात कहकर न सिर्फ मुख्यमंत्री मोहन यादव को क्लीन चिट दे दी, बल्कि अपनी ही पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष को सरेआम ‘ऑफ साइड’ करार देकर कांग्रेस की अंदरूनी गुटबाजी का भी नंगा सच सामने ला दिया।
इस पूरी कहानी का सबसे दिलचस्प और रहस्यमयी पहलू वो है, जो कैमरे के सामने घट ही नहीं रहा है। एक तरफ जहां अखिलेश यादव और दिग्विजय सिंह जैसे धुर विरोधी नेता मोहन यादव के लिए रक्षा कवच तैयार कर रहे हैं, वहीं मध्य प्रदेश भाजपा के दिग्गजों ने जैसे होंठ सी लिए हैं। शिवराज सिंह चौहान, कैलाश विजयवर्गीय, ज्योतिरादित्य सिंधिया और नरेंद्र सिंह तोमर जैसे बड़े और मुखर चेहरों की इस मुद्दे पर साधी गई रहस्यमयी चुप्पी बहुत कुछ बोल रही है। अपनी ही पार्टी के बड़े नेताओं का संकट की इस घड़ी में बैकफुट पर रहना और विपक्ष के दिग्गजों का फ्रंटफुट पर आकर बैटिंग करना—यही मध्य प्रदेश की सियासत में मोहन यादव का वो प्रचंड विपरीत राजयोग है, जहां उनके राजनीतिक सितारे इस कदर बुलंदी पर हैं कि उनके खिलाफ रची गई हर साजिश, उन्हें और मजबूत करके निकाल रही है।



