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NDA में ‘ग्रैंड पॉलिटिकल रीसेट’ शुरू!

मोदी 3.0 में बदलेंगे मंत्री, संगठन और सत्ता की पूरी रणनीति?

2027 और 2029 के महासंग्राम से पहले भाजपा का बड़ा जनरेशन शिफ्ट प्लान… Nitish Kumar की एंट्री, नए चेहरे, पुराने दिग्गजों की छुट्टी और चुनावी वार मशीन तैयार करने की तैयारी! … दिल्ली की सत्ता के गलियारों से इस वक्त जो सबसे बड़ी और सबसे विस्फोटक राजनीतिक हलचल निकलकर सामने आ रही है, वो सिर्फ एक कैबिनेट विस्तार या संगठन फेरबदल की कहानी नहीं है… बल्कि यह 2029 के महासंग्राम से पहले भाजपा और NDA के भीतर शुरू हुए उस “ग्रैंड पॉलिटिकल रीसेट” की कहानी है जिसमें सरकार बदलेगी… संगठन बदलेगा… चेहरे बदलेंगे… और सत्ता की रणनीति भी पूरी तरह बदल सकती है… क्योंकि भाजपा अब सिर्फ अगला चुनाव नहीं बल्कि अगले पूरे दशक की राजनीति को ध्यान में रखकर अपनी नई टीम तैयार करने में जुट चुकी है…

दरअसल हाल ही में बिहार, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, असम, केरल और पुडुचेरी में विधानसभा चुनावों का दौर खत्म हुआ है… और अब भाजपा की पूरी रणनीतिक नजर 2027 के उन बड़े राज्यों पर टिक चुकी है जहाँ अगली निर्णायक राजनीतिक लड़ाई होनी है… जिनमें सबसे अहम उत्तर प्रदेश माना जा रहा है… इसके अलावा उत्तराखंड, पंजाब, गोवा, हिमाचल प्रदेश, मणिपुर और गुजरात भी भाजपा की चुनावी प्रयोगशाला बन चुके हैं… पार्टी को साफ तौर पर यह समझ आ चुका है कि 2024 के बाद अब केवल मोदी फैक्टर पर्याप्त नहीं होगा… बल्कि बूथ मैनेजमेंट, जातीय समीकरण, सोशल मीडिया नैरेटिव और माइक्रो सोशल इंजीनियरिंग का नया कॉम्बिनेशन ही भविष्य की राजनीति तय करेगा… और यही वजह है कि अब सरकार और संगठन दोनों को पूरी तरह “इलेक्शन मोड” में ढालने की तैयारी शुरू हो चुकी है…

सूत्रों के मुताबिक मोदी कैबिनेट से करीब 8 बड़े चेहरों की छुट्टी हो सकती है… जिन राज्यों में चुनाव खत्म हो चुके हैं वहाँ के कुछ वरिष्ठ मंत्रियों की राजनीतिक उपयोगिता सीमित मानी जा रही है… जबकि जिन राज्यों में 2027 में चुनाव होने हैं वहाँ के जातीय, क्षेत्रीय और सामाजिक समीकरणों को ध्यान में रखकर नए चेहरों को आगे लाने की तैयारी है… भाजपा अब “Under 50 + Aggressive + Electoral Utility” मॉडल पर काम कर रही है… यानी वही नेता भविष्य की टीम में रहेगा जो चुनाव जिताने की क्षमता रखता हो… जो टीवी स्टूडियो में नैरेटिव संभाल सके… जो सोशल मीडिया पर विपक्ष को जवाब दे सके… और जो बूथ स्तर तक संगठन को एक्टिव रख सके…

इसीलिए दिल्ली की राजनीतिक गलियों में इस वक्त सबसे ज्यादा चर्चा धर्मेंद्र प्रधान, हरदीप सिंह पुरी और कुछ अन्य वरिष्ठ मंत्रियों की भूमिका बदलने को लेकर है… जबकि दूसरी तरफ पीयूष गोयल और भूपेंद्र यादव का कद तेजी से बढ़ता दिखाई दे रहा है… पार्टी के भीतर अब यह माना जा रहा है कि आने वाले वर्षों में सिर्फ प्रशासनिक क्षमता नहीं बल्कि “चुनावी प्रबंधन” सबसे बड़ा फैक्टर बनने वाला है… और इसी वजह से कुछ नेताओं को सुपर पॉलिटिकल मैनेजर की भूमिका दी जा सकती है…

लेकिन इस पूरी पटकथा में कुछ ऐसे चेहरे भी हैं जिन पर दिल्ली की राजनीति की नजर सबसे ज्यादा टिक गई है… और वो हैं तेजस्वी सूर्या, अनुराग ठाकुर, रविशंकर प्रसाद और जगदंबिका पाल… अंदरखाने यह चर्चा बेहद तेज है कि आने वाले समय में इन नेताओं को सत्ता या संगठन में बड़ी जिम्मेदारियाँ दी जा सकती हैं… भाजपा अब ऐसे चेहरों को आगे लाना चाहती है जो सिर्फ चुनावी राजनीति ही नहीं बल्कि टीवी डिबेट, सोशल मीडिया, संसदीय बहस और नैरेटिव वॉरफेयर में भी आक्रामक तरीके से पार्टी का चेहरा बन सकें…

तेजस्वी सूर्या को पार्टी “युवा राष्ट्रवादी आक्रामक राजनीति” के चेहरे के तौर पर तैयार कर रही है… अनुराग ठाकुर को हिंदी पट्टी और राष्ट्रवादी नैरेटिव में बड़ी भूमिका मिलने की चर्चा है… रविशंकर प्रसाद को संसदीय और कानूनी रणनीति में फिर से अहम जिम्मेदारी दिए जाने की संभावना जताई जा रही है… जगदंबिका पाल को संगठन और पूर्वांचल-उत्तर प्रदेश के सामाजिक समीकरणों में उपयोगी माना जा रहा है… भाजपा अब ऐसे नेताओं की तलाश में है जो केवल नेता नहीं बल्कि “नैरेटिव कमांडर” की भूमिका निभा सकें…

लेकिन सबसे बड़ा राजनीतिक ट्विस्ट आता है नीतीश कुमार को लेकर… क्योंकि अब बिहार की राजनीति से निकलकर राष्ट्रीय राजनीति में पहुँचे नीतीश कुमार को मोदी सरकार में शामिल करने की संभावना बेहद मजबूत मानी जा रही है… और अंदरखाने जो चर्चा सबसे ज्यादा तेज है वो यह कि उन्हें कृषि मंत्रालय जैसा बड़ा और रणनीतिक मंत्रालय दिया जा सकता है… अगर ऐसा होता है तो यह सिर्फ एक मंत्री पद नहीं होगा… बल्कि उत्तर भारत की किसान राजनीति, OBC समीकरण और ग्रामीण वोट बैंक को साधने की एक मास्टरस्ट्रोक रणनीति होगी… भाजपा को पता है कि आने वाले समय में MSP, फसल बीमा, सहकारिता मॉडल, ग्रामीण इंफ्रास्ट्रक्चर और एग्री इकोनॉमी जैसे मुद्दे फिर से राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में आने वाले हैं… ऐसे में नीतीश कुमार जैसे अनुभवी चेहरे को राष्ट्रीय स्तर पर प्रोजेक्ट करना NDA के लिए बड़ा गेमचेंजर साबित हो सकता है…

और इसी के साथ महाराष्ट्र में भी एक बड़ा राजनीतिक प्रयोग आकार लेता दिखाई दे रहा है… क्योंकि अंदरखाने यह चर्चा बेहद तेज है कि NCP के दोनों धड़े—यानी अजित पवार गुट और शरद पवार गुट—किसी समझौते की तरफ बढ़ सकते हैं… अगर ऐसा होता है तो NDA को संसद में बड़ी ताकत मिल सकती है… और यही वजह है कि सुप्रिया सुले को लेकर भी दिल्ली में चर्चाएँ अचानक तेज हो गई हैं… सवाल पूछा जा रहा है कि क्या महाराष्ट्र में नया सामाजिक समीकरण बनाने के लिए सुप्रिया सुले को केंद्र में बड़ी जिम्मेदारी दी जा सकती है…

अब बात भाजपा संगठन की… क्योंकि सिर्फ सरकार नहीं, संगठन में भी भारी उथल-पुथल तय मानी जा रही है… नए राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन की टीम को लेकर जो चर्चाएँ हैं वो बताती हैं कि भाजपा अब पूरी तरह “जनरेशन शिफ्ट” की तरफ बढ़ रही है… सूत्रों के मुताबिक 8 नए राष्ट्रीय उपाध्यक्ष और 5 नए महासचिव बनाए जा सकते हैं… लगभग 25 नए राष्ट्रीय प्रवक्ता भी लाए जा सकते हैं… यानी भाजपा अब अपनी मीडिया मशीनरी, टीवी डिबेट टीम और डिजिटल नैरेटिव सिस्टम को पूरी तरह रीसेट करने की तैयारी में है… कई पुराने चेहरों की छुट्टी तय मानी जा रही है… और इसी क्रम में अनिल बलूनी को लेकर भी चर्चाएँ तेज हैं…

और अब सबसे दिलचस्प हिस्सा… क्योंकि भाजपा के भीतर यह चर्चा भी बेहद तेज है कि संगठनात्मक रणनीति में बड़ा बदलाव हो सकता है… सुनील बंसल का कद लगातार बढ़ रहा है… बूथ मैनेजमेंट, माइक्रो सोशल इंजीनियरिंग और चुनावी संरचना को लेकर पार्टी में उनकी पकड़ बेहद मजबूत मानी जाती है… जबकि दूसरी तरफ बी.एल. संतोष की भूमिका को लेकर भी अंदरखाने नई चर्चाएँ शुरू हो चुकी हैं… भाजपा अब 2027 और 2029 को ध्यान में रखकर संगठन को “इलेक्शन वार मशीन” में बदलना चाहती है…

यानी कुल मिलाकर तस्वीर साफ है… 2026 और 2027 सिर्फ चुनावी साल नहीं होंगे… बल्कि भारतीय राजनीति के सबसे बड़े पुनर्गठन के साल साबित हो सकते हैं… मोदी सरकार अब अपने तीसरे कार्यकाल के उस चरण में पहुँच चुकी है जहाँ लक्ष्य सिर्फ सरकार चलाना नहीं बल्कि अगली पीढ़ी की राजनीतिक मशीन तैयार करना है… इसीलिए कुछ दिग्गज हटेंगे… कुछ नए चेहरे चमकेंगे… कुछ सहयोगी दल वापस जोड़े जाएंगे… कुछ पुराने विरोधी नए साथी बनेंगे… और सत्ता की इस पूरी शतरंज में वही टिकेगा जिसकी चुनावी उपयोगिता सबसे ज्यादा होगी… क्योंकि दिल्ली की राजनीति में सिर्फ एक नियम चलता है—यहाँ स्थायी दोस्त या दुश्मन नहीं होते… सिर्फ स्थायी हित होते हैं… और इस वक्त भाजपा अपने अगले दशक की पूरी राजनीतिक संरचना को रीसेट करने में जुट चुकी है…

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