मध्य प्रदेश में ‘आयुष्मान योजना’ बनी वसूली का हथियार: जूनियर IAS अफसर की ‘तुकाराम’ बनने की सनक से वेंटिलेटर पर निजी अस्पताल
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सबसे महत्वाकांक्षी स्वास्थ्य योजना ‘आयुष्मान भारत’ मध्य प्रदेश में जनसेवा का जरिया बनने के बजाय नौकरशाही की मनमानी और कथित वसूली के सिंडिकेट की भेंट चढ़ती दिख रही है। जमीन पर गरीबों को मुफ्त और सुलभ इलाज देने का दावा करने वाला यह सिस्टम आज निजी अस्पतालों की सांसें घोंटकर खुद की जेबें भरने और दबाव बनाने की एक प्रयोगशाला बन चुका है। भोपाल के 468 अस्पतालों का पिछले पांच-छह महीनों से अटका डेढ़ से दो करोड़ रुपये प्रति अस्पताल का बकाया महज कोई तकनीकी खामी नहीं है, बल्कि यह अस्पतालों की गर्दन दबाए रखने का एक सुनियोजित प्रशासनिक हथियार नजर आता है। सियासी और प्रशासनिक गलियारों में यह खुली चर्चा है कि भुगतान की फाइलों को महीनों दबाकर रखना और फिर क्लीयरेंस के नाम पर तरह-तरह की अड़चनें पैदा करना दरअसल उसी दबाव की रणनीति का हिस्सा है, जिसके जरिए निजी स्वास्थ्य तंत्र को घुटनों पर लाने का खेल खेला जा रहा है।
इस पूरे प्रशासनिक चक्रव्यूह की कमान संभाल रहे 2021 बैच के जूनियर आईएएस अफसर और आयुष्मान योजना के सीईओ अरविंद शाह के फैसलों ने पूरे सिस्टम को कठघरे में खड़ा कर दिया है। अनुभव की कमी और पद के असीमित अधिकारों के नशे में प्राकृतिक न्याय के बुनियादी सिद्धांतों को पूरी तरह से ताक पर रख दिया गया है। किसी भी अस्पताल के खिलाफ आई मामूली सी शिकायत पर न तो कोई निष्पक्ष जांच होती है और न ही अस्पताल प्रबंधन को अपना पक्ष रखने का मौका दिया जाता है; बस सीधे एकतरफा कार्रवाई, भारी-भरकम पेनल्टी और डी-एम्पैनलमेंट (De-empanelment) की तलवार लटका दी जाती है। फंड्स रोककर अस्पतालों को आर्थिक रूप से पंगु बनाना और फिर 1 अक्टूबर से एनएबीएच (NABH) के नाम पर सामूहिक निष्कासन का डर दिखाकर ब्लैकमेलिंग का माहौल तैयार करना, यह साबित करता है कि असल मकसद स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार करना नहीं, बल्कि अपना इकबाल और एकतरफा दबदबा कायम करना है।
इस प्रशासनिक हठधर्मिता की सबसे भारी कीमत भोपाल, इंदौर, ग्वालियर और जबलपुर जैसे बड़े शहरों के छोटे और मध्यम अस्पताल चुका रहे हैं। कॉर्पोरेट अस्पतालों की चकाचौंध से दूर, मोहल्लों और बस्तियों के नजदीक स्थित ये छोटे नर्सिंग होम ही आयुष्मान योजना की असली रीढ़ हैं, जहां गरीब तबका बिना किसी झिझक के पहुंचता है। जब इन छोटे अस्पतालों पर अव्यावहारिक नियम थोपकर और उनके फंड रोककर उन्हें बंद होने की कगार पर धकेल दिया जाएगा, तो उन लाखों गरीब मरीजों का क्या होगा जो आज पूरी तरह से कैशलेस इलाज पर निर्भर हैं? जब दैनिक भास्कर के स्टिंग ऑपरेशन ने इस महकमे में चल रहे फर्जीवाड़े और दलालों के गठजोड़ का पर्दाफाश किया था, तब उम्मीद थी कि सिस्टम का शुद्धिकरण होगा, लेकिन हुआ ठीक इसके उलट। जमीनी सुधार करने के बजाय पूरी मशीनरी को छोटे अस्पतालों के दमन और एकतरफा कार्रवाइयों में झोंक दिया गया। गौर करने वाली बात यह भी है कि सीनियर कैबिनेट मंत्री राकेश सिंह तक से उलझकर यह अफसर पहले ही अपनी प्रशासनिक उद्दंडता का प्रमाण दे चुका है।
व्यवस्था को सुधारने के बजाय साहब इन दिनों खुद को मध्य प्रदेश की ब्यूरोक्रेसी का ‘तुकाराम’ साबित करने की सनक में डूबे हैं। जमीनी हकीकत से बेखबर होकर सिर्फ सोशल मीडिया और सत्ता के गलियारों में सख्त, बेदाग और मसीहा वाली छवि गढ़ने के लिए ‘सेल्फ ब्रांडिंग’ का तमाशा खड़ा किया जा रहा है। किसी ईमानदार प्रशासक और पब्लिसिटी के भूखे अफसर के बीच का फर्क यही होता है कि तुकाराम बनने की इस चाहत में गरीबों के इलाज की लाइफलाइन ही काट दी गई है। 2021 बैच के एक नौसिखिया अधिकारी के हाथ में केंद्र सरकार की इतनी संवेदनशील और विशाल योजना की बागडोर थमा देना प्रशासनिक अदूरदर्शिता की पराकाष्ठा है। आज मध्य प्रदेश को किसी ऐसे स्वयंभू मसीहा की जरूरत नहीं है जो फाइलों को वसूली और आतंक का जरिया बना ले, बल्कि मोदी सरकार की इस जनकल्याणकारी योजना को बचाने के लिए तत्काल प्रभाव से किसी सुलझे हुए, परिपक्व और वरिष्ठ आईएएस अधिकारी को कमान सौंपने की दरकार है, जो निजी तंत्र के साथ संवाद बनाकर गरीबों का इलाज सुरक्षित रख सके।



