अखिलीक्स एक्सक्लूसिव: आयुष्मान महकमे का ‘ब्यूरोक्रेटिक ट्रैप’ बेनकाब, IAS अरविंद शाह के चक्रव्यूह में कैसे फंसाए गए प्रदेश के निजी अस्पताल
मध्य प्रदेश के आयुष्मान महकमे में चल रहे एक बड़े ‘ब्यूरोक्रेटिक ट्रैप’ का पूरी तरह से पर्दाफाश हो गया है, जिसने प्रदेश की स्वास्थ्य व्यवस्था की नींव हिलाकर रख दी है। इस बार 2021 बैच के जूनियर आईएएस अफसर और आयुष्मान योजना के सीईओ अरविंद शाह के पास अपनी जवाबदेही से भागने का कोई रास्ता नहीं बचा है। ‘अखिलीक्स’ की इस एक्सक्लूसिव डीप डाइव में वह अहम सुबूत हाथ लगा है, जो यह साबित करता है कि 1 अक्टूबर का डी-एम्पैनलमेंट कोई अचानक लागू किया गया गुणवत्ता नियम नहीं है, बल्कि यह 6 महीने पहले रची गई एक खौफनाक प्रशासनिक साजिश का हिस्सा है। 13 अप्रैल 2026 को जारी एक आधिकारिक आदेश के जरिए अरविंद शाह के महकमे ने भोपाल, इंदौर, जबलपुर और ग्वालियर के निजी अस्पतालों को NABH प्रमाणन की अनिवार्यता पूरी करने के लिए 1 अप्रैल 2026 से 6 महीने की ‘अतिरिक्त अवधि’ प्रदान की थी। कागजों पर यह आदेश बड़ी चालाकी से यह दिखाने के लिए जारी किया गया था कि प्रशासन अस्पतालों को एंट्री लेवल या फुल NABH प्राप्त करने का पर्याप्त समय दे रहा है, लेकिन हकीकत में यह प्रदेश के निजी अस्पतालों का ‘कानूनी एनकाउंटर’ करने के लिए सेट किया गया एक टाइम-बम था।
इस प्रशासनिक चक्रव्यूह की क्रूरता को समझना बेहद जरूरी है, जहां मोहलत देने के नाम पर सीईओ अरविंद शाह ने इन्हीं छह महीनों के दौरान अस्पतालों की आर्थिक रीढ़ पूरी तरह से तोड़कर रख दी। एक तरफ आधिकारिक फाइल के जरिए यह फरमान जारी किया गया कि निर्धारित अवधि के भीतर लाखों रुपये खर्च करके हर हाल में क्वालिटी सर्टिफिकेट लेकर आओ, और दूसरी तरफ सुनियोजित तरीके से इन्हीं अस्पतालों का डेढ़ से दो करोड़ रुपये का पुराना पेमेंट रोककर उनकी पूरी फंडिंग चोक कर दी गई। जो अस्पताल महीनों से अपने नर्सिंग स्टाफ को वेतन और दवा वेंडरों को पैसा नहीं दे पा रहे थे, उनके लिए 1 अक्टूबर की डेडलाइन से पहले इतनी महंगी और जटिल NABH प्रक्रिया पूरी करना असंभव था। यह सीधे तौर पर अरविंद शाह द्वारा बिछाया गया एक ‘डेथ ट्रैप’ था, ताकि डेडलाइन खत्म होते ही छोटे अस्पतालों को बड़ी आसानी से डिफॉल्टर घोषित कर सिस्टम से बाहर फेंका जा सके और इस पूरी नाकामी का सारा दोष उन्हीं के सिर मढ़ा जा सके।
अब जब अस्पताल संचालक अपने अस्तित्व को बचाने के लिए सड़क पर उतर आए हैं, तो अपनी नाकामियों को छुपाने के लिए सीईओ साहब ने ऐन मौके पर केंद्र सरकार के आदेशों की ‘ढाल’ तलाश ली है। 29 सितंबर 2026 को राष्ट्रीय स्वास्थ्य प्राधिकरण (NHA) का जो नया मेमोरेंडम आया, उसने प्रोत्साहन राशि का पूरा ढांचा ही बदल दिया। इस नए नियम के तहत अब सिर्फ NABH एंट्री लेवल पर 5%, फुल एक्रेडिटेशन पर 10% और कांस्य प्रमाणन पर 2.5% इंसेंटिव मिलेगा, वह भी सिर्फ प्रोसीजर रेट पर। इसके साथ ही इम्प्लांट पर मिलने वाले फायदे और अन्य सभी पुराने प्रोत्साहन एक झटके में खत्म कर दिए गए। अब अरविंद शाह बड़ी ही चतुराई से दिल्ली के इस लेटर की आड़ में प्रदेश में यह नैरेटिव सेट करने में जुटे हैं कि वे अपने स्तर पर कोई मनमानी नहीं कर रहे हैं, बल्कि सिर्फ NHA के नए क्वालिटी नियमों को सख्ती से लागू कर रहे हैं।
लेकिन अरविंद शाह की प्रशासनिक हठधर्मिता और गुमराह करने की कोशिश का झूठ इन्हीं दोनों दस्तावेजों के बीच पकड़ा जाता है। दिल्ली के उस लेटर में कहीं भी यह नहीं लिखा है कि आप अस्पतालों के करोड़ों रुपये 6 महीने तक दबाकर बैठ जाएं और उन्हें पूरी तरह से दिवालिया कर दें। दिल्ली ने स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता सुधारने को कहा था, सिस्टम को पंगु बनाकर वसूली और खौफ का तंत्र चलाने को नहीं। खुद को मध्य प्रदेश का सख्त प्रशासक साबित करने की सनक में इस नौसिखिए अफसर ने केंद्र की नीतियों को ढाल बनाकर अपने दबाव के तंत्र को जायज ठहराने की कोशिश की है। हकीकत यह है कि NHA की गाइडलाइन और फाइल के बीच बुने गए इस चक्रव्यूह का असली शिकार वह गरीब और मध्यमवर्गीय मरीज हो रहा है, जिससे 1 अक्टूबर के बाद उसके घर के पास वाले छोटे अस्पताल में कैशलेस इलाज का हक छीन लिया जाएगा। अब प्रदेश सरकार को यह तय करना है कि क्या वह 2021 बैच के एक अफसर के ईगो के आगे घुटने टेकेगी, या इस पूरे सिंडिकेट पर सर्जिकल स्ट्राइक कर मध्य प्रदेश की चरमराती स्वास्थ्य व्यवस्था को बचाएगी।



