मध्य प्रदेश के एजुकेशन सिस्टम में ‘साइलेंट शिफ्ट’: क्या है इस जमीनी बदलाव का सच?
क्या आपने कभी सोचा है कि एक साधारण सरकारी स्कूल का बच्चा, बिना किसी महंगी कोचिंग के, पहले ही प्रयास में NEET और JEE जैसी कठिन परीक्षाएं कैसे पास कर रहा है? या फिर कैसे एक ही झटके में प्रदेश के 1 लाख 21 हजार मेधावी छात्रों के बैंक खातों में 304 करोड़ रुपये पहुंच जाते हैं? ‘अखिलीक्स’ (Akhileaks) के इस खास विश्लेषण में, मैं अखिलेश सोलंकी आपके सामने मध्य प्रदेश के एजुकेशन सेक्टर में आ रहे उस ‘साइलेंट शिफ्ट’ को डिकोड कर रहा हूं, जो अब सिर्फ सरकारी कागजों तक सीमित नहीं है, बल्कि ग्राउंड जीरो पर साफ नजर आ रहा है। पब्लिक पॉलिसी और स्टेट एडमिनिस्ट्रेशन में जब भी कोई बड़ा स्ट्रक्चरल बदलाव होता है, तो उसका सीधा असर ग्रास-रूट लेवल पर छात्रों के भविष्य को री-शेप करता है।
डिजिटल डिवाइड को पाटता नया इकोसिस्टम
शिक्षा के क्षेत्र में डिजिटाइजेशन को बढ़ावा देने के लिए मेधावी छात्रों को लैपटॉप के लिए दी जा रही 25-25 हजार रुपये की प्रोत्साहन राशि एक गेम-चेंजर साबित हो रही है। यह महज एक सरकारी योजना नहीं, बल्कि ग्रामीण और शहरी छात्रों के बीच के ‘डिजिटल डिवाइड’ को खत्म करने का एक प्रैक्टिकल टूल है। आंकड़ों का गहराई से एनालिसिस बताता है कि अब तक साढ़े छह लाख छात्रों तक 1620 करोड़ रुपये का डिस्ट्रीब्यूशन हो चुका है। राज्य के ‘ह्यूमन कैपिटल’ में यह सीधा निवेश नई शिक्षा नीति के विजन को साकार कर रहा है। जब ये छात्र आधुनिक डिजिटल संसाधनों से लैस होते हैं, तो वे महंगी कोचिंग पर निर्भर हुए बिना ही नेशनल और ग्लोबल लेवल के कॉम्पिटिशन के लिए खुद को मजबूती से तैयार कर पाते हैं।
ब्रेन-ड्रेन रोकने और टैलेंट रिटेन करने की रणनीति
किसी भी राज्य के एजुकेशन इंफ्रास्ट्रक्चर की ग्रोथ को नापने का सबसे सटीक पैमाना वहां की मेडिकल और प्रोफेशनल सीट्स का विस्तार होता है। ऐतिहासिक आंकड़ों पर नजर डालें, तो दशकों तक मध्य प्रदेश में मात्र 5 मेडिकल कॉलेज हुआ करते थे। आज यह ग्राफ तेजी से ऊपर गया है और मेडिकल कॉलेजों की संख्या 33 तक पहुंच गई है। पिछले केवल दो सालों में 5 नए मेडिकल कॉलेजों की स्थापना और 2400 अंडरग्रेजुएट (UG) सीटों का बढ़ना इस बात का प्रमाण है कि फोकस अब सिर्फ बेसिक एजुकेशन पर नहीं, बल्कि हायर एजुकेशन के डिसेंट्रलाइजेशन पर है। साल 2028 तक 55 मेडिकल कॉलेजों का विजन यह सुनिश्चित करता है कि प्रदेश का ‘ब्रेन-ड्रेन’ रुकेगा और होनहार छात्रों का टैलेंट राज्य के विकास में ही काम आएगा।
सिस्टम का आउटपुट और लौटता पब्लिक कॉन्फिडेंस
नीतियां तभी सफल मानी जाती हैं जब सिस्टम का आउटपुट बेहतर हो और जनता का भरोसा उसमें झलके। मध्य प्रदेश के सरकारी स्कूलों में ड्रॉपआउट रेट का शून्य होना और एनरोलमेंट का लगातार बढ़ना, एजुकेशन सिस्टम में लौटते पब्लिक कॉन्फिडेंस का सबसे बड़ा संकेत है। आज जब एक साधारण बैकग्राउंड से आने वाला छात्र 12वीं के साथ ही फर्स्ट अटेंप्ट में NEET और JEE Mains क्रैक करता है, तो यह साबित हो जाता है कि टैलेंट को सिर्फ सही माहौल और सपोर्ट की जरूरत होती है। स्कूलों के एकेडमिक स्ट्रक्चर को मजबूत करने के लिए 70 हजार से ज्यादा अतिथि शिक्षकों की सेवाएं ली जा रही हैं और 18 हजार नई भर्तियों का कमिटमेंट किया गया है। यह मजबूत ढांचा युवाओं को सिर्फ रोजगार मांगने वाला नहीं, बल्कि एंटरप्रिन्योरशिप की दिशा में सोचने वाला एक सशक्त नागरिक बना रहा है।



