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‘लेटर बम’ का सियासी खेल: इंदौर की उपेक्षा या कैलाश विजयवर्गीय का ‘शैडो बॉक्सिंग’ दांव?

मध्य प्रदेश की राजनीति में इन दिनों एक ‘लेटर बम’ ने खूब धुआं किया हुआ है। एक ऐसी कथित चिट्ठी, जिसने इंदौर से लेकर भोपाल तक सरकार के भीतर की रस्साकशी को सड़क पर ला दिया है। दैनिक भास्कर जैसे प्रमुख अखबार ने पूरे दम-खम के साथ एक रिपोर्ट छापी कि प्रदेश के कद्दावर मंत्री कैलाश विजयवर्गीय ने मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव को एक खत लिखकर इंदौर के विकास में ‘असहयोग’ और ‘उपेक्षा’ का रोना रोया है। अखबार ने मास्टर प्लान, मेट्रोपॉलिटन रीजन और पीथमपुर के विकास जैसे पांच वो मुद्दे गिनाए, जो सीधे तौर पर सरकार को कटघरे में खड़े करते हैं।

लेकिन इस सियासी ड्रामे की सबसे बड़ी विडंबना तब सामने आती है, जब मीडिया के कैमरे कैलाश जी के सामने पहुंचते हैं और वो अपने चिर-परिचित ‘दबंग’ अंदाज से कोसों दूर, पूरी तरह से डिनायल मोड में नजर आते हैं। वे अपनी ही चिट्ठी से पल्ला झाड़ते हुए उल्टे पत्रकारों पर भड़क जाते हैं और कहते हैं कि ‘पता नहीं कहाँ से जानकारी मिली आपको, उन्हीं अखबार वालों से जाकर पूछिए।’ अब यहाँ ‘अखिलेक्स’ का सीधा और तीखा सवाल है—कैलाश जी, राजनीति में ये दोहरा मापदंड आखिर क्यों? अगर दैनिक भास्कर ने बिना किसी आधार के इतनी बड़ी मनगढ़ंत खबर छाप दी है, तो आप सिर्फ मुस्कुरा कर या मीडिया पर झुंझला कर क्यों बच रहे हैं? अगर ये खत कभी लिखा ही नहीं गया, तो इतने बड़े अखबार पर मानहानि का मुकदमा क्यों नहीं ठोकते?

हकीकत तो यह है कि यह कोई ‘कम्युनिकेशन गैप’ नहीं, बल्कि दबाव की राजनीति का एक पुराना और आजमाया हुआ हथकंडा है। खत लिखो, उसे मीडिया में लीक करवाओ ताकि मुख्यमंत्री और सिस्टम पर दबाव बने, और जब कैमरे सामने आएं तो मुकर जाओ ताकि हाईकमान की नाराजगी से बचा जा सके। अपनी ही सरकार और अपनी ही पार्टी के मुख्यमंत्री की घेराबंदी करने का यह ‘शैडो बॉक्सिंग’ वाला खेल अब मध्य प्रदेश की जनता भी समझने लगी है।

कैलाश विजयवर्गीय की पहचान हमेशा एक ऐसे बेबाक और अग्रेसिव नेता की रही है जो फ्रंटफुट पर खेलते हैं। लेकिन उनका वो फ्रंटफुट सिर्फ तब दिखता है जब उन्हें प्रशासनिक अधिकारियों को सरेआम धमकाना हो या खुले मंच से उन्हें खरी-खोटी सुनानी हो। जब महिलाओं के पहनावे पर टिप्पणी कर पूरे देश में विवाद खड़ा करना हो, या फिर बेटे आकाश विजयवर्गीय के बहुचर्चित ‘बैट कांड’ के वक्त मीडिया को आंखें दिखानी हों, तब तो कैलाश जी के तेवर सातवें आसमान पर होते हैं। लेकिन जब अपनी ही लिखी गई उस चिट्ठी को ‘ओन’ (Own) करने की बारी आती है, जिसमें उन्होंने अपने ही शहर की उपेक्षा का मुद्दा उठाया है, तो अचानक उनके वो तेवर कहाँ गायब हो जाते हैं?

जो नेता डंके की चोट पर अपनी बात रखने का दावा करता है, वो अपनी ही चिट्ठी के सवाल पर इतना डिफेंसिव और गोलमोल क्यों हो जाता है? अगर खत लिखा है, तो उसे स्वीकार करने की रीढ़ दिखाइए, और अगर नहीं लिखा है, तो अखबार को कोर्ट में घसीटिए। मध्य प्रदेश और इंदौर की जनता विकास चाहती है, सत्ता के गलियारों में होने वाली यह सियासी नूराकुश्ती नहीं। अगर इंदौर के हकों की लड़ाई लड़नी ही है, तो उसे खुलेआम लड़िए, इस तरह चिट्ठियों के सहारे पर्दे के पीछे से तीर चलाना कद्दावर नेताओं को शोभा नहीं देता। सियासत के ऐसे ही दोहरे चेहरों और पर्दे के पीछे की हर असली कहानी को समझने के लिए जुड़े रहिए, देखते रहिए ‘अखिलीक्स’।

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