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मध्य प्रदेश भाजपा में दूसरी सूची पर ब्रेक, अब 108 नामों की कार्यसमिति पर फोकस

पहली नियुक्तियों के बाद बढ़ा असंतोष, नेतृत्व अब फूँक-फूँक कर रख रहा कदम

मध्य प्रदेश की राजनीति में निगम-मंडलों और प्राधिकरणों की पहली सूची जारी होने के बाद अब सत्ता और संगठन के गलियारों में एक अलग तरह की बेचैनी महसूस की जा रही है। जिन नेताओं और कार्यकर्ताओं को उम्मीद थी कि दूसरी सूची में उन्हें समायोजित कर लिया जाएगा, उनके लिए अब इंतजार लंबा होता नजर आ रहा है। भाजपा नेतृत्व फिलहाल दूसरी सूची को लेकर बेहद सतर्क रणनीति पर काम कर रहा है, क्योंकि पहली नियुक्तियों के बाद पार्टी के भीतर जिस तरह का दबा हुआ असंतोष सामने आया है, उसने शीर्ष नेतृत्व को नई चुनौती के सामने खड़ा कर दिया है।
सूत्रों के मुताबिक, पहली सूची के बाद कई ऐसे नेता और गुट खुद को उपेक्षित महसूस कर रहे हैं जो लंबे समय से संगठन और सत्ता के बीच संतुलन की राजनीति में अहम भूमिका निभाते रहे हैं। यही कारण है कि अब भाजपा नेतृत्व किसी भी नई नियुक्ति से पहले हर क्षेत्रीय और सांगठनिक समीकरण को दोबारा परखना चाहता है। पार्टी नहीं चाहती कि दूसरी सूची के बाद असंतोष खुलकर सामने आए और उसका असर आगामी संगठनात्मक बैठकों और चुनावी तैयारियों पर दिखाई दे।
इसी बीच मई महीने में ओरछा में प्रस्तावित भाजपा की पहली प्रदेश कार्यसमिति बैठक को लेकर संगठन ने अपनी पूरी ताकत झोंक दी है। तीन दिन पहले भाजपा प्रदेश कार्यालय में हुई एक महत्वपूर्ण बैठक में यह स्पष्ट संदेश दिया गया कि प्रदेश कार्यसमिति की घोषणा से पहले उन जिलों की जिला कार्यकारिणी को तत्काल अंतिम रूप दिया जाए जो अब तक लंबित हैं। संगठन की रणनीति साफ है—पहले जिला स्तर पर कार्यकर्ताओं को जिम्मेदारी देकर असंतोष की धार को कमजोर किया जाए, ताकि प्रदेश स्तर पर जब नई टीम सामने आए तो विरोध की तीव्रता सीमित रहे।
राजनीतिक गलियारों में इस समय सबसे ज्यादा चर्चा उन नेताओं की है जो निगम-मंडलों की दौड़ में पीछे रह गए थे और अब प्रदेश कार्यसमिति में जगह बनाकर अपनी राजनीतिक प्रासंगिकता बचाने की कोशिश कर रहे हैं। भोपाल के सत्ता केंद्रों से लेकर वरिष्ठ नेताओं के बंगलों तक लगातार मुलाकातों और लॉबिंग का दौर जारी है। कई नेता इसे “वेटिंग गेम” बता रहे हैं, जहाँ हर चेहरा अपने लिए एक सुरक्षित राजनीतिक स्पेस तलाशने में जुटा हुआ है।
अखिलेक्स को मिली विशेष जानकारी के अनुसार भाजपा लगभग 108 नामों की एक नई प्रदेश कार्यसमिति घोषित करने की तैयारी में है। इस टीम को “चुस्त-दुरुस्त और एक्टिव कैडर आधारित संरचना” के रूप में पेश करने की रणनीति बनाई जा रही है। सूत्र बताते हैं कि हर जिले से दो से तीन सक्रिय और संगठननिष्ठ चेहरों को जगह देने का फार्मूला तैयार किया गया है। लेकिन इस प्रस्तावित सूची को लेकर भी क्षेत्रीय संतुलन की बहस तेज हो गई है।
जिस प्रकार हालिया निगम-मंडल नियुक्तियों में ग्वालियर-चंबल अंचल का प्रभाव सबसे अधिक दिखाई दिया था, उसी प्रकार प्रदेश कार्यसमिति में भी इस क्षेत्र का मजबूत प्रतिनिधित्व देखने को मिल सकता है। संगठन के भीतर यह धारणा तेजी से बन रही है कि भाजपा नेतृत्व एक बार फिर ग्वालियर-चंबल को प्राथमिकता देने की रणनीति पर आगे बढ़ रहा है। इसके बाद सबसे ज्यादा प्रभाव मालवा अंचल का रहने की संभावना है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव स्वयं इस कार्यसमिति के गठन में गहरी रुचि ले रहे हैं और नामों के चयन की प्रक्रिया पर उनकी सीधी नजर बनी हुई है। यही वजह है कि मालवा क्षेत्र के नेताओं और कार्यकर्ताओं की सक्रियता अचानक बढ़ गई है। कई नाम सीधे मुख्यमंत्री खेमे से जुड़े बताए जा रहे हैं। यदि यही स्थिति बनी रही तो महाकौशल, बुंदेलखंड और विंध्य जैसे क्षेत्रों में प्रतिनिधित्व को लेकर नई असंतुष्टि जन्म ले सकती है।
भाजपा के भीतर फिलहाल सबसे बड़ी चुनौती यही है कि संगठनात्मक विस्तार और क्षेत्रीय संतुलन के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए। पार्टी नेतृत्व यह अच्छी तरह समझता है कि यदि कार्यकर्ताओं की अपेक्षाओं को लगातार नजरअंदाज किया गया तो उसका असर बूथ स्तर की सक्रियता पर भी पड़ सकता है। यही कारण है कि इस बार संगठन केवल पद बांटने की राजनीति नहीं कर रहा, बल्कि हर नियुक्ति के राजनीतिक प्रभाव का आकलन भी कर रहा है।
अखिलेक्स की इस डीप डाइव का निष्कर्ष साफ है—मध्य प्रदेश भाजपा इस समय अपने सबसे संवेदनशील संगठनात्मक चरण से गुजर रही है। एक तरफ कार्यकर्ताओं का बढ़ता दबाव है, दूसरी तरफ क्षेत्रीय वर्चस्व की खींचतान। ऐसे में 108 नामों की यह नई कार्यसमिति केवल एक संगठनात्मक सूची नहीं, बल्कि भाजपा के भीतर शक्ति संतुलन का नया राजनीतिक दस्तावेज साबित हो सकती है।
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या यह नई टीम असंतोष को नियंत्रित कर पाएगी या फिर क्षेत्रीय दबदबे की यह लड़ाई आने वाले समय में संगठन की आंतरिक राजनीति को और जटिल बना देगी। फिलहाल सत्ता और संगठन दोनों की नजर ओरछा में होने वाली कार्यसमिति बैठक पर टिक गई है, जहाँ से भाजपा की आगामी राजनीतिक दिशा का बड़ा संकेत निकल सकता है।
Akhileaks.com सत्ता और संगठन के हर बंद कमरे की हलचल पर अपनी पैनी नजर बनाए हुए है।

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