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MP BJP का ‘Power Shift’: कोर कमेटी नहीं, मोहन यादव सरकार के ‘Part-2’ की पटकथा

मध्यप्रदेश की सियासत में जो नई ‘कोर कमेटी’ सामने आई है, उसे सिर्फ एक संगठनात्मक फेरबदल समझना सबसे बड़ी भूल होगी, क्योंकि ये लिस्ट दरअसल सत्ता के ‘पावर बैलेंस’ को रीसेट करने की स्क्रिप्ट है। डॉ. मोहन यादव सरकार के पहले ढाई साल को अगर ‘हनीमून पीरियड’ कहा जाए तो अब उसका अंत हो चुका है, और दिल्ली ने साफ संकेत दे दिया है कि अब आगे का सफर ‘वन मैन शो’ नहीं बल्कि ‘कलेक्टिव कमांड’ के फॉर्मूले पर चलेगा।

यही वजह है कि इस कोर कमेटी में जो नाम सबसे ज्यादा चौंकाते हैं, वो हैं डॉ. नरोत्तम मिश्रा और अरविंद भदौरिया। विधानसभा चुनाव में हार के बाद जिन्हें राजनीतिक गलियारों में लगभग ‘साइडलाइन’ मान लिया गया था, उनकी इस तरह से ‘कोर’ में एंट्री यह बताती है कि बीजेपी अभी भी अपने पुराने और भरोसेमंद ‘संकटमोचक’ चेहरों पर ही सबसे बड़ा दांव लगाती है। नरोत्तम मिश्रा की वापसी महज एक राजनीतिक रिवाइवल नहीं है, बल्कि यह संदेश है कि जब भी फ्लोर मैनेजमेंट, विपक्ष की घेराबंदी या संवेदनशील सियासी ऑपरेशन की जरूरत पड़ेगी, तो पार्टी उन्हीं रणनीतिकारों की ओर लौटेगी जिनका ट्रैक रिकॉर्ड साबित है। वहीं अरविंद भदौरिया की मौजूदगी यह दिखाती है कि संगठन के अंदर ‘नेटवर्किंग’ और ‘डिलीवरी सिस्टम’ आज भी उतना ही मायने रखता है जितना पहले रखता था।

लेकिन इस पूरी कमेटी का सबसे अहम एंगल दो बड़े नामों से जुड़ा है—शिवराज सिंह चौहान और ज्योतिरादित्य सिंधिया। शिवराज, जो अब केंद्र की राजनीति में सक्रिय हैं, लेकिन मध्यप्रदेश की जमीन पर उनका प्रभाव और पकड़ आज भी उतनी ही मजबूत है, और सिंधिया, जिनका सियासी ग्राफ अब सिर्फ ग्वालियर-चंबल तक सीमित नहीं रहा बल्कि पूरे प्रदेश में फैल चुका है। इन दोनों नेताओं की मौजूदगी इस कोर कमेटी को सिर्फ ‘गाइडेंस बॉडी’ नहीं बल्कि एक ‘पावर चेक मैकेनिज्म’ भी बनाती है। साफ शब्दों में कहें तो अब मुख्यमंत्री मोहन यादव के फैसलों में इन जननेताओं की सहमति एक अनिवार्य शर्त बन सकती है।

अब नजर 14 अप्रैल की उस अहम बैठक पर है, जो शाम 7 बजे सीएम हाउस में होने जा रही है। यह कोई सामान्य ‘चाय पर चर्चा’ नहीं, बल्कि आने वाले ढाई साल की सियासी दिशा तय करने वाली निर्णायक बैठक मानी जा रही है। इस बैठक का पहला और सबसे संवेदनशील एजेंडा है—समान नागरिक संहिता (UCC)। क्या मध्यप्रदेश इस कानून को लागू करने वाला देश का सबसे बड़ा राज्य बनने की तैयारी में है? इसकी कानूनी जटिलताओं और राजनीतिक जोखिमों पर पहली गंभीर चर्चा इसी बैठक में हो सकती है।
दूसरा बड़ा मुद्दा है—33 प्रतिशत महिला आरक्षण। इसे सिर्फ घोषणा तक सीमित न रखकर, नगरीय निकाय चुनाव, संगठनात्मक नियुक्तियों और सत्ता के ढांचे में वास्तविक रूप से कैसे लागू किया जाए, यही असली टेस्ट होगा। तीसरा एजेंडा है—परिसीमन यानी Delimitation। आने वाले समय में विधानसभा सीटों की संख्या बढ़ने की संभावना है, और इसके साथ ही कई नेताओं के राजनीतिक किले हिल सकते हैं। किसका गढ़ मजबूत रहेगा और किसका समीकरण बिगड़ेगा, इसकी शुरुआती रेखाएं इसी कोर कमेटी की बैठकों में खींची जाएंगी।

लेकिन असली ‘लिटमस टेस्ट’ तब होगा जब निगम-मंडलों की नियुक्तियों की सूची सामने आएगी। यही वो मोर्चा है जहाँ इस कमेटी की असली ताकत और संतुलन दोनों का परीक्षण होगा। क्या नरोत्तम मिश्रा और सिंधिया खेमे के समर्थकों को तवज्जो मिलेगी, या संगठन संतुलन के नाम पर नए चेहरे सामने आएंगे—इस पर सबकी नजरें टिकी रहेंगी।

इसके साथ ही 2028 का सिंहस्थ, जो मध्यप्रदेश का सबसे बड़ा धार्मिक और प्रशासनिक आयोजन है, उसकी पूरी तैयारी, बजट और मैनेजमेंट की जिम्मेदारी भी इसी टीम के कंधों पर होगी। आने वाले नगरीय निकाय चुनाव, फिर विधानसभा और लोकसभा चुनावों का रोडमैप भी यही ‘कोर टीम’ तैयार करेगी। जिलों में मंत्रियों और अफसरों के बीच बढ़ते टकराव को कंट्रोल करना भी इसी कमेटी की जिम्मेदारी होगी—यानी यह टीम सिर्फ रणनीति नहीं, बल्कि ‘ग्राउंड कंट्रोल’ का भी काम करेगी।

कुल मिलाकर, बीजेपी ने अब ‘एक्सपेरिमेंटल पॉलिटिक्स’ से बाहर निकलकर ‘एग्जीक्यूशन मोड’ में एंट्री कर ली है। नरोत्तम मिश्रा की वापसी, शिवराज-सिंधिया की मौजूदगी और सामूहिक नेतृत्व का यह फॉर्मूला यह साफ संकेत देता है कि पार्टी अब किसी भी तरह की ढिलाई के मूड में नहीं है।

अब सबसे बड़ा सवाल यही है—क्या यह ‘कलेक्टिव कमांड’ समन्वय के साथ काम करेगा या फिर अंदरूनी खींचतान और पावर सेंटर की लड़ाई और तेज होगी?

जो भी होगा… Akhileaks की नजर हर उस हलचल पर रहेगी, जो सत्ता के गलियारों में हो रही है—क्योंकि यहाँ खबरें सिर्फ दिखाई नहीं जातीं, उनका सच भी सामने लाया जाता है।

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