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एमपी की सत्ता का ‘सवर्ण-कांड’: क्या UGC की आग बीजेपी के ओबीसी किले में सेंध लगाएगी?

​मध्य प्रदेश की राजनीति की सरल दिखने वाली सतह के नीचे अब एक ऐसा लावा उबल रहा है, जो 2028 की सियासी बिसात को पूरी तरह बदल सकता है। ‘अखिलीक्स’ के इस विशेष विश्लेषण में हम उस ‘सवर्ण-कांड’ की पड़ताल कर रहे हैं, जिसने वल्लभ भवन से लेकर दिल्ली तक हलचल पैदा कर दी है। 13 जनवरी 2026 को UGC (विश्वविद्यालय अनुदान आयोग) द्वारा नियमों में किए गए एक बदलाव ने मध्य प्रदेश के सवर्ण समाज में आक्रोश की जो लहर पैदा की है, वह महज एक प्रशासनिक फैसले का विरोध नहीं है। यह उस राजनैतिक उपेक्षा का प्रस्फुटन है, जो पिछले दो दशकों से सवर्णों के भीतर सुलग रही थी। आज सवाल यह है कि क्या यह गुस्सा बीजेपी के उस अभेद्य ‘ओबीसी किले’ की नींव हिला देगा जिसे बनाने में दशकों लगे हैं?

​इतिहास के पन्नों को पलटें तो मध्य प्रदेश में कांग्रेस का वजूद ही ‘सवर्णों के राज’ का पर्याय हुआ करता था। पंडित रविशंकर शुक्ल के दौर से लेकर द्वारका प्रसाद मिश्र, अर्जुन सिंह और दिग्विजय सिंह तक—कांग्रेस ने हमेशा ब्राह्मण और ठाकुर नेतृत्व को अपना ‘ब्रैंड’ बनाया। यहाँ तक कि 2018 में सत्ता में वापसी करने वाले कमलनाथ भी इसी सवर्ण राजनीति की एक कड़ी थे। लेकिन बीजेपी की कहानी इससे बिलकुल जुदा रही है। बीजेपी ने सवर्णों का वोट तो लिया, लेकिन सत्ता की चाबी धीरे-धीरे पिछड़ों के हाथों में सौंप दी। यहाँ एक बड़ा राजनैतिक तथ्य समझना ज़रूरी है—अक्सर लोग सुंदरलाल पटवा को सवर्ण समझते हैं, लेकिन सच यह है कि पटवा जी ओबीसी (बुनकर समाज) से आते थे। यानी बीजेपी ने 1980 के दशक में ही अपनी ‘सोशल इंजीनियरिंग’ शुरू कर दी थी, जिसका परिणाम आज उमा भारती, बाबूलाल गौर, शिवराज सिंह चौहान और अब मोहन यादव के रूप में हमारे सामने है।

​वर्तमान परिदृश्य में क्या बीजेपी के सवर्ण नेता सिर्फ ‘शो-पीस’ बनकर रह गए हैं? विंध्य के कद्दावर नेता राजेंद्र शुक्ल को डिप्टी सीएम का पद तो मिला, लेकिन गलियारों में चर्चा आम है कि क्या उन्हें वह वास्तविक ‘पावर’ मिली है जिसकी उम्मीद विंध्य का शेर करता था? क्या उनकी दहाड़ आज भी सत्ता के शीर्ष तक पहुँचती है या उन्हें केवल एक क्षेत्र विशेष तक सीमित कर दिया गया है? यही हाल कटनी के ‘किंग’ कहे जाने वाले संजय पाठक का है, जो आज अनुशासन के घेरे में हाशिए पर नज़र आ रहे हैं। सबसे चौंकाने वाला संकेत तो बीजेपी के सबसे अनुभवी मंत्री गोपाल भार्गव के बयानों से मिलता है। जब भार्गव जैसे दिग्गज को सार्वजनिक रूप से कहना पड़े कि ‘ब्राह्मणों की अनदेखी हो रही है’, तो यह साफ़ है कि संगठन के भीतर सब कुछ सामान्य नहीं है। सवर्ण समाज अब महसूस कर रहा है कि उनके नेता ‘किंगमेकर’ से घटकर महज ‘किरदार’ बनकर रह गए हैं।

​इस असंतोष को ज्वालामुखी बनाने का काम किया UGC के ‘Equity Regulations 2026’ ने। इन नियमों में भेदभाव की परिभाषा को जिस तरह सीमित किया गया, उसने सवर्ण युवाओं के मन में असुरक्षा का भाव भर दिया है। ब्राह्मण और सवर्ण समाज आज सीधा सवाल पूछ रहा है कि क्या उनके बच्चों के साथ होने वाला भेदभाव, भेदभाव की श्रेणी में नहीं आता? इसी नाराजगी को कांग्रेस अपनी ‘संजीवनी’ मान रही है। राजनैतिक पंडितों का मानना है कि कांग्रेस अब अपने पुराने ‘अजेय फॉर्मूले’—ब्राह्मण, ठाकुर, दलित और मुस्लिम गठबंधन की ओर लौट सकती है। क्या 2028 में कांग्रेस किसी कद्दावर सवर्ण चेहरे को आगे कर ‘घर वापसी’ का दांव खेलेगी?

​अंततः, मध्य प्रदेश की राजनीति अब एक ऐसे मोड़ पर है जहाँ ‘जातिगत पहचान’ के टकराव अनिवार्य हो गए हैं। क्या बीजेपी ने यह मान लिया है कि सवर्णों के पास उसे वोट देने के अलावा कोई विकल्प नहीं है? क्या राजेंद्र शुक्ल और संजय पाठक जैसे नेता सिर्फ ‘वोट बैंक’ साधने के प्यादे हैं? और सबसे बड़ा सवाल—क्या UGC के नियमों से उपजा यह आक्रोश 2028 में एक बड़े ‘सवर्ण विद्रोह’ का रूप लेगा? वल्लभ भवन का रास्ता अब किस जाति की पगडंडी से होकर गुजरेगा, यह देखना दिलचस्प होगा। ‘अखिलीक्स’ के इस विश्लेषण पर आपकी क्या राय है? क्या सवर्णों के बिना बीजेपी अपनी सत्ता बचा पाएगी? कमेंट में हमें ज़रूर बताएं।

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