सवालों के चक्रव्यूह में विधायक डॉ. चिंतामणि मालवीय! महाकाल पार्किंग जमीन विवाद से लेकर महिला उत्पीड़न के आरोपों तक घिरा ‘माननीय’ का रसूख

मध्य प्रदेश की राजनीति में जब किसी प्रभावशाली जनप्रतिनिधि के फैसलों और उनके व्यावसायिक हितों पर सवाल उठने लगते हैं, तो उसका असर सिर्फ व्यक्ति तक सीमित नहीं रहता, बल्कि उसकी गूंज सीधे उस राजनीतिक दल की साख तक पहुँचती है, जिसके मंच से वह जनसेवा, नैतिकता और शुचिता की राजनीति का दावा करता है। इस वक्त भाजपा विधायक डॉ. चिंतामणि मालवीय एक ऐसे ही बहुस्तरीय विवादों के केंद्र में खड़े दिखाई दे रहे हैं, जहाँ एक तरफ बाबा महाकाल की नगरी उज्जैन में करोड़ों की कथित जमीन हेराफेरी और सरकारी रिकॉर्ड में बदलाव के आरोप हैं, तो दूसरी तरफ भोपाल के राजभवन तक पहुँचे महिला उत्पीड़न और मानसिक प्रताड़ना के गंभीर आरोपों ने उनके राजनीतिक और सामाजिक आचरण पर बड़ा प्रश्नचिह्न खड़ा कर दिया है। इन दोनों ही मामलों में उंगली सीधे विधायक जी की कार्यप्रणाली, उनके रसूख और उनके व्यावसायिक हितों की ओर उठ रही है, जिससे भाजपा की उस स्थापित छवि पर भी दबाव बढ़ता दिख रहा है जो खुद को सिद्धांतवादी राजनीति का प्रतीक बताती रही है।
पूरा विवाद उज्जैन के अति महत्वपूर्ण हरि फाटक क्षेत्र से शुरू होता है, जहाँ इंदौर-उज्जैन रोड पर स्थित लगभग पैंतालीस हजार वर्ग फीट की एक बेहद कीमती जमीन को लेकर लोकायुक्त और आर्थिक अपराध प्रकोष्ठ यानी ईओडब्ल्यू तक शिकायतें पहुँच चुकी हैं। आरोप है कि जिस जमीन का उपयोग वर्षों से महाकाल मंदिर की आधिकारिक पार्किंग के रूप में किया जा रहा था और जहाँ आज भी देशभर से आने वाले श्रद्धालु अपने वाहन खड़े करते हैं, उसी जमीन की दो मार्च 2026 को ‘यूटोपिया होटल एंड रिसॉर्ट प्राइवेट लिमिटेड’ नामक कंपनी के नाम रजिस्ट्री कर दी गई। आरोप लगाने वालों का दावा है कि इस कंपनी से विधायक डॉ. चिंतामणि मालवीय और उनके व्यावसायिक सहयोगियों का सीधा संबंध है। यही वह बिंदु है जहाँ यह मामला सिर्फ एक जमीन सौदे से आगे बढ़कर सार्वजनिक हित बनाम निजी व्यावसायिक लाभ की लड़ाई में बदलता दिखाई देता है।
अगर इस पूरे मामले की दस्तावेजी परतों को क्रमवार देखा जाए, तो स्थानीय कांग्रेस पार्षद राजेंद्र कुवाल द्वारा मुख्य सचिव को सौंपे गए दस्तावेज कई गंभीर सवाल खड़े करते हैं। शिकायत के अनुसार वर्ष 1950 और वर्ष 1967-68 के राजस्व रिकॉर्ड में खसरा नंबर 3664/1 और 3666/1 को स्पष्ट रूप से शासकीय भूमि बताया गया है। आरोप यह भी है कि यह जमीन कभी कवेलू कारखानों के उपयोग के लिए आवंटित की गई थी और बाद में नगर निगम के अधिकार क्षेत्र में दर्ज रही, लेकिन समय के साथ रिकॉर्ड में बदलाव कर इसे निजी स्वामित्व की दिशा में मोड़ दिया गया। सबसे बड़ा सवाल यही उठ रहा है कि आखिर ऐसा कौन-सा प्रशासनिक या कानूनी आधार था जिसके कारण करोड़ों की सार्वजनिक उपयोग वाली जमीन अचानक निजी कंपनी के नाम दर्ज हो गई? विपक्ष और शिकायतकर्ताओं का आरोप है कि इस पूरी प्रक्रिया का उद्देश्य महाकाल मंदिर से जुड़ी सार्वजनिक पार्किंग व्यवस्था को समाप्त कर वहाँ एक निजी फाइव स्टार होटल और कमर्शियल प्रोजेक्ट खड़ा करना है।
मामले का दूसरा और सबसे विस्फोटक पहलू टैक्स और स्टांप शुल्क में कथित हेराफेरी का है। शिकायतों के अनुसार जिस इलाके की कलेक्टर गाइडलाइन दर लगभग पचहत्तर हजार चार सौ रुपये प्रति वर्ग मीटर बताई जा रही है, उसी जमीन को रजिस्ट्री में कृषि भूमि दिखाकर मात्र बाईस हजार पांच सौ रुपये प्रति वर्ग मीटर की दर से दर्ज किया गया। आरोप यह है कि यदि वास्तविक कमर्शियल गाइडलाइन के अनुसार मूल्यांकन किया जाता, तो जमीन का कुल मूल्य लगभग इकतीस करोड़ रुपये से अधिक बैठता, लेकिन कथित रूप से इसे केवल तीन करोड़ बयासी लाख रुपये का सौदा दिखाया गया। इसी आधार पर आरोप लगाया जा रहा है कि सरकार को लगभग तीन करोड़ चालीस लाख रुपये के स्टांप और पंजीयन शुल्क का नुकसान पहुँचाया गया। विपक्ष इस मुद्दे को सिर्फ आर्थिक अनियमितता नहीं, बल्कि एक कानून निर्माता द्वारा कानून की आत्मा के साथ कथित खिलवाड़ के रूप में प्रस्तुत कर रहा है।
यह विवाद तब और संवेदनशील हो गया जब इसमें धर्म, आस्था और संत समाज की एंट्री हुई। श्री पंचायती अखाड़ा महानिर्वाणी के महामंडलेश्वर स्वामी देवस्वरूपानंद सरस्वती ने सार्वजनिक रूप से विधायक जी के बयान पर तीखी प्रतिक्रिया दी। दरअसल विधायक डॉ. चिंतामणि मालवीय ने कथित रूप से कहा था कि केवल पार्किंग चलने भर से कोई जमीन मंदिर की नहीं हो जाती। इस बयान ने संत समाज को नाराज कर दिया। महामंडलेश्वर ने बेहद सख्त लहजे में कहा कि महाकाल की नगरी में श्रद्धालुओं की सुविधा से जुड़ी जमीन पर व्यावसायिक कब्जे की अनुमति नहीं दी जा सकती। संतों ने यहाँ तक चेतावनी दे दी कि सिंहस्थ 2028 से पहले यदि इस विवाद का समाधान नहीं हुआ और जमीन को बाबा महाकाल की सेवा में वापस नहीं दिया गया, तो संत समाज उग्र आंदोलन का रास्ता अपनाएगा। राजनीतिक गलियारों में यह सवाल भी उठ रहा है कि यदि हिंदुत्व और धार्मिक आस्था की राजनीति करने वाली पार्टी के विधायक के खिलाफ स्वयं संत समाज मोर्चा खोल दे, तो इसका व्यापक राजनीतिक और सांस्कृतिक संदेश क्या जाएगा।
इस पूरे घटनाक्रम ने विपक्ष को भी सरकार और भाजपा संगठन पर हमला बोलने का बड़ा मौका दे दिया है। नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने इस मामले को भाजपा का “लैंड मॉडल” बताते हुए आरोप लगाया कि धर्म और आस्था को अब मुनाफे के कारोबार में बदल दिया गया है। कांग्रेस लगातार यह सवाल उठा रही है कि क्या जनप्रतिनिधियों की प्राथमिकता जनता और श्रद्धालुओं की सुविधा होनी चाहिए या फिर निजी होटल और व्यावसायिक प्रोजेक्ट? राजनीतिक रूप से यह हमला सीधे विधायक डॉ. चिंतामणि मालवीय की कार्यशैली और उनकी प्राथमिकताओं को कटघरे में खड़ा करता है, जिससे भाजपा को भी रक्षात्मक मुद्रा में आना पड़ रहा है।
लेकिन डॉ. चिंतामणि मालवीय की मुश्किलें केवल जमीन विवाद तक सीमित नहीं हैं। उनके खिलाफ दूसरा बड़ा मोर्चा भोपाल में महिला कांग्रेस द्वारा खोला गया है। महिला कांग्रेस प्रदेशाध्यक्ष रीना बोरासी ने राज्यपाल मंगुभाई पटेल को ज्ञापन सौंपते हुए विधायक जी पर एक बुजुर्ग महिला के मानसिक उत्पीड़न और जमीन हड़पने के गंभीर आरोप लगाए हैं। ज्ञापन में दावा किया गया है कि राजनीतिक प्रभाव और स्थानीय प्रशासनिक दबाव के कारण पीड़ित महिला को न्याय नहीं मिल पा रहा है। महिला कांग्रेस ने चेतावनी दी है कि यदि निष्पक्ष जांच शुरू नहीं हुई तो इस मुद्दे को पूरे प्रदेश में आंदोलन के रूप में उठाया जाएगा। इन आरोपों ने मामले को केवल प्रशासनिक या वित्तीय विवाद नहीं रहने दिया, बल्कि इसे नैतिकता और महिला सम्मान से जुड़े गंभीर राजनीतिक संकट में बदल दिया है।
हालाँकि इन सभी आरोपों के बीच विधायक डॉ. चिंतामणि मालवीय बेहद आक्रामक रुख अपनाए हुए हैं। उन्होंने जमीन सौदे से लेकर महिला उत्पीड़न तक के सभी आरोपों को पूरी तरह निराधार और राजनीतिक साजिश करार दिया है। उनका कहना है कि संबंधित जमीन सौदा पूरी तरह वैध दस्तावेजों और कानूनी प्रक्रिया के तहत हुआ है। महिला उत्पीड़न के आरोपों पर उन्होंने कहा कि वे ऐसी किसी महिला को जानते तक नहीं हैं और उनकी छवि खराब करने के लिए विपक्ष और कुछ हित समूह सुनियोजित अभियान चला रहे हैं। विधायक जी ने यह भी संकेत दिए हैं कि वे आरोप लगाने वालों के खिलाफ आपराधिक मानहानि का मुकदमा दायर करेंगे।
लेकिन इन तमाम दावों और प्रतिदावों के बीच सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या सिर्फ मानहानि के मुकदमों की चेतावनी देकर उन दस्तावेजी सवालों को खत्म किया जा सकता है जो लगातार सार्वजनिक मंचों पर उठ रहे हैं? क्या करोड़ों की जमीन, बदले हुए रिकॉर्ड, गाइडलाइन दरों में कथित विसंगतियों और महिला उत्पीड़न जैसे संवेदनशील आरोपों पर निष्पक्ष और पारदर्शी जांच होगी? और सबसे अहम सवाल यह कि क्या एक जनप्रतिनिधि होने के नाते डॉ. चिंतामणि मालवीय को अब इन आरोपों का सार्वजनिक और तथ्यात्मक जवाब देकर अपनी तथा अपनी पार्टी की राजनीतिक शुचिता साबित करनी पड़ेगी? फिलहाल नजरें भोपाल से लेकर उज्जैन और दिल्ली तक टिकी हुई हैं, क्योंकि यह मामला अब केवल एक विधायक का विवाद नहीं, बल्कि सत्ता, धर्म, जमीन, रसूख और राजनीतिक नैतिकता की बड़ी परीक्षा बन चुका है।



