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मायावती का ‘माधौगढ़ मास्टरस्ट्रोक’ और 34% का जादुई गणित: क्या दोहराया जाएगा 2007 का इतिहास?

​अखिलीक्स विशेष विश्लेषण: उत्तर प्रदेश की सियासत में जब सन्नाटा गहराने लगे, तो समझ लीजिए कि ‘नीला हाथी’ अपनी अगली चाल बहुत सधे हुए कदमों से चल रहा है। जहाँ सत्ता के गलियारों में भाजपा की हैट्रिक और अखिलेश यादव के ‘PDA’ फॉर्मूले की गूँज है, वहीं बहुजन समाज पार्टी की प्रमुख मायावती ने 2027 के महासंग्राम का पहला शंखनाद कर सबको चौंका दिया है। अखिलीक्स पर हमने बहुत पहले ही यह डिकोड कर दिया था कि मायावती इस बार किसी भी गठबंधन के बजाय अपने उस पुराने ‘ब्रह्मास्त्र’ को धार दे रही हैं, जिसने 2007 में उन्हें लखनऊ के सिंहासन पर पूर्ण बहुमत के साथ बैठाया था। आज जब कानपुर के आशीष पांडे को जालौन की माधौगढ़ सीट का प्रभारी—यानी कि चुनाव का पहला प्रत्याशी—घोषित किया गया, तो हमारी उस भविष्यवाणी पर मुहर लग गई कि बसपा एक बार फिर ‘ब्राह्मण-दलित’ गठजोड़ की सोशल इंजीनियरिंग को जमीन पर उतारने जा रही है। यह महज एक टिकट का बंटवारा नहीं है, बल्कि यूपी की 403 विधानसभा सीटों के लिए एक बड़ा मनोवैज्ञानिक संदेश है कि मायावती की नजर अब उस ‘अनडिसाइडेड’ ब्राह्मण वोटर पर है, जो खुद को मौजूदा राजनीतिक ढांचे में उपेक्षित महसूस कर रहा है।

​इस पूरी बिसात को समझने के लिए माधौगढ़ (जालौन) के भूगोल और जातीय समीकरण को समझना सबसे जरूरी है। बुंदेलखंड का यह इलाका सवर्ण और दलित आबादी के एक ‘डेडली कॉम्बिनेशन’ के लिए जाना जाता है। मायावती द्वारा आशीष पांडे को उनके गृह जनपद कानपुर से उठाकर माधौगढ़ भेजने के पीछे एक गहरा रणनीतिक विश्लेषण छिपा है। बुंदेलखंड में ब्राह्मण वोटर इस वक्त एक मजबूत विकल्प की तलाश में है, जहाँ भाजपा का पारंपरिक हिंदुत्व कार्ड अब फीका पड़ने लगा है और सपा का ‘PDA’ मॉडल सवर्णों के मन में संशय पैदा कर रहा है। ऐसे में ‘बहन जी’ ने एक पढ़े-लिखे, युवा और बेदाग ब्राह्मण चेहरे को मैदान में उतारकर उस डर को भरोसे में बदलने की कोशिश की है। यह कदम सीधे तौर पर 2007 के उस दौर की याद दिलाता है जब सतीश चंद्र मिश्रा ने गाँव-गाँव जाकर शंख बजाया था और ब्राह्मणों को बसपा में न केवल सम्मान, बल्कि सत्ता की सीधी हिस्सेदारी का भरोसा दिया था।

​मायावती का ‘एकला चलो’ का संकल्प किसी मजबूरी का नहीं, बल्कि पिछले कड़वे अनुभवों का परिणाम है। बसपा नेतृत्व ने अब यह स्वीकार कर लिया है कि गठबंधन में उनका अनुशासित ‘कैडर वोट’ तो सहयोगियों को ट्रांसफर हो जाता है, लेकिन बदले में दूसरों का वोट ‘हाथी’ के निशान पर नहीं आता। इसीलिए, अब रणनीति एक स्व-निर्भर ‘कोर’ और ‘प्लस’ वोट बैंक तैयार करने की है। गणित बिल्कुल सटीक है: बसपा के पास 21% दलित (जाटव + अन्य) का अभेद्य कोर वोट बैंक है। यदि इसमें 12-13% ब्राह्मणों का ‘प्लस’ वोट जुड़ जाता है, तो यह जादुई आंकड़ा 34% के करीब पहुँचता है। उत्तर प्रदेश की राजनीति गवाह है कि 35% वोट शेयर का मतलब होता है—पूर्ण बहुमत की प्रचंड सरकार। आशीष पांडे इसी ‘34% फॉर्मूले’ के पहले पोस्टर बॉय बनकर उभरे हैं।

​अखिलीक्स के पास मौजूद विशेष जानकारी के अनुसार, यह तो बस शुरुआत है। मायावती इस बार तकरीबन 100 ब्राह्मण चेहरों पर दांव लगाने की पूरी तैयारी कर चुकी हैं, जो यूपी के चुनावी इतिहास को पलटने का माद्दा रखता है। होली के तुरंत बाद कानपुर मंडल की 5 और महत्वपूर्ण सीटों पर ब्राह्मण प्रत्याशियों का ऐलान इस रणनीति की दूसरी बड़ी किस्त होगी। इस बार मायावती केवल रैलियों के भरोसे नहीं हैं, बल्कि हर विधानसभा में ‘भाईचारा कमेटियों’ को फिर से सक्रिय किया जा रहा है ताकि सवर्ण परिवारों के बीच बसपा के ‘सर्वजन हिताय’ मॉडल को प्रभावी ढंग से पहुँचाया जा सके। यदि ब्राह्मणों का एक छोटा हिस्सा भी बसपा की तरफ शिफ्ट होता है, तो जातीय अस्मिता और राजनीतिक हिस्सेदारी का यह मेल लखनऊ के पंचम तल पर एक बार फिर ‘बहन जी’ की ताजपोशी का रास्ता साफ कर सकता है। खेल शुरू हो चुका है और हाथी 2007 के उस स्वर्णिम इतिहास को दोहराने की दिशा में कदम बढ़ा चुका है।

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