रसूखदार सिटी प्लानर का फर्जी लेआउट!
सत्ता की हनक और रसूख के नशे में दूसरों के आशियानों पर बुलडोजर चलाने वाले और कॉलोनियों को ‘अवैध’ घोषित करने वाले एक ताकतवर नौकरशाह के करियर की नींव अब कथित ‘फर्जीवाड़े’ के दलदल में धंसती नजर आ रही है। यह मामला मध्य प्रदेश के टाउन एंड कंट्री प्लानिंग (T&CP) विभाग के पूर्व संयुक्त संचालक और भोपाल नगर निगम के वर्तमान चीफ सिटी प्लानर नीरज आनंद लिखार का है। कोलार के लोटस वैली जैसे बिना रेरा अनुमति वाले प्रोजेक्ट्स पर एफआईआर दर्ज कराकर और अवैध निर्माणों पर कार्रवाई कर खुद को सख्त प्रशासक के रूप में पेश करने वाले लिखार अब खुद सवालों के घेरे में हैं। जिस अधिकारी के पास टीएंडसीपी के जॉइंट डायरेक्टर और निगम के सिटी प्लानर का दोहरा प्रभार रहा हो, उसकी अपनी ही कुर्सी एक कथित फर्जी अनुसूचित जनजाति (ST) प्रमाण पत्र के विवाद में घिर गई है, जिसे अब मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने सीधे अपने रडार पर ले लिया है।
इस पूरे मामले की जड़ें साल 1983 से जुड़ी हैं, जब महाराष्ट्र की ‘हलबा’ जनजाति का एक एसटी प्रमाण पत्र हासिल कर नीरज लिखार ने मध्य प्रदेश के सरकारी सिस्टम में एंट्री ली और प्रमोशन पाते हुए शीर्ष पदों तक का सफर तय किया। ‘अखिलीक्स’ की इस इन्वेस्टिगेशन का सबसे चौंकाने वाला पहलू खुद लिखार के परिवार से जुड़ा है। जिस ‘हलबा’ जनजाति के नाम पर यह प्रमाण पत्र बना है, ठीक उसी आधार पर बने उनके सगे बड़े भाई अजय लिखार के एसटी प्रमाण पत्र को उच्च स्तरीय जाति छानबीन समिति फर्जी घोषित कर चुकी है। साल 2021 में मध्य प्रदेश हाईकोर्ट भी छानबीन समिति के उस निरस्तीकरण को सही ठहराते हुए अपनी कानूनी मुहर लगा चुका है। यह सवाल प्रशासनिक ढांचे पर खड़ा होता है कि जब दो सगे भाइयों के माता-पिता, पूर्वज, वंशावली, जन्मस्थान और सामाजिक पृष्ठभूमि सौ फीसदी एक समान है, तो एक भाई का प्रमाण पत्र फर्जी और दूसरे का असली कैसे हो सकता है। याचिकाकर्ता आदित्य ठाकुर का तर्क है कि इस दोहरी व्यवस्था को मानना सीधे तौर पर भारत के संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 का खुला उल्लंघन और समानता के अधिकार के खिलाफ है।
इस मामले में मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के कड़े रुख ने लिखार और उन्हें संरक्षण देने वाले सिस्टम की नींद उड़ा दी है। नरसिंहपुर निवासी की याचिका पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट के जस्टिस विशाल मिश्रा की एकलपीठ ने मामले की गंभीरता को समझा और सीधे उच्च स्तरीय जाति छानबीन समिति को 90 दिन का कड़ा अल्टीमेटम थमा दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि इन तीन महीनों के भीतर सिर्फ कागजों की खानापूर्ति नहीं होगी, बल्कि लिखार की सामाजिक और पारिवारिक पृष्ठभूमि की गहराई से विजिलेंस जांच कर पूरी फोरेंसिक रिपोर्ट अदालत के पटल पर रखी जाए। हाईकोर्ट ने अपने इस आदेश में सुप्रीम कोर्ट के 1994 के ऐतिहासिक ‘कुमारी माधुरी पाटिल केस’ की गाइडलाइन का भी प्रमुखता से जिक्र किया है। यह गाइडलाइन स्पष्ट करती है कि यदि जाति प्रमाण पत्र फर्जी पाया जाता है, तो सिर्फ नौकरी से बर्खास्तगी और रिकवरी नहीं होगी, बल्कि धोखाधड़ी और जालसाजी के तहत सख्त आपराधिक मुकदमा भी दर्ज होगा।
इस आदेश के बाद सत्ता के गलियारों में हलचल साफ देखी जा सकती है। यह वही अधिकारी हैं जिन्हें इससे पहले भी इन्हीं गंभीर विवादों के चलते हाईकोर्ट के दखल के बाद इंदौर के सिटी प्लानर के पद से बेदखल किया गया था, लेकिन सिस्टम में मजबूत पैठ के चलते इन्हें राजधानी भोपाल में चीफ सिटी प्लानर की अहम कुर्सी सौंप दी गई। अब जब 90 दिन की उल्टी गिनती शुरू हो चुकी है और छानबीन समिति की जांच की तलवार लटक रही है, तो खुद को बचाने के लिए लिखार ने आनन-फानन में सिंगल बेंच के फैसले को हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच में चुनौती दे डाली है। यह कदम दर्शाता है कि वे उस हाई-लेवल स्क्रूटनी का सामना करने से बच रहे हैं, जो उनके भाई के मामले में पहले ही स्थिति साफ कर चुकी है। दूसरों के घरों के नक्शे पास और फेल करने वाले इस रसूखदार सिटी प्लानर के अपने ही करियर का ‘लेआउट’ अब कानूनी कसौटी पर है, और आने वाले कुछ महीने मध्य प्रदेश की ब्यूरोक्रेसी के इस बड़े मामले का निर्णायक अंत तय करेंगे।



