अखिलीक्स एक्सक्लूसिव: हार कर भी ‘बाजीगर’ बने सिंधिया समर्थक, एमपी बीजेपी की नई टीम में सत्ता का दबदबा और सोशल इंजीनियरिंग का मास्टरस्ट्रोक
राजनीति में अक्सर कहा जाता है कि जो चुनाव हारता है, वो हाशिए पर चला जाता है… लेकिन मध्य प्रदेश की बिसात पर अगर आप ‘सिंधिया’ के करीबी हैं, तो हारने के बाद भी संगठन में आपका रसूख और रुतबा कम नहीं होता!
नमस्कार, अखिलीक्स के इस डीप डाइव में आपका स्वागत है। मध्य प्रदेश बीजेपी की नई और बहुप्रतीक्षित प्रदेश कार्यसमिति का ऐलान हो चुका है। इस सूची का सबसे बड़ा सियासी धमाका है— ज्योतिरादित्य सिंधिया गुट का संगठन में बरकरार दबदबा। सत्ता और संगठन के इस नए समीकरण ने साफ कर दिया है कि पार्टी के भीतर शक्ति संतुलन की जो रस्साकशी चल रही थी, उसमें सिंधिया खेमे का पलड़ा अभी भी बेहद भारी है।
आइए परत-दर-परत समझते हैं कि इस नई कार्यसमिति के जरिए बीजेपी आलाकमान ने क्या सियासी संदेश दिया है और इसके मायने क्या हैं।
सिंधिया के सिपहसालारों को बड़ी ‘राजनीतिक संजीवनी’
इस नई सूची ने एक बात साफ कर दी है कि चुनाव हारने का मतलब राजनीतिक वनवास नहीं है, बशर्ते आपके ऊपर सही हाथ हो। पार्टी ने सिंधिया खेमे के 7 चेहरों को अहम जगह देकर गुटीय संतुलन को बहुत बारीकी से साधा है।
सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि उन सिंधिया समर्थकों को प्रदेश कार्यसमिति में जगह दी गई है, जो विधानसभा चुनाव हारने के बाद नेपथ्य में चले गए थे। इनमें पूर्व मंत्री इमरती देवी, महेंद्र सिंह सिसौदिया, ओपीएस भदौरिया, पूर्व विधायक गिर्राज दंडौतिया और रक्षा संतराम सिरोनिया जैसे नाम शामिल हैं। हार के बावजूद इन्हें संगठन में जगह मिलना सिंधिया की मजबूत पैरवी का नतीजा है। इनके साथ ही, सिंधिया के विश्वस्त मौजूदा मंत्री तुलसी सिलावट और गोविंद राजपूत को भी शामिल कर यह सुनिश्चित किया गया है कि संगठन के फैसलों में इस गुट की आवाज बुलंद रहे।
संगठन की बिसात पर ‘सत्ता’ का एकछत्र राज
सिंधिया फैक्टर के अलावा, इस नई समिति का दूसरा सबसे बड़ा पहलू है— सरकार और विधायी चेहरों का पूर्ण वर्चस्व। साफ है कि संगठन की इस नई बिसात पर सीधे तौर पर सरकार के चेहरों को ही ‘ड्राइविंग सीट’ पर बैठाया गया है।
शीर्ष नेतृत्व: सूची के शीर्ष पर मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव काबिज हैं।
दिल्ली का दखल: दिल्ली से मध्य प्रदेश की राजनीति को साध रहे तीन कद्दावर केंद्रीय मंत्रियों— शिवराज सिंह चौहान, डॉ. वीरेंद्र कुमार और खुद ज्योतिरादित्य सिंधिया को भी इसमें अहम स्थान मिला है।
विधायिका की धमक: सत्ता की ताकत का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि दोनों उपमुख्यमंत्री (जगदीश देवड़ा और राजेंद्र शुक्ल) के साथ राज्य कैबिनेट के 15 मंत्री, 3 राज्यमंत्री, 20 से अधिक विधायक, 6 लोकसभा और 3 राज्यसभा सांसद इस समिति का हिस्सा बनाए गए हैं।
सोशल इंजीनियरिंग: आकार में कटौती और ‘मुस्लिम’ चेहरे की ऐतिहासिक एंट्री
इस बार संगठन की सर्जरी में केंद्रीय गाइडलाइन का सख्ती से पालन किया गया है। मुख्य सूची को पिछली बार के 164 सदस्यों से घटाकर बेहद चुस्त-दुरुस्त करते हुए 106 पर समेट दिया गया है।
हालांकि, उम्रदराज और वरिष्ठ नेताओं की नाराजगी मोल लेने से बचते हुए 41 वरिष्ठ नेताओं को ‘स्थायी आमंत्रित सदस्यों’ की सूची में डालकर साधा गया है। लेकिन इस सोशल इंजीनियरिंग का सबसे बड़ा और चौंकाने वाला मास्टरस्ट्रोक है— 33 प्रतिशत महिला आरक्षण का जमीनी स्तर पर क्रियान्वयन।
मुख्य सूची और स्थायी आमंत्रित सदस्यों को मिलाकर कुल 43 महिलाओं को जगह मिली है। इसमें सबसे ऐतिहासिक नाम है भोपाल की बिलकिस जहां का। भाजपा ने पहली बार प्रदेश कार्यसमिति में किसी मुस्लिम महिला को जगह देकर अल्पसंख्यक मोर्चे से इतर मुख्यधारा के संगठन में एक नया नैरेटिव सेट कर दिया है। वहीं, नए चेहरों को तरजीह देने की इस कवायद में भोपाल के सांसद आलोक शर्मा और विधायक विष्णु खत्री जैसे पुराने चेहरों को बाहर का रास्ता दिखा दिया गया है।
ओरछा में होगा असली ‘लिटमस टेस्ट’
प्रदेशाध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल के अनुसार, लगभग 50 से 60 विशेष आमंत्रित सदस्यों की एक और सूची फिलहाल होल्ड पर है, जो आने वाले समय में राजनीतिक जरूरत के हिसाब से जारी की जा सकती है।
अब पूरे प्रदेश और राजनीतिक विश्लेषकों की नजरें 15 जुलाई के आसपास ओरछा में होने वाली इस नई टीम की पहली बैठक पर टिकी हैं। यह बैठक महज एक औपचारिकता नहीं होगी; यहीं से सत्ता और संगठन के इस नए गठजोड़, गुटीय तालमेल और मिशन 2028-29 के लिए बीजेपी के नए रोडमैप का असली ‘लिटमस टेस्ट’ शुरू होगा।



